चंद्रेश्वर के पाँच गो कविता

by | Feb 24, 2023 | 0 comments

– चंद्रेश्वर

1) बैनीआहपीनाला

प्यार के रंग
कइसन होला ?
का खूब गाढ़ लाल
ओढ़हुल के फूल नियर ?
का खूब गाढ़ पीयर
सरसों के फूल नियर ?
का खूब गाढ़ नीला
अलसी के फूल नियर ?
का खूब गाढ़ हरियर
पानी के घास नियर ?
का खूब गाढ़ कत्थई
पाकल सेब नियर ?
का खूब भक-भक गोर
चाँन के अँजोरिया नियर ?

आखिर कइसन होला
रंग प्यार के ?
का रंग प्यार के
बैंगनी होला
आसमानी होला
नारंगी होला ?

का प्यार के रंग में
शामिल नइखन स
सब रंग
दुनिया के
एकरा में शामिल
रंग गाढ़ सांवर ……
राम आ किसुन वाला
भा करिया
सूफियन के लबादा वाला
शामिल एह में
बैनीआहपीनाला ……!

2) लापता सूरज

ई पानी बेपानी बा
एकरा से के पियास बुझाई ?

एह से के नहाई
मलि-मलि के देह
एकरा में त
मिलल बा आर्सेनिक।

हवा में साँस लीहल
कठिन बा
गंगा ,सरजू, आ राप्ती में
मारल डुबकी
कठिन बा
घाट प काई बा
ठेहुना में बाई बा
ना एकर दवाई बा
साँईं के कतो नइखे
अता-पता
लापता बा हमार
सूरज दुपहरिये में !

3) केवना डाढ़ि प कोइलर

आम-महुआ के उजरि गइल
सउँसे बगइचवे
केवना डाढ़ि प बइठि
बोलिहें कोइलर

के गाई फाग आ चइता
बीता भर के मास्क बान्हि के
मुँह प।
के बजाई झाल
ढोलक आ डफ
के कढ़ाई बोल
फाग आ चइता के
तिवारी बाबा ना रहि गइलन
उन्हुकर बबुआ परइलन
बंबई परदेस

गाँव के घर
ढहि -ढिमिला गइल
शहर साँचो का त
आबाद भइल !

4) माई रहे से माइए रहे

माई रहे से माइए रहे
जस के तस
जइसे काल्हुए के जनमल
जनमतुआ होखसु
ओकर बबुआ

बबुआ बबुए रहलन
जनमतुआ से जवान भइल रहलन
सरहद प जाए जोग
बात -बात प रिसियासु
बमकसु छने -छने

एक दिन आइल अइसनो कि
उन्हुका ना अड़ाइल
आ चलि गइल कटार
किरोध में
माइए के गरदन प
बहि चलल धार रकत के
रँगा गइल माटी
आँगन के

बबुआ त बबुए रहलन
भागे लगलन लेके
माई के माटी भइल देह
आ जात-जात दुआरे के सोझा
पहिलकी गली में
फेंका गइलन मुँहकुरिए

घवाहिल भइलन
भल से चूए लागल
मुँह से खून त
माई के करेजवा बोलल–
‘‘ आहि रे मोर बबुआ चोटा गइलऽ ……! ‘‘

माई रहे से माइए रहे
जस के तस
जइसे आजुए जनमवले होखे बबुआ के
बबुआ बबुए रहलन
अपना के जनमतुआ से जवान जानसु !

5) झूठ के थूनी प टिकल दुनिया

एह दुनिया में काम बा
जबुनके के
नीमनका के ना

एही से नीमनका लोग
ना रह पावे
ढेर दिन ले
एह दुनिया में
ओह लोग के विदाई
हो जाला जल्दिए
ऊ लोग ना बना पावेला
केवनो बेढब तालमेल

अझुराइल गोला
बनल रह जाले जिनगी
काँच सूत के
सपूत बने के चक्कर में
ऊ हो जाला लोग
शिकार दनवादूत के

टूटि -टूटि के
बिखरि जाला लोग
धूल में

धूरखेल खेलल
ना होखे बात
सभका बस के।

रंगदारी ना चला पावे सभे
होशियारी ना दिखा पावे सभे
हबकि के बोलल भा काटल
ना सँपरेला ऊ लोग से

आगे के छनल थरिया
लूट लिहल गरीब के
छज्जा के
खपड़ो आ नरिया
ऊ लोग से ना होखे
हमरा अब ई बुझाला कि
सच्चाई प ना
झूठे के थूनी प
टिकल बिया
ई सोगहग दुनिया

नीमनका ना
जबुनके के रंगे से
रँगाइल बिया
साहु जी के दोकान के
हरियर-पियर आ
ललकी मये बुनिया!

– 631/58, ज्ञान बिहार कॉलोनी, कमता, लखनऊ- 226028

(पाती के दिसम्बर 2022 अंक से साभार)

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(1)
अनुपलब्ध
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सहयोग राशि - एगारह सौ रुपिया

(3)

24 जून 2023 दयाशंकर तिवारी जी,
सहयोग राशि - एगारह सौ एक रुपिया
(4)
18 जुलाई 2023
फ्रेंड्स कम्प्यूटर, बलिया
सहयोग राशि - एगारह सौ रुपिया
(7)
19 नवम्बर 2023
पाती प्रकाशन का ओर से, आकांक्षा द्विवेदी, मुम्बई
सहयोग राशि - एगारह सौ रुपिया

(11)
24 अप्रैल 2024
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सहयोग राशि - एगारह सौ रुपिया

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सुतला मे, जगला में, चेत में, अचेत में। बारी, फुलवारी में, चँवर, कुरखेत में। घूमे जाला कतहीं लवटि आवे सँझिया, चोरवा के मन बसे ककड़ी के खेत में। - संगीत सुभाष के ह्वाट्सअप से


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