‘सूर्पनखा’ का नाक के चलते असों होली ना मनाइब.

by | Mar 4, 2015 | 0 comments

N_Pandey_Dehati

– नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती

मनबोध मास्टर दुखी मन से कहलें – असों होली ना मनाइब.
मस्टराइन पूछली- काहें?
ऊ कहलें – सूर्पनखा की नाक की चलते.
बात सही बा. जहां-जहां गड़बड़ बा, बूझीं सूर्पनखा के नाक फंसल बा. हम्मन क प्रेम के, स्नेह के, आत्मीयता के, सहयोग के, सहानुभूति के, उपकार के, उदारता के, देशभक्ति के कवन सिला मिलल? सत्य के सूरज अस्त ना भइल बा, बादल क कुछ टुकड़ा के घेरले अन्हार ना हो जाई. जल्दिए सब कुछ साफ हो जाई. जनता बुझति बा, समझति बा. ई प्रजातंत्र ह. सिस्टम में कुछ दोष आइल बा. व्यवस्था डंडीमार भइलि बा. धिक्कार बा अइसन अधिकार के जवना के नाहक प्रयोग कइल जाता.

प्रजातंत्र क पेड़ पर कोयल ना अब कउवा किलोल करत हवें. चारों ओर चमगादड़ के बोल सुनात बा. न्याय आ अन्याय के अंतर बस एतने रहि गइल बा – ‘जेकर लाठी ओकर भैंस’. बेकारी, बेमारी, बेरोजगारी आ भुखमरी क बीच घनघोर महंगाई में आदमी जीयत बा. बेर-बेर, कई बेर उहे फाटल पेवल सीयत बा. केतना सुग्घर रहे आपन देश भारत. हिंदुस्तान कहल जाता लेकिन हिंदी आ स्वदेशी से परहेज कर के.

अंगरेजी आ विदेशी से मोहब्बत करहु वाला कम ना हवें. विदेशी के चेहरा गोर लउकत बा, हृदय में झांक के देखीं केतना काला बा. सूरत पर गइला के जरूरत ना बा. रामायणो काल में सुंदरता क चलते बहुत भ्रमजाल फैलावल गइल. तबहियों बहुत दिक्कत भइल, आजुओ दिक्कत बा. बहरहाल! सूर्पनखा के नाक ना रहित त ‘रामजी’ के पुरुषार्थ के कथा रामायण बन के हम्मन के बीच कइसे आइत. रामचरित मानस लोग कइसे गाइत. सूर्पनखा के नाक ना रहित त राम-रावन युद्ध ना होइत आ अंत में रावन ना मराइत. नककटैया के लीला, रामलीला में बहुत प्रसिद्ध भइल. आज फेरू जरूरत बा नकटी के नाक काट के, नकेल डाल के, नथूना ठेंका दीं. काहें की सूर्पनखा सिंबल ह राक्षसी प्रवृति के. मनुष्यता के बचावे खातिर संकल्प करीं, उठा लीं हथियार आ काट दीं सूर्पनखा के नाक. ‘ना रही बांस ना बाजी बंसुरी’. अब ए कविता के अर्थ निकालीं. अर्थ के अनर्थ जनि करब, नाहीं त सजो मेहनत व्यर्थ चलि जाई.

‘सूर्पनखा’ के नाक का चलते, ‘देशभक्त’ क मान न बा.
बिका गइल ऊ केकरा हाथे, करत काहे सम्मान न बा..
योगदान के भुल गइल ई, मद में अइसन बर्ताव करे.
अधिकार क दुरुपयोग कर, अतिवादी व्यवहार करे..


अपना बारे में देहाती जी के कहना बा –

देखने में भले गोरा नहीं , थोडा सा कम काला हूं
कट्टा बम बारूद नहीं, लेकिन चुभने वाला भाला हूं
हिंदी के अखबारों में, भोजपुरी का व्यंग्य लिखूं
शहर में रह कर बना देहाती, ऐसा पेपर वाला हूं.

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सुतला मे, जगला में, चेत में, अचेत में। बारी, फुलवारी में, चँवर, कुरखेत में। घूमे जाला कतहीं लवटि आवे सँझिया, चोरवा के मन बसे ककड़ी के खेत में। - संगीत सुभाष के ह्वाट्सअप से


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