• रामेश्वर सिंह काश्यप

ताल के पानी में गोड़ लटका के कुंती ढेर देर से बइठल रहे। गोड़ के अंगुरिन में पानी के लहर रेसम के डोरा लेखा अझुरा जात रहे आ सुपुली में रह-रह के कनकनी उठत रहे जे गुदगुदी बन के हाड़ में फैल जात रहे। कबहूँ, झिंगवा मछरी एँड़ी भिरी आके कुलबुलाए लागत रही सन त सऊँसे देह गनगना जात रहे। कुछ दूर पर सरपत में बेंग टरटरात रह सन आ कवनो-कवनो जब तब पानी में कूद जात रह सन जेकरा से ताल में चक्करदार हल्फा उठे लागत रहे आ तरेंगन के परछाहीं लहर पर टूटे लागत रहे।

झींगुर के अजब मनहूस झनकार हवा में भर गइल रहे। नीम के फूल के गंध से मातल बेआर ढिमिलाइल फिरत रहे। दिन भर के तवँक से अँउसाइल कुंती के मन भइल कि गते से पानी में उतर जाय आ अपना देह के पानी में बोर दे। चुहानी में साँझे से चूल्हा फूँकत-फूँकत ओकर जीव उजबुजा गइल रहे। मारे पसीना के लूगा देंह में सट गइल रहे। कसहूँ जीव जाँत के सब केहू के बीजे करा के फजिरे बरतन बासन मले खातिर पानी ले आवे निकललि रहे। राते में डूभा, छीपा आउर बटुआ पानी में ना फुला दिआई त बिहने जूठ अइसन खरकट जाई कि छोड़वले ना छूटी। बाकि, कुंती से पानी में उतरल ना गइल। अपना देह के आउर ढील कके ऊ चुपचाप बइठल रहलि।

बगले में, दहिने ओकरा घर के दुआर लउकत रहे। निकसार में ढ़िबरी धुआँत रहे। ढिबरी के मइलछहूँ लाल अँजोर में अपना पोंछ से मच्छड़ उड़ावत भँइस लउकति रहे। धवरा बैल कोना में बइठल पगुरात रहे। कुंती के बुझाइल कि ओकर माई सूत गइल होई आ ओकर नाक फोंय फोंय बोलत होई, बाबूजी ओ आँख मूँद के महटिअवले होइहें आ दम्मा के मारे उनकर साँस अदहन लेखा हनर-हनर करत होई। सीतवा, गीतवा, मोतिया, गएत्रिया, अबिलखवा, कअिया सब एके खटिया पर गुड़मुड़ा के सूतल होइहंसन। कवनो के लात कवनो के मूँड़ी पर चढ़ल होई, कवनो के मूड़ी लटकल होई, कवनो के गोड़ खटिया के ओरचन में बाझ गइल होई। अब ओकरा जाके सबके सोझ करे के परी। सब पिल्ला लेखा य-काँय किकिअइहन स आ माई काँचे नीदे जाग के अलगे अनरवाह करी- ”अइसन कुलच्छिन ई कुंतिया बिया, दिन रात लइकन के डँहकावत रहेले, एकर बस चले त ई सब के छछना-छछना के मुआ दिही।“ बाबूजी अलगे अपना खटिया पर से गुरगुरइहें- ”काहे रोवाबत बाड़ि स रे, हमरा के जीए देविस कि ना? एक त हमार जीव अपने खों खों।“ आ ऊ सब के ओइसही छोड़ दे त माई लगिहें बिख बोले- ”एकर रहन देख के त हमार पित लहर जाता। काठ के करेजा हइस। पत्थल ह पत्थल। एकरा कवनो दम-फिकिर हऊ स! लइका मूअ सन भा जीय सन।“

घर का इयाद आवते कुंती के जीव उदास हो गइल जइसे खँखार पर गोड़ पर गइल होखे। कुंती के ना चहलो पर पहिले के याद ओकरा आँख के आगा पंवरे लागल।

कुंती नौ बरिस के रहे तबे ओकर माई मू गइल रहे। ओकरा अपना माई के मउअत सोझा लउके लागल। माई मउराइल बैगन लेखा हो गइल रहे आ ढकना में लाल मिरचाई जरा के टहल ओझा बेंत पटक-पटक के ओझाई करत रहन, फिर माई के मूड़ी एक देने लटक गइल आ बुढ़िया मेहरारू सब सियार लेखा फेकरे लगली स, आजी हमरा के करेजा में जाँत के माई के गुन रो रो के गावे लागल रहे। कुछु दिन बाद बाबूजी आ चाचा मूड़ी छिलवा लेलन, खूब भोज भंडारा भइल आ छौ महीना बाद नइकी माई आइल। पहिले दिन ओठ बिजुका के हमरा के देखते पूछलस- ”तूँही हमरा सवत के बेटी हऊ?“ हम मूड़ी हिला के कहली- ”हूँ।“ तहिया से आज ले ऊ हमार जेतना साँसत कइलस ओतना कवनो दुसमनो केहू के ना कइले होई। के जाने ओह जनम के कवना कमाई से हम दस बरिस में जीयते, छछात नरक के भोग भोग लेलीं। माई के बरसाएने लइका भइल। पाँच गो त मूँ गइलेंस। ओकरो पाप माई हमरे कपारे पर थोपेले कि इहे हंड़साखिन मुअवलस। बाबूजी के दम्मा हो गइल। माई रोज कवनो ना कवनो रोग कछलहीं रहेले। चाचा माइए से आजिज आके अलगा हो गइलन। लइका देखीं त हम, खैका बनाई त हम, भँइस गोसि के सानी पानी करीं, गवत लगाईं त हम। माई अपना हाथे खरो ना टारे। दस बरिस से दिन रात चंग पर चढ़ल रहीला, मिजाज चरखा भइल रहेला, अतनों साँवस ना मिले कि अएना में सुबहिते मुँह देखीं।“ सोचत-सोचत कुंती के बुझाइल कि ओकरा देह में देहे नइखे।

अठमी के चनरमा, सड़ल तरबूजा के फाँक लेखा बाँस के फुलुँगी में अझुराइल रहे फीका, उदास, सकुचाइल। मारे धूर के असमान सिलेट लेखा साँवर लागत रहे। पानी में डूबल-डूबल कुंती के गोड़ कठुआ गइल रहे, पेड़ुरी चढ़े लागल रहे। ऊ गते से आपन गोड़ पानी से बाहर निकाल लेलस। एक मन कइल कि घइला भर के घरे चलीं। ढेर रात बीत गइल। बाकि ओकरा से टकसल ना गइल, आलम ओकर गतर गतर बान्ह देले रहे। कुंती गते से एगो खपड़ा टकटोर के अपना एँड़ी के मइल छोड़ावे लागल। चिंता के टूटल धागा फिर जोड़ा गइल। एने तीन साल से त हमरा अपने चुप-चाप बइठे के मन ना करे। जहाँ अकेले बइठीं मन में किसिम-किसिम के विचार उठे लागेला। ई सभ सोचला से का फयदा?
बाकि जहाँ इचिको सँवस लागल कि फिर बैताल ओही डाढ़ पर। मनवाँ खरावे बात देने झुकेला। एही से जान बूझ के हरदम अपना के काम में बझवले रहीला। जेतना हमउमरिया सखी सहेली रही सन सभ के बिआह कहिए भइल। कै गो त लरकोरिओ हो गइली सन। जहाँ ऊ सब बइठिहँ सन। खाली ससुर के बात, अपना मरद के बात। खोद-खोद के दोसरा से पूछिहऽ सन आ रस ले ले कहिंहऽसन। हमरा त ई सुनल इचिको नीमन ना लागे बाकि केहू सुनइबे करै त का कान मूँद लिहीं? झूठ काहे के कहीं, जहिया ई सब सुनीला नींद ना लागे सऊँसे रात करवटे बदलत बीतेला। मने-मने हमहूँ सपना देखे लागीला कि कइसन हमार ससुरा होई, कइसन सास के सुभाव होई, सवाँग खिसियाह मिलिहें कि मिठबोलिया?
ऊँह कइसनो मिलस। आपन आपन भाग ह। नइहर में सौतेली मतारी के दिन-रात के किचकिच से त नीमने होई। माई के बोली हइ स? बुझाला कि चइली से मारत होखे। बाबूजी के मति न फेर देले बिया। परियार साल बाबूजी एक जगे ठीक ठाक कइल स त माई ठेन बेसाह देलस कि एह साल बैल किनाई। बँटइया पर खेती ना होई, अपने हर चली। जब रोपेया बैल में उठ गइल, हमार तिलक कहाँ से दियाव? परसाल फिर बाबूजी एक जगे बात चलवलन। लइकवा दोआह रहे। डाकपीन के काम करत रहे। एक तरे से सब कुछ पक्के रहे। सखी सहेली में केहू हमरा के मनीआडर वाली कह के चिढ़ावे, केहू लिफाफा पोसकाट वाली कह के चउल करे। हमहूँ मनेमने गाजत रहीं कि दोआह बा त का ह? करकस मतारी से त जान बाँची। बाकि माई बेंड़ देली कि हम अपना जीयत जिनगी कुंती के बिआह दोआह बर से त ना होखे देब, नाहीं त सब केहू मेहना मारी कि सवत के बेटी रहइन एही से दोआह के गले मढ़ देली, जिनगी भर अकलंक के अपना माथे लिही? बाबूजी त हर बात में माई के मूँहे जोहत रहेलन। लागल बात कट गइल। भितरिया बात त हम जनबे करीला। माई सोचली कि कुन्ती चल जाई त लइका के खेलाई?

कुन्ती के बुझाइल कि ओकरा कंठ में कुछु अँटक गइल बा आ दुखाता। पँजरी आ हँसुली के हाड़ में जइसे टभक अमा गइल होखे, सऊँसे देह जइसे घवदाह हो गइल होखे, माथा के नस के जइसे केहू ताँत लेखा तान देले होखे आ ऊ टन टन बाजत होखे। कुन्ती के साँस तेज चले लागल आ गरम साँस के धार ओकरे ओठ पर साफ बुझात रहे। गदराइल देह समुन्दर के हल्फा लेखा साँस के ताल पर उभरत रहे, डूबत रहे, ओठ रह रह के ओइसहीं काँप जात रहे जैसे भोरहरी के हवा में बबूर के पतई काँप जाला। बहुत दूरे मनियारा साँप के कतार लेखा छोटी लैन छकछकात चलल जात रहे। मधिम अँजोरिया बेरमिया लेखा बेदम होके गते हाँफत रहे। कुन्ती के एगो लहर ठंढ़ा साँस निकल गइल आ ओकर सउँसे देंह लूक में जरल मोजराइल आम के गाछ लेखा सिहरे लागल।

”अइसे कब तक चली? डेग-डेग खाई खंधक बा। ओह दिन अछैवट सिंह के छत पर गेंहू सुखावे गइल रहीं त उनकर भगिना गते से आके हमार नाँव पूछे लागल। सुनीला जे पटना पढ़ेला। मन त भइल कि खूब सुना दीहीं कि बहरकू तोरा हमरा नाँव से मतलब? बाकि पित घोंट के रह गइलीं। हमार खिसिआइल मुँह देख के ऊ अपने लवट गइल। बिरीछ काका के बेटनो के उहे हाल, जहाँ हम ताल में नहाए अइलीं कि केवाड़ी का दोबा में लुका के अपना दलान पर से घंटन निहारल करी। मउगा कहीं का। मन त करेला कि कान धर के
मारी दू थप्पर। सीक अइसन त बाड़न, एगो थप्पर के मउआर ना होइहें आ रसिया बने के सवख बा। आ बंसियो का कम आफत कइले बा, सिलिक मिरजई पेन्ह के दिन भर में चार भाँवर हमरा गली में फेरा लगावेला। हम का ओकर रंग-ढंग ना चीन्हीं? बाकि बोलेउले ना। जहिया टोकलन, अइसन उघटब कि फेन हमरा सोझा आवे के नाँवे ना लीहें।…. बाकि कब तक? अइसे कहिया ले चलीं?“

कुन्ती के बुझात रहे कि साँप के बिख के लहर ओकरा देंह में उठ रहल बा आ गोंइठा के धुआँ में जइसे ओकर दम घोंट रहल बा आ ओकर गत्तर गत्तर अब पारा लेखा चारो देने छितरा जाई। गाँव के दखिन सिवान पर कुकुर भुँकत रहलन। खेत में सियार फेंकरत रहसन। काली माई के मंदिल से पाठ कर के चरित्तर काका लवटल आवत रहन। उनका खड़ाऊँ के खटर-खटर साफ सुनात रहे। कुन्ती सोंचलस कि एह रात के चरित्तर काका ओकरा के ताल किनारे बइठल देखिहें त का सोंचिहें? झप्प से धइला बुड़का के घरे चलल। निकसार
के बगल में दहिने हट के नेनुआ के लत्तर चढ़ावल रहे। ओहिजा कुछ आहट बुझाइल। कुन्ती चिहा के पुछलस – के ह? बंसी के काँपत, खखन से भरल आवाज आइल- ”हमार किरिया, तनी एगो बात सुनजा।“ मारे घबराहट के कुन्ती के हाथ-गोड़ काँपे लागल। ऊ धड़ से निकसार के भीतर जाके केवाड़ी के पल्ला भिड़ा लेलस। एह समय ओकरा अपना करेजा के धड़कन साफ सुनाई देत रहे ओकरा माथा पर पसीना चुहचुहा आइल रहे आ साँस बहुत तेज हो गइल रहे। घइला थवना भिरी रख के ऊ मने मने बंसी के खूब गरियवलस।

आँगन में माई ना रहे। लड़का सभ दँवरी लेखा खटिया पर पटाइल रह सन। बाबूजी के घर में दिया बरत रहे। पल्ला ओठँघावल रहे आ बुदुर बुदुर के आवाज आवत रहे। आपन नाँव सुन के कुंती गोड़ जांत के गते से जाके केवाड़ी में कान लगा के सुने लागल। माई बाबूजी के समझावत रहे- ”एह साल कुंती के बिआह के नांव लेल त ठीक ना होई। तोहार बेरामी एह साल बहुत उखड़ गइल बा। चलऽ बनारस रह के दवाई कराव। हमहूँ ओहिजा डाक्टर से जांच कराइब।“ बाबूजी कहलन- ”से त बड़ले बा बाकि लोग बाग अब अँगुरी उठावता, जवान जहान बेटी के कबले कुँआर रखबू?“ माई तड़प के बोलली ”वाह रे, लोग बाग कही त कुँइयो में कूद जाइब? एह साल ना सही, पर साला सही, कवनो मछरी ह जे सड़ल जात बिया।“ बाबूजी मान गइलन- ”ई त ठीके कहत बाड़ू, कवनो मछरी त ह ना जे सड़ जाई। परे साल सही।“

कुंती के बुझाइल कि पचासो बिच्छी एक साथ डंक मार देलन। बेहोसी में अपना खटिया देने बढ़त बाकिर अचक्के ओकर गोड़ लगो जूठ थरिया में पर गइल। झन्न से आवाज भइल। माई भीतरे से चिचिया के पुछलस- ”काहे रे कुंतिया, का भइल?“ कुंती के फफक-फुफक के रोए के जीव करत रहे। मन करत रहे कि लाज लिहाज के छोड़के बाबूजी
से अबहिएँ जा के कह दे कि बेटी मछरी ह बाबूजी, पानी के बाहर कब तक जिही? सड़ी ना त बिलाई ले भागी। कसहूँ रोआई जाँत के कहलस ”कुछ ना रे माई, बिलार रहे एगो। भाग, बिल, बिल।“

(पाती के मार्च 2021 अंक से)

By Editor

कुछ त कहीं...

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