– मीनाधर पाठक

का जाने काहें रतिया देर से नींद पड़ल. ऊहो पतोहा, माने सिद्धि कऽ पुकार पर. हम आपन दूनू हथेली रगड़ि के आँखि पर लगवनी आ तकिया लग से आपन मोबाइल उठा के देखनी त आठ बजत रहे. जँगला से आवत अंजोर से कमरा भरल रहे. धरती माई के गोड़ लागि के हम बिछौना से उतर के लिहाफ चौपति के चादर ठीक कइिनी आ कमरा के दरवाजा खोल दिहनी. सुरुज नारायण हमरी सामने देखा गइलें. हम हाथ जोड़ि के प्रणाम कइनी त ऊ मुस्किया दिहले.

“अब उठलू हा ? हमके त बुझाइल ह कि तू हमरा खातिर जल ले के आवत होखबू ? कबसे हम तोहके जोहतानी. ”
“धीर धरीं. आजु रउवा के तनी देरी से जल मिली.“ कहि के हमहूँ आँख मलका दिहनी आ अपनी कमरा की साफ-सफाई में जुट गइनी.

कई दिन हो गइल रहे, मनअछइत हम किताब वाली आलमारी के साफ-सफाई ना क पावत रहनी. हम सीसा सरका के सब किताब बहरिया लिहनी आ झारि पोंछि के लगावे लगनी. बीच-बीच में किताब के पन्ना उलट-पलट के देखतो जात रहनी. नीचे से रहि-रहि के सिद्धि के पुकार आवत रहे. बेर-बेर देर भइला के सिकाइत करत रहली बाकिर आजु हम आलमारी साफ कइले बिना सीढ़ी पर गोड़ ना ध सकत रहनी.

आखिर हम सब किताब लगा दिहनी. साफ आलमारी में बेवस्थित किताब देखि के मन खुश हो गइल. एहिमें से सब किताब हम पढ़ि भइल रहनी, हँ कुच्छु बँचल रहे जवना के बाद में पढ़ब, ई सोचत हम कमरा के फर्श साफ क के सब कूड़ा बटोर के एक बेर कमरा में निगाह घुमवनी. मेहनत सवारथ भइल, सोचते रहनी कि सिद्धि के आवाज आ गइल. हम संतोष के साँस लिहनीं आ सीढ़ी की ओर बढ़ि गइनीं.

“पापा जी गइनी?” भगवान् जी के जल चढ़ा के आ के हम सोफा पर बइठनी आ रोमोट उठा के टीवी ऑन करत घरी सिद्धि से पुछनी.

“तनी घड़ी कऽ ओर देखीं.” नास्ता हमरी आगे धरत ऊ कहली. हमार निगाह टीवी से हटि के देवाल घड़ी पर चलि गइल. साढ़े दस बजत रहे. आजु काम में लागले-लागल समय के पते ना चलल.

सोचते-सोचत हम उपमा के प्लेट उठा लिहनी आ खात-खात टीवी देखे लगनी. गाइड फिलिम चलत रहे. एकर गीत मन मोहेला, ए से हम चैनल ना बदलनी. प्लेट खाली हो गइल त ओकरा के ध के हम चाय के कप उठा के जइसहीं
मुँहे लगवनी, सिद्धि वाशिंग मशीन में कपड़ा हूरत देखा गइली. ई मलेछही मशीन चालू होते टंकी के पूरा पानी सोखि लेले. आ तनिए देर में उगिलियो देले. पानी हहरात नाली में दहि जाला. जवन देखि के हमार जियरा में का जाने कइसन होखे लागेला.

“ए बाबू, हई तोहार मशीन बड़ा पानी पिएले.“ आखिर रहि ना गइल त मूँहे से निकलिए गइल.
“आम्मा जी ! अब त चादर आ परदा भर धोवे खातिर मशीन लगावेनी. बाकी सब कपड़ा त हथवे से धोवेनी. अब चादर पटक-पटक के फीचीं, ना त हमरी लगे एतना जाँगर बा ना समय. टाइम सेट करत पतोहा टन्न दे बोल दिहली.

“देखा बाबू, हमार बाति तोहरा बड़ा बउर लागेला बाकिर तू का जानऽ ! हमरी समय में सब कार हाथे से होत रहे. आ तनी सा बाल्टी से पानी छलकि जा चाहे भरल लोटा-गिलास गीरि जा त हमार सासु केतना बाति सुना दें. कहें कि ‘पानी परता ले लेला. ए से जेतना गरज होखे ओतने ल लोग.‘ जब कि ओ समय इनार, पोखरा, ताल, नदी, नहर सब पानी से भरल रहत रहे. राही-बटोही इनारे पर रूकि के पानी पियत रहें. सतुआ सानि के खात रहे आ बगइचा में बिसराम क के फेरु आपन राहि धरत रहें. आ आजु पानी के जवन दसा बा, ऊ सभे जानऽता. नदी, पोखरा, इनार सब झुरा गइल बा आ पेड़ पालो रहि ना गइल बा. आगे के भबिस्य का होई, के जानऽता ! भगवान जी ना करीं कि कबो ऊ दिन आवे कि लइकन के पानी छिछ्कारि के नहाए के भेद भर मेटावे के पड़े. आ पिआसि बुझावे खातिर पानी के दवाई आवे लागे. के जानऽता ! हे टीवी पर समाचार सुनि-सुनि के दिमाग घूमल करेला हमार. आ तू त जनबे करेलू
कि घर में तीसरी बेर मोटर के पाइप बढ़ावल गइल बा. पलम्बर मना क दिहले बा कि अब ना बढ़ि पाई पाइप अब
जो मोटर पानी छोड़लस त सीधे बड़का बोरिंग करावे के पड़ी. एही से कहीलें कि पानी के संगिरहा क के चलऽ. ”

“मम्मी जी ! केतना चिंता करेनी रउरा. एतना चिंता मति कइल करीं. खाली आपन ध्यान राखल करीं. हमरो स्कूल जाए के पड़ेला. एगो अतवारे के दिन मिलेला, ओहू में सौ गो काम आ ऊपर से राउर पानी के चिंता के मारे जिउ डेराइल रहेला. हमहूँ चाहीलें कि बेफजूल पानी ना गिरे बाकिर थूके पिसान ना सनाला. ई त रउरो जानीलें न!” कहि के झनक के चलि गइली पतोहा.

हमेशा इहे होला, ई मशीन लागते पानी खातिर बतकही आ रूसा-रूसी. सोचि के हम चुपचाप टीवी पर निगाह गड़ा दिहनीं. तब्बे सिद्धि दवाई के बक्सा ले आ के हमरी आगे मेज पर ध दिहली. हमहूँ दवाई निकाल के खइनीं आ फिलिम देखे लगनी.

धरती सूखि के फाटि गइल रहे. पेड़ पालो सब झूरा के ठूँठ भइल रहे. गाई गोरु, चिरई चुरगुन, आदमी, सब पानी खातिर बेकल रहे. चारू ओर से लोग मन्दिर में पानी खातिर उपास पर बइठल स्वामी जी के दरसन खातिर जात रहे. हम फिलिम में अझुराइल रहनी कि गेट के कुंडा जोर से बाजल. बुझाइल कि टन्न दे केहू मूड़ी पर मार दीहल. उठे के भइनी कि पतोहा दनदनात लगे से चल गइली. जेतना तेज कुंडा बाजल रहे ओतने तेजी से खुलबो कइल.

“हमार रीसि ई मेहरारू बेजान चीज पर उतारेले. जवन मन करे तवन करे. हमके का करे के बा. अब ना बोलब कुछु. “ सोचत रहनीं कि लछमिनिया कमरा में गोड़ ध दिहलस.

“अच्छा..! त अब अइली ह महारानी जी. राति के बरतन दुपहरिआ में धोवाला. बाकिर हमके का करे के बा. आपन मूड़ी झींट के हम फेरू से फिलिम देखे लगनी. वहीदा रहमान आपन बीखो उतारत भीड़ के हिस्सा बनत देखात रहली. बाकिर अब रसोई से आवत खड़खड़ के आवाज से मन ना लागत रहे.

“केतना हाला कइले बाड़े रे ! पटक-पटक के सब बर्तन हेवान क देले बाड़े. एंगा धोवल जाला बरतन !”
“अरे आंटी जी ! तनी आके देखिये तो कि कितना बर्तन है. अब इतना बर्तन धोएगा तो खड़कने की आवाज तो आएगी ही न. “ लछमिनिया खिसिआहे बोललस.

“अब ते हमरा के ढेर ज्ञान मत दे. आ तनी टोंटी के धार कम क ले. हर हर, हर हर पानी गिरावेले तें. जेतना पानी के गरज बा ओतने नल खोलू.” बाकिर ओकरी ऊपर हमरी कहला के कवनों असर ना भइल. पतोहा सुनत रहली बाकिर बोलली ना कुछु.

“एकरो दिमाग आसमान पर चढ़वले बिया ई मेहरारू. जबले एहिजा रहब, तबले देखि सुनि के हमार जीउ जरत रही.“ भुनभुनात हम टीबी बंद क के सीढ़ी कऽ ओर बढ़ि गइनी. अपनी कमरा में आ के मन हल्लुक करे खातिरएगो पत्रिका उठा लिहनीं आ देवाल से पीठि टिका के बइठ के देखे लगनीं. पत्रिका के मुखपृष्ठ परएगो आदमी कपारे पर हाथ धइले बइठल बेवाइ नीयर फाटल आपन खेत देखत रहे आ ऊपर आसमान में सूरज देवता आँख गुड़ेरत रहलें. बादर के कहीं नामें निशान ना रहे. पढ़े खातिर जइसहीं पन्ना पलटनी कि छत पर धब्ब कऽ आवाज से हम चिहूकि गइनी. ई
आवाज टंकी से गिरत पानी के रहे.

“अरे तनी मोटर बंद क द लोग. पानी गिरऽता.” जोर से बोलनीं हम. बाकिर ना त नीचे कवनों सगबगभइल ना ऊपर भद्द भद्द के आवाज बंद भइल. हम फेरू से आवाज दिहनीं बाकिर उहे निल बटा सन्नाटा ! झंखि के हमहीं उठनी आ नीचे आ के मोटर के स्विच बंद क दिहनी. देखनी त कमरा में पंखा चलत रहे. ऊपर गइला से पहिले हमहीं पंखा बंद ना कइले रहनी. भीतर अइनी त पतोहा फोन पर अपनी माई से बतिआवे में लागल रहली. हम पंखा बंद कइनी आ ई
सोचत ऊपर आ गइनी कि हो सकेला कि लछमिनिया मोटर चला के पतोहा के बतवले बिना चलि गइल होखे. ऊपर आ के देखनी त छत से पानी गिरल सुरु हो गइल रहे. झट दे हम गमला कऽ लगे से बाल्टी उठा के गिरत धार के नीचे ध दिहनी. पानी के छींटा कमरा के भीतर ले आवत रहे. का जानें काहें जब-जब ए तरे पानी गिरेला, हमरी मन
में उद्बेग हो जाला. हम दरवाजा बंद कइनीं आ पत्रिका एक ओर सरका के ओठंग गइनी.

एकदम से फोन के घंटी बाजि गइल. हउहा के उठनी आ फोन देखनी त उपरे पड़ोस वाली बरमाइन के
नाँव देखात रहे.
“नमस्ते जी कैसी हैं आप?” नीन में खलल के खीस दबा के बोलनीं हम.
“ठीक हूँ जी आप कैसे हो ? लगता है मैंने नींद से जगा दिया.”
“अच्छा किया जी जो उठा दिया नहीं तो का जाने कबले सोये रहते हम.”
“एक काम था आपसे. ”
“अरे तो कहिए न.”
“जी मेरे यहाँ नई बोरिंग हो रही है. पुरानी बोरिंग बैठ गई. अब पानी के बिना तो बोरिंग हो नहीं सकती न! आपसे पानी चाहिए था.”

सुनिए के हमार बोलती बंद हो गइल. अब का करीं? पानी दीं कि ना दीं ? हमरियो घरे पानी के कम खरचा बा? कहीं हमरो बोरिंगवा…! राम राम ! ई कुल का बेफालतू के बाति सोचे लगनीं हम ? बाकिर पानी त ढेर लागी, ऊपर से बिजली के खरचा !”
”क्या सोचने लगीं जी !” एने से हमार चुप्पी सुनि के ओने से आवाज आइल.
“पाइप तो नहीं है हमारे घर. पानी कइसे जाएगा ? ”
“जी उसकी चिंता न करें आप, पाइप है मेरे पास.”
“अब कइसे मना करीं!” सोचते सोचत हम नीचे आ गइनी. फोन ओनिए से कटा गइल रहे.

“सिद्धी! ए सिद्धी…!”
“जी मम्मी जी !”
“बगल वाली बर्मा आंटी की घरे बोरिंग होता. ऊ पानी मांगताड़ी.” सुनिए के उनके आँखि बड़हन हो गइल.
“रउरा हँ कहि दिहनी का?”
“अब पानी से पातर का होला? कइसे मना करीं?”
“अब त राउर पानी खर्च ना होई नू?” पतोहि के चढ़ल आँखि देखि के फेरु से हमार बोलती बंद हो गइल.
“राउर कंठ खाली हमरे से फूटेला! प्लम्बर के कहल बतिया उनका से काहें ना कहनीं हँ रउवा !” रिसिया के बोलत ऊ जइसे रसोई की ओर गइली, फाटक खटकि गइल.

जा के खोलनी त बर्माइन के छोटका बेटा शिरीश रबर पाइप के भारी लच्छा लिहले ठाड़ रहे. अब त मन मारि के मोटर खोलहीं के पड़ल. पड़ोस में बोरिंग हो गइल रहे. दू दिन से रात-दिन मोटर चला के पानी के सफाई होत रहे.
जेसे बालू से नाली चोक हो गइल रहे आ पानी सड़क पर पसरल रहे. हम छत पर किनारे आ के देखनीं त
शिरीश देखा गइलन.

“शिरीश बेटा, पानी साफ नहीं हुआ का अभी तक?”
“अभी बालू आ रहा आंटी जी, आज भर और मोटर चलेगा.”
पानी की सफाई के नाँव पर का जाने केतना पानी बहि गइल रहे बाकिर अबहिन ले पानी ना साफ भइल रहे.
“हे भगवान् जी, पानिए से पानियो साफ होला !” सोचत-सोचत हम गमलन में पानी देबे लगनी. पानी पा के मुरझाइल पौधन में जान आ गइल रहे.

चिरइन के बर्तन में पानी डालते का जाने कहाँ से उड़ि उड़ि आ के पानी कऽ बर्तन लगे इकट्ठा हो गइली आ नान्ह-नान्ह ठोर से पीए लगली कुल्हि. का जाने ए मन के कवन अंकगणित ह कि ई अबोलन के पानी पीयत देखि के जुड़ा जला आ अकारथ पानी गिरत देखि के बिह्वल हो जाला. जवन कुछ होखे बाकिर बहरे के पानी आ हमरी भीतर के पानी में कवनो बहुत गहिर नेह-नाता ह. सोचते रहनी कि तब्बे फोन के घंटी बाजि गइल आ हमरी भीतर चलत
दर्शन के शास्त्रार्थ पर बिराम लागि गइल. धन्यबाद देबे खातिर बरमाइन के फोन रहे. इहो शब्द मन पर जादू क
देला. सोचत हम फोन एक ओर ध के फेरू से गमलन में पानी देबे लगनीं.

तबे एकदम से तड़ तड़, तड़ तड़ के आवाज से मन में उठत विचार पर लगाम लागि गइल. हम अकबका
के देखनीं त ऊपर टंकी से गिरत पानी कमरा के दरवाजे पर गिरे लागल रहे. हम भागि के खाली बाल्टी उठा के गिरत जलधार के नीचे ध दिहनीं. आ मोटर बंद करे खातिर सीढ़ी की ओर चल दिहनीं.

मीनाधर पाठक अध्यापन आ स्वतंत्र लेखन करत रहिलें. इहाँ के लिखल बहुते पत्र-पत्रिकन में छपत रहेला. इहो रचना भोजपुरी दिशाबोध के पत्रिका पाती के 103 वां अंक में प्रकाशित भइल बा.

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