– पाण्डेय हरिराम

संसद में पेश सरकारी लोक पाल का बदले एगो मजगर जन लोकपाल बिल खातिर भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन के मुखिया अन्ना हजारे के १६ अगस्त से आमरण अनशन पर जाये के प्रतिबद्धता सरकार का सोझा एगो कार्यपालक आ नैतिक उलझन खाड़ कर दिहले बा.

कार्यपालक उलझन एह बात के बा कि कवनो मकसद से केहू के आत्महत्या करे के कोशिश एगो अपराध ह आ सरकार कानूनी रूप से बाध्य बिया कि एह तरह के अनशन का खिलाफ कार्रवाई करो. जरूरत बुझाव त अन्ना हजारे के अनशन करे से पहिले भा अनशन करे का दौरान गिरफ्तार कर लेव जेहसे कि उनुकर जान बचावल जा सके आ सार्वजनिक अराजकता होखे से रोकल जा सके. ई कार्यपाली उलझन तब अउरी अझुरा जात बा जब एह बात के खतरा बुझात होखे कि उनुकर जान बचावे के कोशिश के विरोध करे के उनुका लोकतांत्रिक अधिकार के हनन मानल जा सकेला आ एह बाति से सार्वजनिक अराजकता अउरी बेसी हो सकेले.

नैतिक उलझन एह बाति के बा कि महात्मा गाँधीए का समय से आमरण अनशन के विरोध के एगो तरीका मानल जा चुकल बा. विशेष तरह का हालात में आमरण अनशन महात्मा गाँधी के एगो मजगर अहिंसक हथियार बन गइल रहे. तब भारत पर विदेशी शासक राज चलावत रहले आ कवनो लोकतांत्रिक ढाँचा मौजूद ना रहे.

अन्ना हजारे आ उनुकर समर्थक आपन विरोध एगो आजाद आ लोकतांत्रिक भारत में कर रहल बाड़े जहाँ लोकतांत्रिक संचलन के आ विचार प्रकट करे के बहुते तरीका मौजूद बा. ऊ लोग एह तरीकन के इस्तेमाल जनता के अपना माँग का पक्ष में खड़ा करे में कर रहल बाड़े जेहसे कि सरकार पर आपन माँग मनवावे के नैतिक दबाव डालल जा सके. अगर सरकार ओह लोग के कुछ माँग के वैधानिक नइखे मानत त एह चलते कि ओकरा लागत बा कि ऊ बात राष्ट्रीय हित में ना होखी आ ओकरा से उलटा प्रभाव पड़ सकेला. लोकतांत्रिक तरीका से चुनल सरकार के ई अधिकार होला कि ऊ तय कर सको कि का चले लायक बा आ का नइखे चले लायक, का देश हित में बा आ का नइखे. यदि केहू सरकार के विचार से सहमत नइखे त ओकरो अधिकार बा कि अपना आन्दोलन के जारी राखो एह उमेद में कि देर सबेर सरकार अपना रुख में बदलाव ले आई.

बाकिर केहू के ईहो अधिकार नइखे कि ऊ सरकार के डेरा धमका के आपन माँग माने खातिर मजबूर करेका विचार से ओह हथियार के इस्तेमाल करो जवन कबो ब्रिटिश शासन का दौरान नैतिक रूप से भले जायज रहल होखे बाकिर आजाद आ लोकतांत्रिक भारत में ओह तरह से नैतिक नइखे रहि गइल. सरकारो के ई कानूनी बाध्यता बा कि ऊ केहू के आत्महत्या करे से रोको आ एह बाध्यता के एहसे कम ना मानल जा सके कि भ्रष्टाचार का खिलाफ मजगर कार्रवाई करे क अन्ना हजारे आ उनुका समर्थकन के माँग में नैतिक बल बा. नैतिक रुप से जायजो कवनो माँग के पूरा करावे खातिर कानूनी रूप से अमान्य विधि के इस्तेमाल ना कइल जा सके.

हमनी के संविधान आ कानून का तहत हर नागरिक के विरोध करे के अधिकार बा बाकिर मनमर्जी तरीका से विरोध करे के ना. विरोध करत घरी मौजूदा कानूनन के पालनो कइल जरूरी बा आ विरोध में सामने वाला के धमकावे वाला अन्दाज ना होखे के चाही. आमरण अनशन कर के अन्ना हजारे के जान दिहला के धमकी के पूरा करे से रोकलो सरकार के कानूनी जिम्मेदारी बनत बा. अब ई गिरफ्तारी अन्ना के अनशन से पहिले होखत बा आ कि कुछ दिन ले उनुका आपन विरोध दर्ज करावे के मौका दिहला का बाद , ई तय करे के काम सरकार के बा आ ओकरा पहिले एहू बात पर ध्यान देबे के बा कि गिरफ्तारी से जनमानस पर का प्रभाव पड़े जा रहल बा. अतना त मानही के पड़ी कि अन्ना हजारे का साथ विपुल जन समर्थन मौजूद बा काहे कि जनता के बड़हन हिस्सा भ्रष्टाचार मेटावे खातिर सरकार के प्रतिबद्धता के कायल नइखे. कानून व्यवस्था बनवले राखे के कार्यपाली जिम्मेदारी के सही साबित करे खातिर सरकार का लगे ऊ नैतिक जिम्मेदारी नइखे काहे कि ऊ जनता के समुझावे में विफल रहल बिया कि सरकार भ्रष्टाचार मेटावे खातिर कृतसंकल्प बिया.

एह आखिरीओ घड़ी में ई बहुते महत्वपूर्ण बा कि प्रधानमंत्री भ्रष्टाचार का मसला पर इलेक्ट्रानिक मीडिया आ पत्रकार सम्मेलन कर के जनता से संवाद स्थापित करसु जेहसे भ्रष्टाचार पर जनता के सोच पर ध्यान दिहल जा सको. नैतिक जिम्मेदारी के अनदेखी करत सरकार के ध्याम कार्यपाली जिम्मेदारी पर बहुते टिकावल मौजूदा तनाव के अउरी लहका दी.



पाण्डेय हरिराम जी कोलकाता से प्रकाशित होखे वाला लोकप्रिय हिन्दी अखबार “सन्मार्ग” के संपादक हईं आ उहाँ का अपना ब्लॉग पर हिन्दी में लिखल करेनी.

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