वापसी

by | Apr 25, 2010 | 1 comment

– डा॰ सुभाष राय

हम जरूर लउटब
घाटी से निकलब
स्याह चट्टान प
रोशनी बिछावत
रेगिस्तान की सीना से
झरना जइसन फूटत
बालू में जिनगी बोवत
बढ़ब आ तुहार मटियाइल
हाथ चूमि लेब.

जब तुहरी बखरी में
अन्हार कम होखे लगी
तुहरी अंगना में झुंड क झुंड
सोनपाखी उतरे लगिहें
त समझिहा कि हम
लौटत बानी.

उजियारे क गांव
घन जंगल, घुघुवात नदी
अऊर करियई चट्टान
के ओह पार बा.

बहुते लोग गईल
ले आवे खातिन
बचा के अंजुरी भर धूप
बाकिर लौट ना पवलस केहू
भुला गईल होइहें
हजार बरिस पुरान
निर्मम चट्टान के बिच्चे से
टेढ़-बांकुर रस्ता
रोशनी के गांव क.

ई पेड़ देखि के थकले
या उदास भइले क समय नइखे
हमके जाये द
हम जरूर लउटब
किरनिन क जुलूस लेके आइब.

हमरे पास तुहार
गुच्छा भर मुस्कान बा
तुहार झोली भर याद बा
जब कबो लगी की हम
अकेल हो गईल बानी
तुहरी याद से खेलब
जब कबो थाके लगब
उनहीं के बिच्चे बइठ जाइब
जब अन्हारे से डेराइब
संका से घेरा जाइब
तुहरी मुस्कान से उनक
पांखि कतर देब
संका के रस्ता देखब
त सुतल याद जगा लेब.

सब मौसम से बेखबर बा
बहुत निंदियाइल
गांव-गांव, बस्ती-बस्ती में
करियई भुतही राति
पसरल बा
बाढ़ क पानी
अँगना ले आ गईल बा.

केहू के का मालूम बा की
चम-चम चमकत
योजना क जाल फेंकत
रात जब आवेले
त ओकरा जासूस बनि के
हवा रहेले ओकरे साथे
बख्तरबंद आन्ही
ओकरे रखवाली करेले.

अउर रात बढ़ेले त
गांव-गिरांव में टिमटिमात
दीया के भी बुता देले
सड़क अउर मैदान के
करिखा की गहिर
धुंध में डुबा देले
आ जे सुतल बा
ओकरा आंखि में
सपना क गुलाबजल
छोड़ि देले
एतरे बढ़ेले राति.

जबले सपना चलेला
सूरज जइसन सच लगेला
एहि से सपनन क फऊज
लेके आवेले राति
सपना में जब मजूरिन
पकल फसल क गीत गावेले
सब लोग खुस हो जाला
गेहूं की दाना जइसन ऊहो
पकि जाले गावत-गावत.

सपना में बखत पर
बरसेला खेत में पानी
बाढ़, आन्ही आ महामारी
ना आवेले
बगइचा पाकल पीयर
फलन से लदि जाला
सपना में कोयल कूकेले
सपना में हजार साल
आगे पहुंचि जाला देस
सतजुग आ जाला धरती प.

जब से जागल बानी हम
माटी कई बेर
उलटि-पुलटि गईल बा
बहुत जियादा बखत ना बा
डुबत चीख, मरत अवाज
अउर तेज हो गईल बा.

करिया पहाड़ से निकलल
बौखलाइल नदी हमरी ओर
बढ़लि आवति बा
एसे पहिले की
सभै कुछ डूबि जाय
तुहार गुच्छा भर मुस्कान
फेंकल चाहत बानी
नींद में अन्हुआइल लोगन प
ई सोचि के की
बिस्तरा छोड़ि के
उठि जायं सब लोग
झूठ-मूठ के
सपनन के खिलाफ.


परिचय :

हमार जनम मऊ नाथ भंजन के एक ठो छोट गांव बड़ा गांव में जनवरी 1957 में भईल. शुरू क पढ़ाई-लिखाई गांवे में भईल. मऊ से स्रातक भइले के बाद गोरखपुर, काशी अउर इलाहाबाद क खाक कई साल छनलीं बाकिर कवनो बात ना बनल. कारन ई रहल की जब देस में अपातकाल लागल त घर भर के मना कइले के बाद भी शहर में जाके नारा लगा देहलीं, फेर पुलिस पकरिके जेल भेज देहलस. खैर, प्रयाग में जाके ठीहा मिलल. एगो अमृत प्रभात नांव क अखबार बा, उंहा नोकरी पा गईलीं. 1987 में प्रयाग से आगरा आ गईलीं. आज अखबार में समाचार संपादक बनि के. हमार असली पढ़ाई-लिखाई अगरे में पूरी भईल. हिंदी साहित्य आ भाषा में स्रातकोत्तर कके अखिल भारतीय विश्वविद्यालयीय शिक्षक चयन परीक्षा पास कईलीं. फेर संत कवि दादू दयाल के कवितई प शोध पूरा भईल. आगरा विश्वविद्यालय से डाक्टरेट क डिग्री मिलल. साथे-साथे लेखन क काम भी चलत रहल. लगभग कूल बड़-बड़ साहित्यिक पत्रिकन में हमार आलोचना, कविता, कहानी, व्यंग्य छपेला. लोकगंगा, शोध-दिशा, समन्वय, अभिनव कदम, अभिनव प्रसंगवश, वर्तमान साहित्य, आजकल, मधुमती, वसुधा में हम अक्सर छपत रहिलां.

डा॰ सुभाष राय के ब्लाग

ए-158, एमआईजी, शास्त्रीपुरम, आगरा
फोन-09927500541

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1 Comment

  1. santosh Kumar

    dr, saheb
    pranam
    bahut nik ba. bhaojpuri mai ke sewa karat rahab, aasa ba.
    delhi se du go bhojpuri ke patrika nekalela
    apan rachana bhejab.
    sadhuvad
    santosh kumar
    editor: Bhojpuri Jingi
    Sub-editor: Purvankoor
    Add :RZH/940, Janaki Dwarika Niwas, Rajnagar-II,Palam Colony, New Delhi-110077, 09868152874.

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19 नवम्बर 2023
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सहयोग राशि - एगारह सौ रुपिया

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सहयोग राशि - एगारह सौ रुपिया

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