• विष्णुदेव तिवारी

फूआ, माने गिरिजा फूआ-पुरुषोत्तम के बाबूजी के छोटकी बहिन- बाति ए तरी पागेली जे शब्द केनियो ले भरके ना पावसु लोग। अनचक्के में केहू के खींचि ले जइहें अतीत के अखदवनी खोह में जहाँ हर अदिमी अनयासे खरोंच लगवावे खातिर जाइल चाहेला, जेमें भविष्य के अगाध शून्य के कम से कम एक बून सगुन के खून त चढ़ा सके। विलक्षण दिमाग बा उनुकर। याददाश्त में सज्जी घटना दर्ज बाड़ी स- दिन, महीना, वर्ष-सभ सिलसिलेवार।

पुरुषोत्तम के बेटी डोरा आ ओकर चचेरा भाई बीर के बेटी बउली दूनो बे ओरिचन के खटिया प कूदत-फानत रहली स। पुरुषोत्तम उहनी के मयगर मन से देखलस, कहलस ना कुछुओ। ऊ कोठरी में एह खातिर आइल रहे जे झोल मारत खाट
में ओरिचन लगा दे। तनी सुस्ताए खातिर पलंग प ओठँघले रहे तले बिजुरी के तरंगन के माध्यम प सवार होके फूआ छने में ओकरा आगे झलमला उठली।

-सूते लगलऽ का, बबुआ?

पुरुषोत्तम सूतत ना रहे। ऊ त चाहत रहे जे रेंगनी प से चदर खींचि के गोड़ तोप ले बाकिर तब डोरा आ बउली ओकरा के देखि सकत रहली स। अइसन ऊ चाहत ना रहे। जहाँ ऊ रहे, ओहिजे ऊहो रहलीं स-नगीचो-पास कहि सकेला अदिमी, एह से ई असंभवे रहे जे ऊ ओकरा के ना देखँ स। ऊ लफलर के कान में नीक से बन्हलस आ ओकरा दूनो छोर के बीचे तरहथिन के अर्द्ध-प्रार्थना के मुद्रा में क के सुतला नियर बेखबर हो गइल। अब, जदि, डोरा आ बउली ओकरा के देखबो करितीं स, तबो-छउके-कूदे में सँकोच ना करितीं स। जदि करितीं स त कइले का जा सकत रहे। ओइसे लइकिन के ध्यान ओकरा ओर गइल ना रहे आ ऊ बिना कवनो ताप-झाम के अपना में रम गइल रहलीं स।

बुचिआ खेले में रमल रहलीं स आ पुरुषोत्तम गते-गते अतीत के खोह में सरकत चलल जात रहे।

फूआ कहले रहलीं- ”का जाने तोहरा इयाद बा कि ना जे एक बेर खटिया से उतरत खा ओरिचन में फँसि गइल रहलऽ। इयाद बा, मनोहरपुर में तब डोरा ले छोटे होइबऽ चाहे ओकरे बरोबर। छोटकी भउजी भइया के संगे घूमे-ओमे गइल रहली। हम छत प ले सूखल गहूँ उतारत रहलीं। त तूँ ओरिचन में अँटकि गइल रहऽ। एगो बिलार रहे। का जाने, भउजी अपना नइहर ले नेग-नेवता में पवले रही कि भइया के कवनो साहेब-सुबहा भेंट-वेंट कइले रहे, राम जानुस। ऊ पोसुआ रहे आ आधा सेर दूध एक बेरा पी जात रहे। त ओह बिलार से तू बहुते डेरात रहलऽ। साइत ओकरे डरे उतरि भागे के चक्कर फँसि गइल रहलऽ। हम देखलीं त छते प ले बोल पड़लीं। आ दउरकिए में उतरि अइलीं। हमरा के देखि तोहरा लोर बरिसे लागल। तोहार रोआई हमरा से ना बरदास होत रहे- इचको ना। हमूँ रोवे लगलीं। आजु जब अपने सुअरी के छवना हो गइल बाड़े स त मोह-ओह पहिले वाला रहल ना आ तूहूँ बड़ हो गइल, बाप-बाप बनि गइलऽ त पहिले जइसन कुछु होत-वोत नइखे बाकिर ओ घरी त तूंही प्रान के अधार रहलऽ।“ हम रोवे लगलीं त तू थपरी बजावे लगलऽ- ”जिया मोर मुसकिल में परि गयो रे……। ओ घरी इहे गीत खूब बाजत रहे रेडिओ-ओडियो प। त तू एकरा के गावत जात रहलऽ आ हम तोहरा के कोरा में उठवले-उठवले दरवाजा के बहरी ले भागल-भागल देखत अइलीं तोहरा गोड़ ओड़ के जे कतहूँ छिला-ओला त ना गइल घनचक्कर।“

बउली खटिया प गोड़ पसारि दिहलसि। डोरा नीचे उतरलि आ ऐने-ओने कुछु खोजे लागलि। पुरुषोत्तम, बे-गरदन घुमवले, आँखिन के बायाँ ओरि तिरकट क के, देखलस जे ऊ सनूक प रखल डोलची में ले शॉल निकालत बिया। शॉल ले के ऊ बउली के लगे आ गइलि। ‘बड़ा अजीब लागेला’ – पुरुषोत्तम सोचलस- ”अपनी लइका ले अधिका भाई के लइकन में नेह लगवले लोग लउकेला बाकिर आपन लइका होखते कर्र से हृदय दरकि काहें जाला दू फाट में? नेह-छोह त तबे कहल जाई जब बे-स्वारथ, बिना अहसान जतवले, बड़ छोट के अंतर से सबके भावना आ जरुरत के अपना हैसियत के, मोताबिक पूछ होखे।“

”-मिलि गइल दीदी?“ शॉल देखते बउली झूम उठलि।
”- हँ रे बाकिर तू पटुआइल रहु। चिचिअइबे त तोर माई जानि ना जाई?“
”- ठीक बा दीदी। …….. बाकिर तू हमरा के मरबू ना नूं?“
”काहे के मारबि? बुचिया के केहू मारेला का, बोलऽ?“
”- ना मारेला नूँ दीदी।“…. आँखि फइला के बउली कहलसि- ”हमूँ त इहे कहेनी जे डोरा दीदी हमरा के ना मारेली बाकिर आजी कहेली जे बड़ा हथछुटुक लइकी ह डोरा। दाँत गड़ा दीही चाहे नोहे नखोर दीही। दीदी, आजी ठीक ना नूँ कहेली?“ डोरा जवाब ना दिहलसि।

पुरुषोत्तम मने-मने खुश होत रहे आ तनी दुखितो। बुचिया कतना निश्छल बाड़ी स। कतहूँ व्यंग नइखे, कतहूँ मिलावट नइखे। जवन सोचेली स, कहि देली स, जवन सुनेली स, कहि देली स। इहनी के ममत्व के परिधि में आसमानी बड़का गड़हा नइखे जे समूचे सौरमंडल के गटकि जाई आ ढेंकारो ना लेई। एहिजा त जवन बा-प्रत्यक्ष आ जीवंत बा। बाकिर…. जब इहनियो के बड़ हो जइहें स त.. … का इहनियो के नस में करिया रकत रेंगे लागी?

”एक बेर भइया आ भउजी सँगे बहरा जात रहीं।“ फूआ कहले रही- ”तूँ आँचर-वाचर छोड़बे ना करऽ त तहरो के लेबे के परल। डुमराँव उतरि के रेक्सा भा टमटम से ओहिजा जाइल जात रहे। अब त बसो जाले उहाँ। चारि आदिमी रहे त टमटम कइल गइल। घर से चलल रहीं जा तबे से आकास बदरिआह होखल आवत रहे बाकिर ई अनेसा त नाहिए रहे जे बीचे राह में घनघोर बरखा होखे लागी। बाकिर भइल ऊहे। एकाध कोस रहता अबे बाकी रहे जे लागल कइ गो पम्प सेट चलि गइले स। छने में जइसे समुंदर उबिछाए लागल-घनर! घनर! बाबू रे, हवो ओसहीं उमखि-उमखि के कूदत रहे। आधा लूगा देहि में लपेटले, आधा से तोहरा के तोपले, सोचत रहीं जे अब का होई? गतरे-गतर पानी चूअत रहे। जेने देखऽ ओनिए बरोहि अस बूनी के धार-लागे जे ध के चढ़ि जा त इनरासन-ओनरासन में चहुँप जा। त अइसने होत रहे बरखा। तबे अइसन भइल जे जहाँ टमटम रहे नू, ओहिजा से एक बिगहा हटि के बिजुरी गिरलि। घोड़ा चिहुँकि के टमटम घिसिरावत भागल सरपट। तबे दोसरकी आ तिसरकी बिजुरी एकेके मिनट प। बिना चाभुके खइले घोड़ा महराज रेल हो गइले। आ भइया के सूरत देखितऽ त कहितऽ! अब नू छीमानुख-छीमानुख बा। ओ घरी त जनाइ जे सइ बाभन मरला के मुँह ह।“ हिचकिया के रोवे लागल रहलें- ”बुचिया, बड़ा, जुलुम भइल रे। हमनी के मरि जाइबि जा त कुछुओ ना होई बाकिर एकरा कुछु हो हवा गइल त मूँह ना देखा सकबि जा।“ एक बेर त हमरो मन कइल जे खूब रोईं-ओईं बाकी बाद में हमी सभके सबुर धरवलीं।…. आ…. ई जे तोहार चाची-वाची हई नूं!- बउली के आजी, बड़ा सिधवा रहलीं, बाबू। कबो भूलो से जे कड़ुआ सबद निकालसु। उहें जब हाथ भाँजि-भाँजि उघटा-पुरान करेली त करेजा में दराँती चले लागेले बेटा। तोहरा के बेटा से कम कबो ना कइली।

मने-मन जरि बुता गइलन पुरुषोत्तम, बहुत कइलीं, मनली; बहुत कइलीं बाकिर कब कइलीं, इहो त सोचऽ? जबले उनुका लइका ना भइल रहे। पहिलका बेटा होखते ऊ दुलार केने बिला गइल? बीरन के ऊहो त सँझवत के दीआ अस चपकवले रहत रहे। उहे बीरन जब खेलत-खेलत खटिया से नीचे गिर गइल रहे, त चाची कइसे दूथप्पड़ जमा दिहली- ”टुकरखोर“। तब सभ कुछ खतम ना हो गइल का? जी भर के दुलारऽ आ ही भर के कोसऽ। तश्तरी भर खियावऽ आ परात भर उगिलवा ल! ई त ना भइल छोह। एह से त नीक रहे जे माई-बाप से हीन लइका के जहर दे दिहल जाइत।

बउली दुलहिन बनल बिया। डोरा शॉल ओढ़ा के ओकरा के घूहवाली बनावत बिया। फेरु डोरा घूहवाली बनऽतिया। पारा-पारी दूनो दुलहिन बनतारी स। जे दुलहिन नइखे बनल ऊ मुँह देखे वाली बनऽतिया।

”बाकिर जब मुँह देखावल जाला त आँखि बन नू कइले रहल जाला, दीदी?“ बउली कहलसि।
”-काहे?“ डोरा पुछलसि।
”-काहें का। माई त असहीं करेले।“
”-तू देखले बाड़े का?“
डोरा साठि साल के बुढ़िया अस मुँह बनवलसि। कहलसि- ”तबे त कहऽतानी। काल्हु चालो मइया आइल रहली, त आजी, माई के मुँह देखवले रहलीं कि ना बोलऽ?“
”-आँखि काहें बन क लिहल जाला, बउली?“
”-एतनो नइखू जानति भकलोल।“
बउली के अपना ज्ञान पर गर्व हो आइल- ”आरे, बुढ़िया के आँखि में कींचर होला। दाँत टूटल रहेला, त ओकरा से डर लागेला नूं। त आँखि खोलि के काहें रखे……..?“
”- हमरा आँखि में त कींचर नइखे नूँ बउली।“ डोरा बड़ा निरीहता से पूछलसि।
”- नइखे, नूं तोहरा आँखि में कीचर बा नूं हमरा आँखि में कीचर बा ए से हमनी के आँखि खोलिए के राखे के। हूँ नू बुचिया।“ डोरा कहलसि आ धधाइ के बउली के गाल चूमि लिहलसि।

एगो आँगन। दू गो परिवार। दूनों में बोलचाल नइखे। जब पटते नइखे त जीभि हिलावे के कष्ट काहें? आदिमी लासा से ना सटे, सटिए ना सके।

अच्छा धंधा बा। आपन कूड़ा-करकट मुफ्त विरासत छोड़त जा। इतिहास-पुरान के साँच-झूठ कहानी दूनो पलरा प तउला सकेले। तउलऽ, पासंघ मत देखऽ।
”- दीदी, भूखि लागल बा।“
”- जइबू?“ – डोरा पूछलसि।
”- फेरु माई आवे दी?“
”- त?“

”-कुछ देर अउरी खेल लिहीं जा।

डोरा दियरखा प राखल दिआसलाई उठवलसि आ बउली से कहलसि जे अन्हार हो गइल बा, ढिबरी जरा लिहल जाउ। पुरबवारा जँगला पर ढिबरी रखात रहे। लइकिया ढिबरी जराइ के ओहिजा ना रखली स। ओकरा के पुरुब-पच्छिम बिछावल खटिया के मुँड़तारी, बायाँ पार प, रखल गइल।
खेलो के रूप बदलल- ”ओका बोका तीन तड़ोका, लउआ लाठी चनन काठी…. ढोंढिया पचक जो। लातालुत्ती। लातालुती। लातालुती।

लातालुती जम गइलि। ऊ डोरा आ बउलिए में होत रहे बाकिर लात से डर लागल ढिबरी रानी के-पलक झपकते किरासन बोकरत खटिया से नीचे। लइकी खेलत रहली स। आगि सिरहाना लटकल बिछवना के धरत झपाक
से खटिया प चढ़ि गइलि। एक बाएके भक् से अंजोर। डोरा आ बउली एके संगे चिचिअइली स- ”माई रे।“

पुरुषोत्तम आँखि बन कइले-कइले कुछ-कुछ नीनि में भरमे लागल रहले। डोरा आ बउली अतना डेरा गइल रहलीं स जे उहनी से उतर भागल संभव ना रहल। ऊ खटिए प उछलत-कूदत रहली स। आगि गँवे-गँवे खटिया के लीलत जात रहे। एक-ब-एक जइसे खतरा के साइरन बाजि गइल। भीतर ले घबराइल आवाज अइली स- ”का भइल?“

पुरुषोत्तम के ई सोचे के मोहलत ना मिलल जे अचानक आगि लागि कइसे गइलि? जब ले कुछु सोचित ऊ, ओकरा लागल ओकरा देहि में करेंट आ गइल होखे। ऊ समूच चेतनता में पलंग से नीचे कूदि गइल आ एक-एक बाँहि में एक-एक लइकी के दबवले सनाक से चउखट से बहरिआ गइल।

ओकर दिमाग खदके लागल रहे।

ऊ संभरे, तले केहू बचियन के ओकरा से छीनि चुकल रहे। के? ओकर मेहरारु? ओकर भावज? ओकर चाची? आखिर के? ओकरा कुछुओ पता ना चलि पावल आ डोरा आ बउली भीड़ि में हाथे-हाथ, गरे-गरे लपिटात रहलीं स। जटाधर महतो-ओकर चाचा-निकसार घर में लँगड़ात दउरले-दउरऽस रे- सरोजवा, झुलना, मदन पांड़े। आरे, आगि लागल बा रे। बतावऽ स रे, केहू जरल-मरल त ना नूं राम?

दस मिनट में आगि बुता गइलि। बे-ओरिचन वाली खटिया जरि गइल रहे। पटिया अउरी पारो साबूत ना बाँचल। एकाध पुरान कपड़ा अउरी बिछावन आ एगो नया शॉल जरि गइल। डोरा आ बउली डेराइल रहलीं स, उनही के कुछुओ ना भइल रहे तबो।

एक दिन असहीं, फूआ से बतिआवत पुरुषोत्तम के अचके इयाद परल जे ऊ पहिले बउलिए के उठवले रहलें। बउली-माने ओकरा चचेरा भाई बीरन के बेटी, याने- डोरा के बुचिया।

(भोजपुरी पत्रिका पाती के 98 वाँ अंक से)

By Editor

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