गणतंत्र दिवस 2015 के पहिले के साँझ दिहल राष्ट्रपति के संबोधन

गणतंत्र दिवस 2015 के पहिले के साँझ दिहल राष्ट्रपति के संबोधन


हमार देशवासी,

66वां गणतंत्र दिवस के पहिले के साँझ हम रउरा सभे के एह दिन के बधाई देत बानी, खास क के हमनी के सेना, अर्धसेना, अउर भितरी सुरक्षा में लागल अपना जवानन के.

26 जनवरी के दिन हमनी के देश का यादगार में एगो स्थायी जगहा राखेला काहें कि इहे दिन रहल जहिया आधुनिक भारत के जनम भइल रहे. महात्मा गाँधी के नैतिक आ राजनैतिक अगुअई में राष्ट्रीय कांग्रेस साल 1929 में अंगरेजन से पूरा आजादी के मांग करे वाला ‘पूर्ण स्वराज’ के संकल्प पारित कइले रहुवे. 26 जनवरी, 1930 का दिने गाँधी जी पूरा देश में आजादी के दिन का रूप में मनावे वाला समारोहन के आयोजन करवले रहन. ओही दिन से, देश तब हर साल एह दिन के आजादी के किरिया लेत आइल रहे जबले देश के पूरा आजादी मिल ना गइल.

ठीक बीस बरीस बाद साल 1950 में हमनी के अपना देश के आधुनिकता के एलान करे वाला संविधान के अंगीकार कइले रहीं. ई एगो विडम्बना रहल कि ओकरा दू बरीस पहिले गाँधी जी शहीद हो गइल रहीं बाकिर आधुनिक दुनिया का सोझा भारत के आदर्श बनावे वाला संविधान के ढाँचा उनहीं के विचार पर रचाइल रहे. एकर मूल चार गो सिद्धान्तन पर बा; लोकतंत्र, मजहब के आजादी, मरद मेहरारू के बरोबरी, आ गरीबी के जाल में फँसल लोग के बाहर निकालल. एह मूल बातन के संवैधानिक दायित्व बना दिहल गइल. देश के शासकन ला गाँधी जी के मंत्र सरल बाकिर ताकतवर रहे – जब कबो मन में शंका होखो तब ओह गरीब आ सबले कमजोर के चेहरा याद करीं जेकरा के रउरा देखले होंखी आ फेर अपना से पूछीं कि का एहसे ओह आदमी के भूख आ पीड़ा से कवनो राहत मिल पाई. समावेशी विकास का जरिए गरीबी मेटावे के हमनी के संकल्प ओही दिशाईं एगो डेग होखे के चाहीं.

प्यारे देशवासी,
पिछला बरीस कई तरह से खास रहल. खास कर एह ला कि तीस बरीस बाद जनता स्थाई सरकार ला एगो अकेला गोल के पूरा बहुमत देत सत्ता में ले आवे ला वोट दिहलसि. आ एह जरिए देश के शासन के गठबन्हन राजनीति के मजबूरियन से आजाद क दिहलसि एह चुनाव के फैसला से चुनल सरकार के नीति बनावे आ ओह नीतियन के लागू करवावे खातिर कानून बना के जनता के दिहल आपन डचन पुरावे के जनादेश मिलल बा. वोटर आपन काम क दिहलें, अब ई चुनल लोग के दायित्व बा कि एह भरोसा के सम्मान करसु. ई वोट एगो साफ, कुशल, कारगर, लैंगिक समानता वाला, पारदर्शी, जवाबदेह आ नागरिकन ला सहज शासन खाति रहुवे.

प्यारे देशवासी,
काम करे वाली विधायिका का बिना शासन संभव नइखे. विधायिका जनता के मनसा देखावेले. ई एगो अइसन मंच ह जहाँ तरीका से बातचीत-बहस करत प्रगतिशील कानून बना के जनता के मनसा पुरावे वाला तंत्र रचावल चाहीं. एहला भागीदारन का बीच मतभेद मेटावेे आ बने वाला कानूनन पर समहर के सहमति बनावे के जरूरत होला. बिना चरचा करवले कानून बनवला से संसद के कानून बनावे वाली भूमिका के धक्का चहुँपेला. एहसे जनता के विश्वास टूटेला. ई ना त लोकतंत्र ला नीक होला आ ना ही एह कानूनन से जुड़ल नीतियन ला.

प्यारे देशवासी,
पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, रवीन्द्र नाथ टैगोर, सुब्रह्मण्यम भारती आ अइसने अनेके लोग के बेवसाय आ नजरिया भलही अलग-अलग रहुवे बाकिर ऊ सभे देशभक्तिए के भाषा बोलल. हमनी का अपना आजादी ला राष्ट्रीयता के महान योद्धन के करजदार बानी जाँ. हम ओह भुलाईल बिसरावल बहादुर लोगो के प्रणाम करत बानी जे लोग भारत माता के आजादी ला आपन कुर्बानी दे दिहल. बाकिर हमरा दुख होला जब मेहरारूवेन के हिफाजत के बात होला तब ओकर आपने जामल भारत माता के सम्मान ना करे. बलात्कार, हत्या, सड़कन पर छेड़छाड़, अपहरण, आ दहेज हत्या जइसन अत्याचार मेहरारूवन के मन में अपना घरो में डर पैदा क दिहले बा. रवीन्द्र नाथ टैगोर मेहरारूवन के ना सिरिफ घरे के जोति मानत रहलें, ऊ त एह लोग के खुद आत्मा के प्रकाश मानत रहले. महतारी-बाप, शिक्षक आ नेता का रूप में हमनी से कहाँ कवन चूक हो गइल जे हमहन के जामल सभ्य व्यवहार आ मेहरारूवन ला सम्मान भुला दिहलें. हमनी का बहुते कानून बनवले बानी जा, बाकिर जइसन कि एक बेर बेंजामिल फ्रैंकलिन कहले रहीं, ‘न्याय के मकसद तबले पूरा ना होखी जबले उहो लोग ओतने तकलीफ महसूस करी जइसन तकलीफ भुगते वाला महसूस करेलें.” हरेक भारतीय के किरिया लेबे के चाहीं कि हर तरह के अनेत से मेहरारूवन के रक्षा करीहें. उहे देश दुनिया के ताकत बन सकेला जवन अपना मेहरारूवन के इज्जत देला आ ओहनी के बेंवतगर बनावेला.

प्यारे देशवासी,
भारत के संविधान लोकतंत्र के पवित्र किताब ह. ई अइसन भारत के सामाजिक-आर्थिक बदलाव के राह देखावेवाला ह जवन पुरनका जमाना से बहुलता के इज्जत देत आइल बा, सहनशीलता के पक्ष लिहले बा आ अलग अलग समुदायन का बीचे सद्भाव के बढ़ावा दिहले बा. बाकिर एह मूल्यन के हिफाजत बहुते सावधानी से आ मुस्तैदी से कइला के जरूरत बा. लोकतंत्र में समाईल आजादी कबो-कबो पागलपना वाला प्रतिस्पर्धा का रूप में अइसन तकलीफदेह हालात बना देला जवन हमनी के परंपरागत सुभाव से उलटा होला. बोली के हिंसा चोट चहुँपावेले आ लोगन के दिल घवाहिल क देले. गाँधी जी कहले रहीं कि मजहब एकता के ताकत होले, हमनी का एकरा के टकराव के जरिया ना बना सकीं.

प्यारे देशवासी,
भारत के सौम्य शक्ति का बारे में बहुते कुछ कहल जाला बाकिर एह तरह के वैश्विक माहौल में, जहाँ बहुते दे मजहबी हिंसा के दलदल में धँसत जात बाड़े, भारत के सौम्य शक्ति के सबले मजगर नमूना मजहब आ राज-व्यवस्था का बीच नाता के हमनी के परिभाषा में लउकेला. हमनी का हमेशा मजहबी बरोबरी पर आपन भरोसा जतवले बानी जा जहाँ कानून का सोझा हर मजहब बरोबर होला आ हर संस्कृति एक दुसरा से मिल के एगो सहीदिशा में चलेवाला गतिशीलता रचेले. भारत के प्रज्ञा हमहन के सिखावेले – एकता ताकत ह, प्रभुता कमजोरी.

प्यारे देशवासी,
अलग अलग देशन का बीच के टकराव सीमा के खूनी हद में बदल दिहले बावे आ आतंकवाद के बुराई के उद्योग बना दिहले बा. फसाद आ हिंसा हमनी के सीमा से घुसपैठ करत बा. शांति, अहिंसा आ निमना पड़ोसी वाला भावना हमनी के विदेश नीति के बुनियादी तत्व होखे के चाहीं बाकिर हमनी का अइसन दुश्मनन से गाफिल रहे के जोखिम ना उठा सकीं जा जे समृद्ध आ समतावाला भारत का ओर हमनी के बढ़े का राह में बाधा चहुँपावे ला कवनो हद ले जा सकेला. हमनी में अपना जनता के खिलाफ लड़ेवाला एह सूत्रधारन के हरावे के ताकत, भरोसा आ जिद्द मौजूद बा. सिवान पर युद्ध विराम के बार बार लँघला आ फसादी हमलन के जवाब कारगर कूटनीति आ भेदल ना जा सकेवाला सुरक्षा प्रणाली से देबे के चाहीं. दुनिया के फसाद के एह सराप से लड़े में भारत के साथ देबे के चाहीं.

प्यारे देशवासी,
आर्थिक बढ़न्ती लोकतंत्र के इम्तिहान होले. साल 2015 उमीदन के साल हवे. आर्थिक संकेतक बहुते आशा देबे लायक बाड़ी सँ. बाहरी सेक्टर के मजबूती, राजकोष के मजगर बनावे का दिशाईं बढ़्ती, दाम में कमी, विनिर्माण का क्षेत्र में सुधार के शुरुआती संकेत आ पिछला साल खेती के उपज में कीर्तिमान हमहन के अर्थव्यवस्था खातिर नीमन संकेत देत बाड़ी सँ. साल 2014-15 के पहिला दुनू तिमाही में 5 फीसदी से अधिका के विकास दर, 7-8 फीसदी विकास दर का दिशा में शुरुआती बदलाव देखावत बा.

कवनो समाज के सफलता ओकरा मूल्यन, संस्थानन आ शासन के स्तंभन के बनल रहला आ बेंवतगर होखल दुनू से नापल जाला. हमहन के राष्ट्रीय गाथा के एकरा अतीत के सिद्धांतन आ आधुनिक उपलब्धियन से आकार मिलल बा आ आजु ई अपना बेंवत के जगा के भविष्य बनावे ला तत्पर हो गइल बा.

प्यारे देशवासी,
हमहन के राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा बा भारत के जनता के जीवन स्तर तेजी से उठावल आ ज्ञान, देशभक्ति, करुणा, ईमानदारी आ कर्तव्यबोध माने वाला पीढ़ी तइयार कइल. थाॅमस जैफरसन कहले रहन, ‘सगरी जनता के शिक्षित आ सूचना संपन्न बनाईं. … ऊहे लोग हमनी के आजादी के रक्षा करे के भरोसा दे सकीहें.’ हमनी के अपना शैक्षिक संस्थानन में सबले बेहतर गुणवत्ता बनावे ला काम करे के चाहीं जेहसे कि आगे चल के 21वीं सदी के ज्ञान क्षेत्र के अगुअन में आपन जगहा बना सकीं जा. हम खास क के ई कहल चाहब कि किताब आ पढ़े के संस्कृति पर बेसी जोर दीहिं जा जे ज्ञान के कक्षा से बाहर आगा ले ले जाव आ कल्पनाशीलता के तात्कालिकता आ उपयोगितावाद के दबाव से आजाद करे. हमनी के आपस में एक दोसरा से जुड़ल अनगिनत विचारधारन से बनल सिरजनगर देश बने के चाहीं. हमहन के नवहियन के अइसन ब्रह्मांड के, प्रौद्योगिकी आ संचार में पारंगत होखे का दिशाईं अगुआ बने के चाहीं जहाँ आकाश बेसिवान वाला पुस्तकालय बन गइल बा आ रउरा हथेली में मौजूद कंप्यूटर में महत्वभरल मौका रउरा के तिकवत बा. 21वीं सदी भारत के मुट्ठी में बा.

प्यारे देशवासी,
अगर हमनी का अपना नुकसानदेह आदत आ सामाजिक बुराईयन से अपना के लगाता साफ करे के अपना बेंवत के इस्तेमाल ना करब त भावी हमनी का सोझा होखला का बावजूद हमनी के पकड़ से बाहर हो जाई. पिछलका सदी में, एहमें से अनेके आदत आ बुराई खतम हो चुकल बाड़ी सँ, कुछ बेअसर हो गइल बाड़ी सँ बाकिर बहुते अबहियों मौजूद बाड़ी सँ. हमनी का एह साल दक्खिन अफ्रीका से महात्मा गाँधी के वापसी के सदी मनावत बानी जा. हमनी का गाँधी जी से सीखल कबो ना छोड़ब. साल 1915 में उहाँ के जवन पहिला काम कइले रहीं ऊ रहल आपन आँख खुलल राखल बाकिर आपन मुँह बन्द राखल. एह सीख के अपनावल नीमन रही. जब हम साल 1915 के बाद करत बानी, जवन कि सहिए बा, त हमनी के साल 1901 में, जब गाँधी जी अपना पहिला छुट्टी में घरे आइल रहीं, कइल गाँधी जी के एगो काम पर नजर डाले के चाहीं. ओह साल कांग्रेस के अधिवेशन कलकत्ता में बोलावल रहुवे जवन ओह घरी ब्रिटिश भारत के राजधानी रहुवे. गाँधी जी एगो बइठक खातिर रिपोन काॅलेज गइल रहीं. ओहिजा देखनी कि बइठक में आइल लोग सगरी जगहा गंदा क दिहले बा. ई देख के दुखी गाँधी जी सफाईवाला के आवे के इंतजार ना करत खुदे झाड़ू उठवनी आ ओह जगहा के साफ क दिहनी. साल 1901 में उहाँ के देखावल राह पर केहू ना चलल. आई, 114 बरीस बाद हमनी का ओह राह पर चले के शुरुआत करीं आ एगो महान पिता के लायक बच्चा बन जाईं जा.
जय हिंद!


भाषण हिन्दी में सुनीं.


(गणतंत्र दिवस के पहिले का साँझ देशवासियन के दिहल राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के संबोधन के भोजपुरी अनुवाद. कवनो भूल-चूक ला अगताहे माफी मँगला का साथ. भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता दिआवे खातिर लागल लोग के हर मौका पर अइसन कुछ कइला के जरूरत बा जवना से भोजपुरी के बेंवत के पता लाग सके. )

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