– पाण्डेय हरिराम

रामलीला मैदान में बाबा रामदेव के आंदोलन का खिलाफ पुलिसिया कार्रवाई के भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी जलियांवाला बाग कांड के नाम दे दिहलन आ औकरा विरोध में राजघाट पर अनशन कइले. सुषमा जी देशभक्ति गाना पर ठुमका लगवली. बुध का दिने गांधीवादी अण्णा हजारे गांधी टोपी पहन के दिन भर के अनशनो कइलन. बड़हन भीड़ रहुवे. कहवाँ-कहवाँ से लोग आइल रहे पता ना. इरादा रहे बतावे के कि दमन का ताकत का मुकाबिले नैतिकता के ताकत बा.

जब जिक्र जलियांवाला बाग के भइल त जरूरी बा इतिहासो में झांकल. ओह कांड से एक दिन पहिले गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर बापू से कहले रहले कि ‘शक्ति कवनो रुप में असंगत होले.’ संभवत: दुनिया के ई मालूम रहे कि सत्ता के शक्ति, चाहे तब के होखे भा अब के, कतना दमनकारी आ विध्वंसक होखेला. लेकिन उनुकर चेतावनी खाली सत्ता के ताकत खातिर ना रहे, उनुका चिंता के विषय रहे जनता के नैतिक बल. उनुका मालूम रहे कि जनता खूनो-खराबा कर सकेले आ बाद में ओकरा के जन-आक्रोश बतावत जायजो ठहरा सकेले. गुरुदेव को चिंता एही बाति के ले के रहे. उनुकर चेतावनी सत्याग्रहो का खिलाफ रहे जवना के ऊ नैतिक ना मानत रहले.

ओह घरी देश में गांधी के नैतिक बल का बारे में सबले बेसी जाने वाला आ ओकरा प्रति सबले बेसी आश्वस्त रहे वाला रवीन्द्रेनाथ रहले. एकरा बावजूद ऊ भीड़ का राजनीति से डेराइल रहत रहले. महतमे गांधी का तरह उनुकरो मानल रहे कि राजनीति में हथकंडे ठीक ना होला आ ओकर इस्तेमाल पूरा तरह से नैतिक ना होला. सत्याग्रह वाली राजनीति में सत्य के क्षमता का बदले दरअसल आत्म बल के उपयोग होखेला जे अपना आप में प्रेम आ करुणा के स्वरूप ह. लेकिन प्रेम आ करुणा खाली ओही लोग खातिर ना होला जे कचराइल बाड़े भा पीडि़त बाड़े, बलुक ओहू लोग खातिर होले जिनका खिलाफ आंदोलन हो रहल बा.

जब रउरा दोसरा के मानवीयता के सकारब तबहिये कहीं जा के साँच का धरातल पर बाति हो सकेला काहे कि एकरा खातिर जरूरी बा कि दुनु फरीक नैतिकता के मानसु. शैतानी में नैतिकता कातिर कवनो जगहा ना होला. सत्याग्रह दमन, अत्याचार आ पाखंड से मुक्ति के कार्रवाई ह बाकिर साथ ही साथ ई दोसरा के ना दबावे आ ना सतावहु के कार्रवाई ह. रवींद्रनाथ गांधी से भइल अपना बात का आखिर में कहाले रहले कि ‘हमनी के कोशिश आत्मा के जोत से मुर्दन में प्राण देबे के होखे के चाहीं.’ गांधी अउर रवींद्रनाथ दुनु के मानना रहे कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम दोहरा मुक्ति संग्राम ह जवना में पहिला ह भारत के आजादी के जंग आ दुसरका ह यूरोप के साम्राज्यवाद से मुक्त करावे के जंग. महात्मा गांधी मानत रहले कि सत्याग्रह के मतलब परिवर्तनकारी राजनीतिए ना बलुक सबका ला एगो सुसंगत समाज के रचनो ह. गांधी खातिर अनशन आत्मशुद्धि के साधन रहल. ऊ सार्वजनिक अनशन के अवपीड़क स्वरूप से बढ़िया से परिचित रहले आ इहे कारण रहल कि ऊ एकरा परपीड़क प्रभाव से हमेशा सचेत रहत रहले.

बाबा रामदेव अउर अण्णा हजारे के अनशन भा सत्याग्रह के औचित्य में कतहीं कवनो कमी नइखे. लेकिन ई सत्याग्रह वइसन नइखे जइसन कि गांधी एकरा बारे में मानत रहले. एहसे जरूरी बा कि सत्ताधारियन से अपना संबंधन का मामिला में हमनी का गांधी के बख्श दीं. काहे कि आजु के सत्ता आ सियासत दुनु बदलाव का भयानक दौर से गुजर रहल बा. एहिजा सवाल बा कि का ई सत्याग्रह सार्वजनिक जीवन में नैतिकता के बढ़ावा देबे का उपाय का रुप में कारगर हो सकेला. नैतिक होखे के जिम्मेदारी खाली सरकारे पर ना होले बलुक ई बराबर रूप में जनतो पर होले. भठियरपन त नैतिक आचरण के एगो पहलू भर ह. नैतिक आचरण के सबले बड़हन पहलू ह सद्व्यवहार. आम जनता आजु का आंदोलन के नेता लोग से आसरा लगवले बिया कि ऊ लोग राजनीति में नैतिकता के बढ़ावसु जेहसे कि सही आ सुसंगत सियासत से जुड़ल समाज बनावल जा सके. अगर अइसन होखत बा त भठियरपन अपने आप बिला जाई. लेकिन एहिजा समस्या ई बा कि अनशन भा सत्याग्रह के चेहरा बड़ा तेजी से दोसरा के पीड़ा देबे वाला भा दबावे वाला होखल जा रहल बा. गांधी अइसन ना चाहत रहले एहसे अइसनका आंदोलनन से कम से कम गांधी के नाम के नाहिये जोड़ल जाव त बेहतर.



पाण्डेय हरिराम जी कोलकाता से प्रकाशित होखे वाला लोकप्रिय हिन्दी अखबार “सन्मार्ग” के संपादक हईं आ उहाँ का अपना ब्लॉग पर हिन्दी में लिखल करेनी.

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