मारीशस में गिरमिटहा मजदूरन के अइला के 180वाँ सालगिरह मनावल गइल


पिछला 2 नवंबर 2014 का दिने मारीशस के आप्रवासी घाट, पोर्ट लुइस पर गिरमिटिया मजदूरन के अइला के 180वां सालगिरह पूरा धूमधाम से मनावल गइल. एह मौका पर मारीशस के राष्ट्रपति राजकेश्वर प्रयाग, प्रधानमंत्री डा॰ नवीनचन्द्र रामगुलाम, भारत के विदेश मंत्री सुषमा स्वराज आ अउरियो खासमखास लोग मौजूद रहल.

समारोह के आयोजन आप्रवासी घाट ट्रस्ट निधि का सहयोग से मारीशस के कला आ संस्कृति मंत्रालय कइले रहुवे. समारोह में ओह समय के सजीव रूप से परोसल गइल जब गिरमिटिहा मजदूर पहिला बेर आप्रवासी घाट के सीढ़ी चढ़ल रहलें. ओह सीढ़ियन प श्रद्धासुमन चढ़ावल गइल आ स्थानीय आ विदेशी कलाकार नृत्य के रंगारंग कार्यक्रम पेश कइले.
आप्रवसी घाट ठ्रस्ट का तरफ से स्मारिका के विमोचन कइल गइल आ बिक्रमसिंह रामलल्ला के मूर्ति के अनावरण कइल गइल.

अपना संबोधन में प्रधानमंत्री नवीनचन्द्र कहलन कि आजु अपना जड़-सोर के सकरला के दिन बा. बतवलन कि के तरह गिरमिटिहा मजदूर भारत से मारीशस अइले आ साल 1834 में दास प्रथा खतम भइला का बाद ओह लोग के जिनिगी के सफर के दास्तां दोहरवले. ओह पुरनियन के याद कइलन जिनका लगन, त्याग आ मेहनत से मारीशस के एह लायक बनलवन जवन आजु देखल जात बा.

डा॰ रामगुलाम बतवलन कि गिरमिटिहा मजदूरन के गुलाम लेखा मानल जात रहुवे बाकिर ऊ लोग अपना जीवट से सगरी बाधा पार करत आइल. कहलन कि दुनिया के अनेक महादेशन से आइल आप्रवासी मारीशस के समृद्धि बढ़ावे ला मिल जुल के काम कइले.

कहलन कि हमनी का बहुते आगा आ गइल बानी जा बाकिर एह राह के कवनो अंत नइखे. हमनी का अबहीं अउर आगे जाए के बा आ एह लगातार बदलत वैश्विक दुनिया के चुनौती सकारत बढ़िया जिनिगी जिए का तरफ बढ़त जाए के बा. हमनी के आपन कोशिश के एकजुट कइल जरूरी बा जेहसे कि हमहन के पूरा बेंवत के उपयोग हो सके.

डा॰ रामगुलाम बतवलन कि गिरमिटिहा मजदूरन के आवे के राह के अध्ययन करे के मारीशस के प्रकल्प यूनेस्को मंजूर कर लिहले बावे. एह अध्ययन के मकसद रही ई जाने के कि एह समहर प्रवास के असर सांस्कृतिक सहभागिता आ आधुनिक समाज बनावे का दिसाईं का रहल. कहलन कि मारीशस दुनिया के अकेला देश ह जहाँ यूनेस्को के दू गो विरासत जगहा मौजूद बा. एक त गुलामी के प्रतिरोध खातिर समर्पित ले मोर्ने आ दुसरका गिरनिटिहा मजदूरन से जुड़ल आप्रवासी घाट.

एह मौका पर भारत के विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के संबोधन नीचे दिहल जात बा :
सुषमा स्वराज अपना संबोधन के शुरुआत भोजपुरी में बोलत कइली. कहली कि “हम अपन बात शुरू करे से पहिले ऊ सभी पूर्वज लोगन के याद और उनकरा नमन करे चाहब, जोन एक सौ अस्सी बरिस पहिले अपने देस के छोड़ के मारिशस देश आइल रहलन जा और जोन अपन खून पसीना बहाके ई धरती के सिंचलन और मॉरीशस देस के नींव डललन जा.”

हे महामहिम श्री राजकेश्वर प्रयाग, मारीशस के राष्ट्रपति, महामहिम डा॰ नवीनचंद्र रामगुलाम, माननीय विदेश मंत्री डा॰ अर्विन बुलेल, माननीय कला आ संस्कृति मंत्री डा॰ मुक्तेश्वर चुनी, आप्रवासी घाट ट्रस्ट के अध्यक्ष आ गणमान्य अतिथि, महिला आ पुरूषजन,

आप्रवासी घाट पर एह पवित्र मौका पर अपना मौजूदगी के हम आपन सौभाग्य मानत बानी कि आजु हमरा ओह लोग के श्रद्धांजलि देबे के सुअवसर मिल पावल जे लोग आजु से 180 बरीस पहिले आपन सफर शुरू कइले रहुवे. अपना कठिन मेहनत आ बलिदान का सहारे हमनी के ऊ पुरखा पुरनिया हमनी के आजादी आ समृद्धि के राह खोल देलन जवना के आजु मारीशस आनन्द लेत बा.

भारत से आइल गिरमिटिहा मजदूरन के आगमन के श्रद्धा से याद कइला का साथही आत्मचिंतन करे के मौका बा ई. 2 नवंबर 1834 के एह यादगार दिन का मौका पर हमनी का ओह सगरी पुरखन के नमन करत बानी जे एह इन्द्रधनुषी द्वीप मारीशस का किनार पर भारत आ दुनिया के दोसरा जगहन से उतरले. ओह लोग के आंसू आ पसीना बाद के पीढ़ि ला सुख आ सुरक्षा से जिए के आधार बनवलसि.

मित्रों, आप्रवासी घाट के एक एक ईंट ओह संघर्ष, बहादुरी आ जिजिविषा के कहानी कहेला. ई ओह लोग के कहानी ह जे हर तरह से उल्टा आ कठिन माहौल के बदल के आजु के स्वर्ग जइसन माहौल बनावे ला काम कइलें. एही विरासत से आजु के मारीशस के लोगन के दिशा आ ताकत मिलऽता.

180 बरीस पहिले, एही दिने, एमवी एटलस नाम के एगो पानी के जहाज हिन्द महासागर के उदात्त लहरन के चीरत गुलाम भारत से आइल गिरमिटिहा मजदूरन के पहिलका खेप उतरले रहुवे. आजु जहाँ हमनी का खड़ा बानी एहसे तनिके दूर पर ऊ जहाज लंगर डलले रहुवे. एह सोरह डेग के पत्थरन पर जब ओह लोग के गोड़ पड़ल रहे तब ओह पुरनियनो के ई ना मालूम रहुवे कि आगा जवन होखेवाला बा तवन बस बेहिसाब कष्ट आ मेहनत के दिन होखी.

हँ एही सीढ़ियन पर पड़ल डेग से आगे चल के इतिहास बदल गइल, खाली मारीशसे के ना दुनिया से भारतो के नाता बदल के राख दिहलसि ऊ डेग. एह किनार पर उतरल ओह कबो हार ना माने वाला बेथाकल मरदन, मेहरारूवन आ बचवन के बेमारी, मुफलिसी आ अन्याय के दौर झेले के पड़ल जवन आगे चल के एह प्रगतिशील आ दृढ़ मारीशस के संरचना बन गइल.

महिला आ पुरुषजन, आप्रवासी घाट के वैश्विक विरासत स्थल ओह पुरनियन के पीड़ा आ दुख के स्मारक ह जिनका बिना आजु लउकत प्रगति संभव ना रहे. आदमी के जीवट के इ जियतार निशानी ह आ एही विरासत आ यादगार के आजु हमनी का मान देबे जुटल बानी जा.

ओह गिरमिटिहा लोगन के बलिदान बेकार ना गइल. गुलामी आ उपनिवेश से मुक्ति पा के आजु के मारीशस शान से बता सकेला अपना ओह हासिल के जवना पर आजु भारत आ पूरा मानव समाज गर्व करत बा. सामाजिक विकास के अनेके मापदंड पर मारीशस खरा उतरल बा चाहे बात प्रशासन के होखो, जिनिगी के स्तर के, भा आर्थिक विकास के. मारीशस के समाज शान्ति भरल लोकतांत्रिक अग्रसर बहुलतावादी बहुमजहबी आ बहुभाषी समाज के बढ़िया उदाहरण बन के उभरल बा जवना के दुनिया के बाकी समाज अनुकरण कर सकेले.

भारत आ मारीशस के आपसी दोस्ताना संबंध दुनू देशन के समिलात इतिहास आ सांस्कृतिक विरासत का चलते बहुते गहिन बा. आजादी खातिर भारत आ मारीशस के लड़ाई एक दोसरा के साहस आ उत्साह बढ़वलसि. जब एसएस नौसेरामेड नाम के पानी के जहाज दक्खिन अफ्रीका से भारत जाए का राह में एहिजा रुकल रहे त ओह जहाज पर रहलन एगो अद्वितीय भविष्यद्रष्टा नौजवान वकील जिनकर नाम रहल मोहनदास करमचंद गाँधी.

गाँधीजी प्रवासी समुदाय, खास क के ओह गिरमिटिहा मजदूरन के जिनका कवनो नागरिक भा राजनीतिक अधिकार तब के औपनिवेशिक शासन में ना मिलत रहे, के दयनीय हालात बढ़िया से जानत रहले. मारीशस में मिलल ई छोट ठहराव ओह नौजवान में, जे आगे चल के महात्मा आ भारत के राष्ट्रपिता कहइले, एगो सांस्कृतिक सामाजिक आ राजनीतिक सशक्तिकरण के प्रक्रिया शुरू करवलसि जवना के मारीशस के आजादी के सूत्रधार आ मारीशस के राष्ट्रपिता सर शिवसागर रामगुलाम अपना तरीका से आगे बढ़वले.

भारत खातिर मारीशस के सफलता ओह मूल्य आ सिद्धान्तन के – लोकतंत्र, कानून के शासन, सहिष्णुता, सामाजिक समरसता आ उद्यमशीलता – विजय जतावेला जवन भारत बेशकीमती मानेला. भारत हमेशा से मारीशस के मित्र आ साझीदार रहल बा आ रहत रही.

हमरा कवनो संदेह नइखे कि रउरा सभे मारीशस के महान साहित्यकार श्री अभिमन्यु उन्नत के लिखल एह पंक्तियन के सुनले होखब जवन एह दीवालन पर उकेरल गइल बा. आजु के एह पावन मौका पर एह पंक्तियन के पढ़े से हम अपना के रोक ना सकीं –

“आज अचानक
हिन्द महासागर की लहरों से तैर कर आयी
गंगा की स्वर-लहरी को सुन
फिर याद आ गया मुझे वह काला इतिहास
उसका बिसारा हुआ
वह अनजान अप्रवासी…
बहा-बहाकर लाल पसीना
वह पहला गिरमिटया इस माटी का बेटा
जो मेरा भी अपना था, तेरा भी अपना”

जय मारीशस! जय हिन्द!

मारीशस के सरकारी सूचना सेवा के विज्ञप्ति का आधार पर

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