पिछला दस दिन से बस एकही चरचा चलत बा देश भर में आ उ चरचा बा आफत बिपत के. आपदा बिपदा से निकलल शब्द आफत बिपत कुछ लोग संगे विशेषणो का रूप में इस्तेमाल होखेला. जइसे कि आजुकाल्हु एगो नेता के नाम बाकी गोल वाला नेता आ पोसुआ मीडिया ला आफत बिपत के पर्याय बन गइल. रउरो जान पहिचान में कुछ अइसन लोग होखींहे जिनका के रउरा आफत बिपत मानत होखब. खैर लवटल जाव आफत बिपत पर. आफत आ बिपत सरसरी तौर पर भा हवाई सर्वेक्षण जइसन देखीं त एके जइसन लागी. बाकिर सोचे वाली बात बा कि अगर एके जइसन रहे के रहे त दू गो नाम काहे? ई त शब्द के दुरुपयोग हो गइल. ठीक ओही तरह जइसे एकही आफत के देखे खातिर अनेके लोग हवाई सर्वे करे लागे. मानत बानी कि हवाई सर्वे के आपन महत्व होला. आफत में पड़ल आदमी के लागेला कि केहु देखेवाला चहूंपल बा आ जब देख के लवटि त कुछ ना राहत जल्दिए भेजवाई. अलग बात बा कि देख के लवटला का बाद राहत भेजवाए से पहिले तब ले इन्तजार कइल जाव जबले कवनो राजकुमार झंडा देखावे ला ना चहुप जाव. भा इहो हो सकेला कि राहत देबे आइल दू गो गोल गिरोह बन जाव आ लाग जाव मारापिटी में हम राहत देब, हम राहत देब. आफत बिपत के एह चक्कर में फेर बात दोसरा मुद्दा पर भटक गइल. चलीं फेर लवटल जाव ओह आफत बिपत पर. आफत कहल जाला जब कवनो दैवी प्रकोप भा प्राकृतिक प्रकोप अतना बड़हन पैमाना पर आवे कि सब कुछ तहस हो जाव. भा दोसरा तरह से कहीं त आफत बड़हन पैमाना पर एगो बड़हन जन समुदाय पर आइल बिपत होखेला. आ एहीजे एह आफत आ बिपत के अन्तर समुझल आसान हो जाता. जब कवनो खास आदमी भा गोल पर संकट आवे त उ ओकरा खातिर बिपत होला बाकिर अगर कवनो बड़हन समुदाय इलाका भा देश पर बिपत बन के आवे त ओकरा के आफत कहल जाई. आफत आ बिपत में एगो राजनीतिक भा प्रशासनिक अंतर होला. बिपत में पड़ल परिवार के एगो चेक दे के मामिला सलटा लिहल जाला. बाद में उ चेक बैंक वाला लवटा देव से अलगा संकट बा. बाकिर तब ले चेक देबे वाला नेताजी के फोटो अखबार टीवी पर काम भर चमक चुकल रही, बाकिर आफत का समय नेता आ अफसरान के चाँदी आ जाला. आ एह लोग खातिर आफत बिपत के रिश्ता आमद से होला. बाढ़ आवे भा भूकंप. सूखा पड़े भा अकाल एहलोग के हाथे हमेशा लड्डू रहेला. बड़हन आफत मतलब बड़हन सहायता राशि. बड़हन सहायता राशि मतलब बड़हन कमीशन. राहत चहुँपावे खातिर चलल ट्रक बाद में कहीं दोसरा जगहा चलि जाव भा पता लागे कि ओह ट्रकन पर खाली कार्टन से अधिका कुछ ना रहल से अलगा बात बा. ओही तरह राहत चहुँपावे के काम दू चरण में होला. एक त फौरी जवना में जतना चाहें खरचा देखा लीं. चूंकि पावती के कवनो प्रावधान ना होखे से आमद अधिका हो जाला. बाद में जवन दीर्घकालिक राहत होला भा पुनर्वास फेर से बसावे के काम तवना में समय लागेला आ कुछ ना कुछ हिसाब किताब राखे के पड़ेला. कूछ ना कुछ कामो करे के पड़ेला. एह से राहत के एह चरण में बस कमीशन के भरोसा रहि जाला. आजु के बतकुच्चन आफत बिपत आ आमद के एही चरचा पर रोकत बानी काहे कि हजामत बनावे विदेश जाए के बा. देश के आफत बादो में आके देख लिहल जाई.

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