– रवि कुमार गिरी गुरुजी

न सार के जरुरत बा न बिचार के जरुरत बा ,
कविता लिखत बानी कविता के जरुरत बा ,

सोच होखे समझ होखे एपर केहू ध्यान ना दी ,
चटक मटक लिखी समाज के कुछ ज्ञान ना दी ,
पाहिले लोग खोजत बा कुछ खुला कुछ कसाव ,
समाज और संसकृति से ना होखे कवनो लगाव ,
बस मन बहलावे वाला सब्दन के जरुरत बा ,
कविता लिखत बानी कविता के जरुरत बा ,

अब रामायण के बात सुनावे खातिर करीले ,
हर कोई से बिनती की चल आइहा साम के ,
बिना बोलावल आवत बा लोग सुने खातिर ,
हर साम के बार में मन लागल बा जाम में ,
इ लगत बा लोग के बेवहार के जरुरत बा ,
कविता लिखत बानी कविता के जरुरत बा ,

गाव में अब चौपाल तक खाली रहत बा ,
देखि दारू के भट्टी पर जमघट लागल बा ,
इहा एहसास मर गइल बा साथ बनल बा ,
अपना पर ना लोग पर बिस्वास बनल बा ,
लोग कहत बा इनके समझ के जरुरत बा ,
कविता लिखत बानी कविता के जरुरत बा ,

जे आज देश चलावत बा उ नोट बानावत बा ,
माई भारती के ना, अपने बारे में सोचत बा ,
जहा पावत बा ओहिजा लुटात बा खसोटत बा ,
जेतना पैसा हो जाव आउर बढ़ावे में जुटल बा ,
अइसन खातिर आज कालापानी के जरुरत बा ,
कविता लिखत बानी कविता के जरुरत बा ,

मास्टर जी पढावे खातिर स्कुल में आइलन ,
हाजिरी बना के खेत में काम करे गइलन ,
अइसन काहे होत बा इ सोचे के जरुरत बा ,
घर के लगे बारन तबे नु बनत महूरत बा ,
अइसन लोग के जिला ख़ारिज के जरुरत बा ,
कविता लिखत बानी कविता के जरुरत बा ,

इहो बिगरले इनका के लोग भगवन काहे ला ,
अब पैसा के बिना इनकर ईमान ना चलेला ,
केहू मरे चाहे जिए इनके पाईसा पाहिले दिहा ,
नाही उठ्ठे बेग इनकर नाही आला चलेला ,
चाहे केहू मरे इनके पाईसा के जरुरत बा ,
कविता लिखत बानी कविता के जरुरत बा ,


छपरा के निवासी रवि कुमार गिरी आजुकाल्हु कोलकाता में रहेनी आ ओहिजे फिल्मोद्योग से जुड़ल बानी.

3 thoughts on “कविता के जरुरत बा”
    1. खाली दोसरे के बड़ाई होखी कि कबो आपनो रचना भेजल जाई.
      अमृतांशु जी, हम बहुत दिन से रउरा रचना के इन्तजार में बानी.

Comments are closed.

%d bloggers like this: