• आचार्य अंबिका दत्त त्रिपाठी ‘व्यास’

हम जनम भर केहू के मनावत रहीं,
केहू माने न माने त हम का करीं,
आसरा में उमरिया बितावत रहीं,
केहू जाने न जाने त हम का करीं.

हम ओसारा से टुत-टुक निहारत रहीं,
ऊ दुआरे से ताके बिना चल गइल,
बेकली मन के मन ही अगिन बन गइल,
मेघ जंगल में आइल त हम का करीं.

आस में साँस अँटकल, अँटक के रुकल,
उनका हमरा जिये से न मतलब रहे,
हम त जीयत रहीं उनके देखे बदे,
मौत आइल न आइल त हम का करीं.

उनके पीछे भुला गइलीं आपन डगर,
दिन दहाड़े न आवत रहे कुछ नजर,
राह अइसन भुलाइल कि खोजत रहीं,
उम्र सगरी भुलाइल त हम का करीं.

(भोजपुरी के त्रैमासिक पत्रिका सँझवत से साभार)

परिचय –
जन्म – सन 1935 में डुमराँव, जिला बक्सर (बिहार) में,
अवसान – 25 अगस्त 2006
संस्कृत, हिन्दी, आ भोजपुरी के साहित्यकार
प्रकाशित किताब – उर्वशी, तपस्विनी महाश्वेता, जीवन गीत, करम कमण्डल, परिवाराय स्वाहा.

By Editor

कुछ त कहीं...

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