– शशि प्रेमदेव

हे बाहुबली! बँहिआ में त हमहन के भी ओतने दम बा!
बाकिर तहरा पाले लाठी, भाला, बनूखि, गोली, बम बा!!

तहरे चरचा बा घरे घरे
बाजे सगरो डंका तहरे
काहें ना जोम देखइबऽ तूँ
तहरा पेसाब से दिआ जरे

चउकी से ले के चउका तक, तहरे त फहरत परचम बा!!

ऊपर से केतना निर्मल तू
भीतर कल छल के जंगल तू
जग बूझे बाहुबली बाकिर
हरमेस रहेलऽ चिहुँकल तू

जहँवे लउके झाड़ी झूंटा, तू सोचलऽ बइठल जम बा!!

सम्मान बचवले बानीं हम
ईमान बचवले बानीं हम
ए कलजुग में इहे एगो
सामान बचवले बानी हम

अवगुण में आगे बाड़ऽ तू, बाकिर गुण तहरा में कम बा!!

हम झंझट के भरसक टालीं
झूठो मूठो ना अझुरालीं
तू तिकड़म कऽ मेवा खालऽ
हम मेहनत के रोटी खालीं

पटरी ना बइठी हमनी में, ना तन सम बा ना मन सम बा!!

रोवत सुसकत मरि जइबऽ तू
बबुआ बहुते पछतइबऽ तू
माटी के देहि लरकि जाई
सोचऽ कइसे ढो पइबऽ तू

पीठी तहरा लादल बोझा, कुकरम के भारी भरकम बा!!

One thought on “बाहुबली”
  1. बहुत नीमन आ दमदार रचना बा
    शशि प्रेमदेव जी .
    बहुत बहुत बधाई .

कुछ त कहीं...

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