बाति के बतंगड़

– ओ. पी. सिंह

माया महाठगिनि हम जानी.
कबीर त ई बाति कहि के आराम से निकल गइलन. आजु के जमाना रहीत त महामाया भा मायावती के चेला चाटी उनुकर खटिया खड़ा कर दिहले रहीत लोग. महामाया के माया तनिका पुरान हो गइल से नयका पीढ़ी के लोग उनुका माया का बारे में कमे जानत होखी. एहसे सुना देत बानी.
महामाया के माया उनुका कुरता में बसत रहुवे. उनुका बारे में कहात रहे कि सौ गो कुरता के खरचा पर ऊ कवनो चुनाव जीत सकेलें. भाषण देत देत ऊ जोश में आपन कुरता फाड़ देस आ उनुकर एह अदा पर लड़िका सयान सभे उनुका माया में आ जात रहुवे. महामाये के पसारल माया ह जे पढाई मे बिहार के विद्यार्थियन के पिछड़ा बना दिहलसि. समरथ विद्यार्थी त बिहार का बहरी जा के आपन करियर बचा लिहलें बाकिर जेकरा लगे अतना साधन ना भइल कि ऊ बहरी जा सके ऊ बिहार में बरबाद हो के रहि गइल.
कुछ कुछ अइसने माया अबहियों पसर गइल बा देश का दलितन पर. दलित समाज के एगो वोट बैंक बना के राख दीहल गइल बा. दलितन के आगा बढ़ावे, उपर उठावे के चाव केहु के नइखे. दलित नेता लोग के भरसक कोशिश इहे बा कि दलित दलिते बनल रहो आ ओकरा के वोट डालत रहो, ओकर तिजोरी भरत रहो. कुछ लोग त चमड़ा के एगो थैली हमेशा हाथे में लटकवले राखेला कि दलितन के याद रहो कि एह थैली के भरत रहे के जिम्मेदारी ओही लोग प बा.
पिछला बेर हम लिखले रहीं कि बाते से आदमी पान खाला आ बाते से लात. आ तुरते एगो नमूनो सामने आ गइल. एगो नेता दोसरका के तुलना बेसवा से क दिहलसि त दोसरका नेता आ ओकर लगुआ भगुआ पहिलका नेता के बेटी बहिन का खिलाफ ओहू ले गलीज भाषा के इस्तेमाल क दिहलसि. ऊ खोंचले त एने से भर खंचिया खरकोच के जवाब दे दीहल गइल. एहबीच खांचा का भितरे सोचेवाला लोग के लागल कि पहिलका नेता क गोल अब दबा गइल दोसरका के गोल से आ एहसे निकलल मुश्किल बा. बाकिर अचके में खाँच से बाहर के सोच राखत एगो अइसन जवाब मिलल कि लोग के ठकुआ मार दिहलसि. दोसरका गोल त एकदमे भकुआ गइल कि ई का दादा, देखते देखत हमनी के जीतावत पासा हमनिये के हरा दिहलसि. मामला अब युद्ध विराम का हालत में बा आ पहिलका गोल बाजी जीत लीहल लउकत बा. एकरे के कहल जाला बाति प बतंगड़ भारी.
बाकिर सोचे वाली बाति त इहो होखे के चाहीं कि बेसवा के अतना गलीज काहे मानल जाला. जब सभे केहु कुछ ना कुछ बेचत बा त देह बेचेवाला के अतना गिरल काहे मानल जाला. बेसी लोग आपन मेहनत बेचेला, त कुछ लोग आपन बुद्घि. केहु सपना बेचे में लागल बा त केहु आपन इमान बेचत बा. इमान बेचे वालन के त अउरी खराब माने के चाहीं. शायद ई सब कुछ एहसे हो गइल कि बेसवन के खरीददार आपन मुँह लुका के जालें जबकि बाकी धंधन के खरीद बिक्री खुलेआम होखेला. आ फेर अगर कवनो गोल के मुखिया अगर चुनाव के टिकट बेचत बा त सबले बड़का दाम देबे वाला के काहे ना देव. कहलो जाला कि बेटा के तिलक, जमीन के दाम, आ मकान के भाड़ा अतना मांगीं कि अपने लाज लागो. अगर एही तरह टिकटो के दाम केहु लेत बा त का बुराई, काहे बुराई. टिकटवा खरीदे वाला लोग कवना दूध से धोवाइल बा. जइसे बेटिहा लोग कवनो लड़िका पर तिलक खातिर चढ़ा उपरी क देला ई जानतो कि एगो दोसरा बेटिहा से बाति तय हो गइल बा ओही तरह टिकटो खरीदे वाला करत बाड़ें. त एह लालच में बेचेवाला के मन बेईमान हो जात बा त ओकर दोस का.
दोसर बाति इहो कि नेतवन के झगड़ा कई बेर पहिले से फिक्स्ड मैच होला. कई बेर दू गो गोल अपना में लड़ि के तिसरका कवनो गोल के पत्ता काटे के काम कर जालें. ले दे के बाति हम कबीर दास के ओही कविता के आखिगी लाइन से करत बानी जवना से शुरु भइल आजु के बतंगड़ –
कहे कबीर सुनो भई साधो यह सब अकथ कहानी.

Comments 1

  • श्री ओ०पी० सिंह सर से हम पूरी तरह से सहमत बानी । अब स्वामीये जी के देखल जाव, त अचके खियाल पड़ी जात बा “अंगूर खट्टे हैं” ।

    अभी कुछही दिन पहिले माया जी के माया में डाल के टिकट फ्रॉडगीरी के आरोप लगा के चल दिहले हव ।
    ई बात बिलकुल साँच बा कि ऐह लोग के नौटंकी पहिलही से तय रहेला बस जरूरत बा समय आ मंच के चाहे दर्शक कतनो रहे ।

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