देखीहऽ मामिला अझुरा जनि जाव….

– पाण्डेय हरिराम

श्री रामजन्मभूमि मंदिर- बाबरी मस्जिद विवाद सुलह समझौते से सलटावे के कोशिश संत लोग खारिज कर दिहलसि आ मँगले बा लोग कि पूरा विवादित जमीनवे रामलला के हऽ आ एकरा के रामलला के सँउप दिहल जाव. संतन के कहनाम बा कि एह माँग के ले के ऊ लोग उच्चतमो न्यायालय के दरवाजा खटखटाई आ साथही साथे पूरा देश में जनजागरण अभियानो चलाई जेहसे कि अधिग्रहीत परिसर रामलला के सँउपे लायक माहौल बनावल जा सके.

संतन के मानना बा कि विवादित जमीन के विभाजन देश के बंटवारा जइसन बा एहसे ओह जमीन के बंटवारा मंजूर ना कइल जा सके. एकरा के लेके पिछला साठ बरीसन से भारत के दू बड़हन समाज – हिंदु आ मुसलमान – में टकराहट चलल आवत बा, आ शायद आगहू ई जारी रहे.

बाकिर अगर सामाजिक मनोविज्ञान का जमीन पर आके एह हालात के विश्लेषण करीं त अइसनका महसूस होला कि ई दू गो समाज समूह भा राष्ट्र भा संस्कृतियन के टकराहट ना होके दू गो विचारधारा के टकराहट भर हऽ. अगर गहराई से देखीं त महसूस होखी कि भारत जवन आजु बा, ऊ एगो राष्ट्र भा संस्कृति से अलग एगो विचारो हऽ. एगो दर्शन हऽ भारत.

आज हिंदुत्व के मुखालिफत करे वाला कुछ सेकूलर कहाये वाला लोग राम जन्मभूमि परिसर पर हिंदुवन के दावा के गलत बतावत ओकरा के वाहियात आ हास्यास्पद बता रहल बा. ओह लोग के मानना बा कि 1528 में जब बाबर के फौजी सरदार मीर बाकी ई मस्जिद बनवले रहे ओह समय से ओहिजा सौहार्देवश रामलला के आरती होत रहुवे. अलग-अलग संप्रदायन से जुड़ल भारत के लोग आजादी के साठ बरीस में भारत के धर्मनिरपेक्ष विचार के प्रति आस्थावान रहल बा. बाकिर जवन संगठन आ राजनीतिक दल भारत के एह विचार के खिलाफ रहले ऊहे अयोध्या में मस्जिद का जगहा पर राममंदिर निर्माण अभियान चला के हिंदुत्व के नया शक्तिशाली प्रतीक के आविष्कार कर दिहले. एह अभियान से हिंदू बहुल का आगे अल्पसंख्यक धार्मिक विश्वास के अस्तित्व पर सवाल खड़ा कर दिहले. जवन भारतीय संविधान धर्म से ऊपर उठके सगरी लोगन के समान अधिकार आ सुरक्षा देबे के वचन देला, एह अभियान से ओह संविधान परे सवालिया निशान लगा दिहल गइल. जवना जमीन पर मस्जिद रहुवे ओह जमीन पर हिंदुवन के दावा आस्था पर आधारित रहुवे.

आस्था के आधार पर फैसला दिहला के आलोचना करे वालन से एगो सवाल पूछल जा सकेला कि आखिर 1528 में ओहिजे आरती काहे होत रहुवे, रामलला के जन्मभूमि का नाम पर कवनो दोसरा जगहा काहे ना ?

लोकतंत्र आ धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हमेशा हिंदूवने का आस्था पर काहे चोट मारल जाला ?

कुछ लोग के तर्क बा कि 1528 में जब मीर बाकी मस्जिद बनववले ओह काल में रामचरित मानस के रचयिता गोस्वामी तुलसी दास वयस्क रहल होखीहें आ ऊ एकर चर्चा भा एह पर कवनो आपत्ति ना उठवलें. ई दलील ओतने वाहियात बा जतना कवनो नवही के कुतर्क.

तुलसी के रचना के उद्देश्य, लक्ष्य भा मनोविज्ञान भौगोलिक सीमांकन ना रहुवे. ऊ ना त इतिहास लिखे बइठल रहन ना दस्तावेज तइयार करत रहले. उनकर उद्देश्य समष्टि के वैराट्य का व्यष्टि में समायोजन रहुवे. एगो अइसन पाठ्य प्रयास जवन अवचेतन में दृष्य – श्रव्य के प्रभाव पैदा कर के अवचेतन के “रेशनालाइज” कर सके.

सेकूलरिज्म के घात प्रतिघातन का बावजूद अगर आजु जन जन का हृदय में राम बसल बाड़न त एकर बहुत बड़का श्रेय तुलसीए दास के जात बा. तुलसी आपत्ति ना कइलें. ओकरा बदेल ऊ एगो शब्द के नया व्युत्पत्ति करके ओकरा के निष्पत्ति तक पहुंचा दिहलें.

अगर अदालत आस्था के आदर कइले बिया त संतन के मांग एकदमे उचित बा आ ओकर क्रियान्वयनो जरूरी बा. ना त अनेसा बा कि समाज में आंतरिक विखंडन के खतरा बढ़ सकेला. अइसनका संवेदनशील मौका पर एगो मामूलीओ प्रशासनिक गलती सदियन तक घाव बनके रिसत रह सकेला.

यह जब्र भी देखा है तारीख की निगाहों ने
लमहों ने खता की थी सदियों ने सजा पाई.


पाण्डेय हरिराम जी कोलकाता से प्रकाशित होखे वाला लोकप्रिय हिन्दी अखबार के संपादक हईं आ ई लेख उहाँ का अपना ब्लॉग पर हिन्दी में लिखले बानी. अँजोरिया के नीति हमेशा से रहल बा कि दोसरा भाषा में लिखल सामग्री के भोजपुरी अनुवाद समय समय पर पाठकन के परोसल जाव आ ओहि नीति का तहत इहो लेख दिहल जा रहल बा.अनुवाद के अशुद्धि खातिर अँजोरिये जिम्मेवार होखी.