बगड़ी- गउरइया संबाद

by | Aug 19, 2018 | 0 comments

– आनन्द संधिदूत

जब आँगन का बीच में डँड़वार
आ खेत का बीच में सड़क निकललि
त खेत क बगड़ी
आँगन का गउरइया किहें आके कहलसि कि
लऽ ए बहिनी
तोहके त आराम हो गइल
एक बखरी से दू बखरी हो गइल
दूनो ओर दाना-दूनी, जूठ-कांठ गिरी
आ तोहार बाल बच्चा मजे में रहिहन
मरन त हमार बा
खेत क जोत जेतने कम भइल जाता
लिट्टी पर लासा ओतने बढ़ल जाता
आगे भगवान मालिक बाड़न।

गउरइया खरहरा धरती पर
चोंच रगरत कहलसि
कवन आराम भइल ए बहिनी
अब सिरमिट कंकरीट के स्लैब ढराता
एतना ऊँच पर कबूतर बटुराता
बाज-चिल्होर मँड़राता
हमनी के त कहीं रहबासे नइखे
मूँड़ी ढँके भर, अण्डा सेवे भर
छान्ह-छप्पर पास नइखे
खेतवो का बस्ती भइले कौन फायदा भइल?
कहीं लोहा बिकाता कहीं लक्कड़
कहीं जहर धइल बा कहीं माहुर
गांव के बाल गोपाल त शहर चलि गइलन
अब गाँव में के बा
जे जूठ गिराई दाना दूनी छिंटवाई,
शहर सुरसा हो गइल
आ गाँव बाँझ
अब अइसन बेमारी, आवतिया कि हम चिरई-चुरगुन के
परिवार ना जाति के जाति साफ हो जाति बा
अब सब अपना में लागल बा
हमनी के चिन्ता करे वाला के बा?

बगड़ी दूनो बखरी का डँड़वार पर धइल लिद्दी पर चपकल
दूनो ओर तकलसि
आ गउरइया से बोललि कि
जब बीच खेत में सड़क
आ बीच आँगन में डँड़वार पड़ल
त जवना जानी का पइसा रहे ऊ खुस भइली कि चलऽ
हँउजार से जीवन बाँचल
अब सान्ती से दू कवर खाइल जाई
हाड़ा का झोंझ से बरकल जाई
जे टिटकउड़ी रहल
दीन हीन रहल
ऊहो खुस भइल कि
चलऽ डँड़वार पार के राजपाट देख के
लइका त ना अहकिहन सऽ
धरती चिराइल त सब खुस भइल ए बहिनी
एगो हमरा छोड़ के
हम जानत रहलीं कि खाली हमरे गोड़
लिट्टी का लासा पर ना चपकी
ऊहो लोग चपके वाला बा
जे धरती के बँटले बा
सड़क ढरले बा
डँड़वार जोड़ले बा।

जे खुसहाल रहल ऊ सड़क का जरी
हिस्सा लेके दोकान निकाले चाहल
जे फटेहाल रहल
ऊहो गाँजा क बिहटी बम से बार के कहल कि, कवन
सरवा सड़क का जरी हिस्सा लेही
अभी बाप-दादा का लाठी-लउर के
बँटवारा नइखे भइल।
आ देखते देखत
डँड़वार त अउर पोख्ता हो गइल
बाकिर खेत का बीच के सड़क
खून से लाल होके ओदरि गइलि।

आ एही खून के झँखत
बहेलिया के इन्तजार करत
बगड़ी बोललि
कि, लऽ ए बहिनी
आंगन में डँड़वार पड़ले
आ खेत का बीच से सड़क निकलले
न तुहीं खुस भइलू न हम
न डँड़वार डाल के खुसी चाहत देयाद
सब लिट्टी का लासा में चपक गइल ।

गउरइया डूबत सूरज के ताकत बोललि
हमहूं ना रहब ए बहिनी
खाल में भूसी भरल अजायब घर में लउकब
डँड़वार पारल आँगन में ना!


  • पदारथलाल की गली, वासलीगंज, मिर्जापुर (उ0प्र0)

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सुतला मे, जगला में, चेत में, अचेत में। बारी, फुलवारी में, चँवर, कुरखेत में। घूमे जाला कतहीं लवटि आवे सँझिया, चोरवा के मन बसे ककड़ी के खेत में। - संगीत सुभाष के ह्वाट्सअप से


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