चिन्ता में झटकल जात एह देश के राजनीतिक जमात (बतकुच्चन – ११८)

by | Jul 17, 2013 | 0 comments


बरखा के मौसम बा. झटास झटहा जस लागे लागत बा. बरखा के पानी के बौझार जब हवा के झोंका से उड़ के एने ओने आवेला त ओकरा के झटास कहल जाला. . झटास संगे आइल पानी के बूंद कबो कबो चोट जइसन लागेला बुझाला कि केहु झटहा चला के मारत बा. झटहा छोट छड़ी के कहल जाला आ ओकरा के फेंक फेंक के गाछ पर फरल फल तूड़ल जाला. आ एही से बन गइल झटहेरल. कवनो गाछ के पूरा झार लिहल जाव त कहल जाला कि पूरा झटहेर दिहल गइल बा. ठीक ओही तरह जइसे देश में सेकूलरिज्म का झटहा से वोट के गाछ झटहेरल जात रहेला. नक्सली आ आतंकी केहू के घेर के मार देसु त केहु बोले वाला ना होला बाकिर अगर कवनो नक्सली भा आतंकी के पुलिस मार देव त चारो ओर से कुकुरबझाँव होखे लागेला. पता ना कतना मानवाधिकारी आ सेकूलर वक्ता बरखा में निकलल ढेबुसा बेंगन का तरह चिल्लाए लागेलें. लागेला कि एह देश में अधिकार बा त बस आतंकी आ नक्सलियने के. आ एही चिन्ता में एह देश के बड़हन राजनीतिक जमात झटकल जात बा आ अइसन चिंता जता जता के वोट झटकले जात बा. अब झटकल के चरचा आ गइल त बता दिहल जरूरी बा कि झटकल के तीन गो माने होला. एगो माने होला जब केहू के बुड़बक बना के भा जबरिया ओकर कवनो चीझु ले लिहल जाव. दुसरका माने होला तेज चलल. तनी झटकाहे चलऽ देरी होत बा. अब अतना त झटकल आवत बानी अउर कतना झटकीं? आ तिसरका माने होला जब आदमी कवनो चिंता भा बेमारी से दुबरा जाव, कमजोर लउके लागे. कहल जाला कि फलनवा बेमारी से झटकल बा ना त अतना दुबर कमजोर ना लागत रहे. अब उत्तराखंड में अतना बड़ तबाही आइल. हजारन लोग मर गइल. पता ना कई सैकड़ा लाश एही तरह सड़ गइली सँ आ ओकनी के अंतिम संस्कार ले ना हो पावल. तनी सोचीं कि अगर अइसने कवनो दोसर दुर्घटना दोसर धार्मिक जमात का संगे भइल रहीत त कतना चिल्ल पों मचल रहीत. मुआविजा के बरखा होखे लागीत. बाकिर एह घटना में मुआविजा त दूर के बात कतना दिन ले हजारन लोग भूखे पियासल तड़पत रह गइल बाकिर कवनो सहायता ना चहुँपावल जा सकल. का एह देश के बहुसंख्यक जमात के चिंता केहु के नइखे? का ओकर काम खाली झटहा झेले के बा, झटहेराए के बा ? का ओकरा खातिर केहु झटकल ना लउकी ?

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