बसपा सुप्रीमो मायावतीओ सड़क के ओहि ढलान का ओरि जात बाड़ी जवना पर चलत लालू यादव आ राबड़ी देवी के पराभव भइल. उनकर गलत रणनीतिए के परिणाम बा कि उनका दोस्तन के संख्या लगातार कम हो रहल बा आ दुश्मनन के लिस्ट लमहर होत जात बा. विरोधी नेतवन के त ऊ मौका-बेमौका फटकारते रहेली, मीडियो से उनुकर कमे बनेला. इहे वजह बा कि कई बेर सरकार के निमनो काम के जानकारी जनता के ना हो पावे. आ अब त उनुका संवैधानिक संगठननो में खोट लउके लागल बा.

जानकार कहतारें कि बसपा सुप्रीमो के ई बाति कबो नीक ना लागे कि उनुका कामकाज के तरीका में केहू दोसर दखलंदाजी करे. जे अइसन कइल चाहेला ओकरा के ऊ आपन दुश्मन मान लेबेली. जवन समाज मायावती के सिद्धांत से जागल रहे, उतान भइल रहे ओहिजो अब विरोध की चिनगारी शोला बने जा रहल बा.

बिहार में आ गइल बदलाव के सभे देखल. असल में बदलाव के हीरो कवनो नेता ना बलुक राज्य के जनता बिया जवना में तरक्की के ललक जाग उठल बा. ई तरक्की के एगो सिलसिला ह जवन इतिहास का चक्का का तरह चलते जाला – खास तौर से लोकतंत्र में.

जब लोकतंत्र काम कइल शुरू करेला त शुरुआती बिंदू बहुते छोट छोट प्रतीकात्मक बदलावन में होला. पहिला बेर वोट में बरोबरी के हक मिलल आ ओकरा के लागू करवा लिहले सबले बड़ बाति हो जाला. एह पैमाना पर खरा उतरहीं में भारत के दसियन साल लाग गइल. ओह दौरान एक-एक करके ऊ लोग सियासत आ ओकरा मार्फत सशक्तीकरण के हिस्सा बनेलें जिनकर कबो कवनो आवाज ना रहे. ओह दौर में ठोस अर्थ व्यवस्था ओतना मायने ना राखे जतना सोशियॉलजी भअ सियासत. मसलन इंदिरा गांधी खातिर गरीबी हटावल ओतना जरुरी ना रहल जतना “गरीबी हटाओ” के नारा लगाके अपना प्रजा में मेहरबानी के अहसास पैदा कइल रहे.

भारत में लोकतंत्र के भीतर सोशल इंजीनियरिंग के यह सिलसिला बेहद लमहर चलल. कहल चाहीं कि अब 55-60 साल बाद ई पूरा होत लउकत बा. दुनिया में कहीं एकर मिसाल ना मिलर काहे कि कवनो दोसर देश अतना बड़, अतना बेढब, आ अतना गैर-बराबरी वाला नइखे.

जब ई सिलसिला एगो सिवान पर चहुँप जाला, जइसन कि अब हो रहल बा, पूरा देश में तमाम पिछड़ल लोग खुलके वोट देबे लागल बा. उनका दम पर भा उनका नाम पर सरकार बने लागल बाड़ी सँ. जाति के मुद्दा सबसे सफल बनि गइल बा आ जाति में से हीनता के पुरानका अहसास खत्म होखे लागल बा त जाति के सियासत के चमक कम होखे लागल बा. हर फारमूला आपन “एक्सपाइरी डेट” साथही ले के चलेला. जब सामाजिक लक्ष्य हासिल हो जाले त लोग सियासत के दोसरे मतलब खोजे लागेलें जवना के नाम ह राजकाज. ऊ पूछे लागेलें – रउरा हमनी के का दिहनी ? का देबे वाला बानी ? का दिहल चाहत बानी ? उनुका तब महज नारा दे के ना ललचावल जा सके. ऊ ठोस जमीनी बदलाव देखल चाहे लागेलें. ऊ सपना देखे लागेलें. आ अपना तरक्की खातिर कवनो दलितो युवक ओतने जिद्दी हो जाला जतना कवनो सवर्ण युवक.

बिहार में ई जिद सियासत में झलके लागल बा. बाकिर बड़हन सवाल ई बा कि अइसन उत्तर प्रदेश में अबले काहे ना भइल ? यूपी त कई मामिला में बिहारो से विकसित राज्य ह आ ओहिजा ई कुदरती बदलाव पहिलही हो जाये के चाहत रहे ? यूपी में कम-से-कम एक बेर बदलाव खातिर सियासत के चाल तरक्की के भूख के बनावे के पड़ी, ओकरा से साजिश रचे के होखी. बदस्मती से ई कहल मुश्किल बा कि आगा अइसन हो जाई. बिहार के संयोग से नीतीश मिल गइलें, यूपी के के भेंटाई ?

बाकिर आखिरकार सब कुछ पब्लिक के मर्जी आ ओह सपना के ताकत से तय होखे के बा जवना ला हर चीज के बदले पड़ रहल बा. जब पूरा देश, पूरा दुनिया, हर रवायत, हर ताकत ओकरा सोझा मूड़ी नवइले बा त यूपी आ ओकर सियासत भला कवन चीज हऽ ? नामुमकिन साबितो हो जाईं त उम्मीद पलला में हर्जे का बा ? अबकि यूपी में बदलाव के बारी बा.


पाण्डेय हरिराम जी कोलकाता से प्रकाशित होखे वाला लोकप्रिय हिन्दी अखबार “सन्मार्ग” के संपादक हईं आ ई लेख उहाँ का अपना ब्लॉग पर हिन्दी में लिखले बानी. अँजोरिया के नीति हमेशा से रहल बा कि दोसरा भाषा में लिखल सामग्री के भोजपुरी अनुवाद समय समय पर पाठकन के परोसल जाव आ ओहि नीति का तहत इहो लेख दिहल जा रहल बा.अनुवाद के अशुद्धि खातिर अँजोरिये जिम्मेवार होखी.

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