बहुत पहिले एगो चुटकुला पढ़ले रहीं. गाँधी जी मर गए, नेहरू जी मर गए, मेरी भी तबियत खराब चल रही है. पता नहीं इस देश का क्या होगा? आजु काल्हु कुछ अइसने भाव मन में आवत रहत बा. आजु जब ई लिखत बानी त कार्तिक पूर्णिमा के नहान खातिर लोग के हुजूम गंगा का तरफ बढ़ल जात बा. ठवें ठाँव शिविर लगा के सहायता के अनाउंस होखत बा. कवनो शिविर से भोजपुरी में बात नइखे कहल जात. सभे हिंदी में अनाउंस कइले जात बा. आ ई बलिया हऽ जहाँ हर केहू भोजपुरी समुझेला, बोल बतिया सकेला. एहिजा हिंदी मे बोले बतियावे के कवनो खास दरकार ना होखे के चाहीं. बाकि तबहियो लोग हिंदी कूंचत बा. भोजपुरी के नाम पर काम करे वाला लोगो आपन सगरी कार्यक्रम, भाषण, बयानबाजी, लेख, विज्ञप्ति सब कुछ हिंदिए में देत लिखत बोलत बा. सभे चाहत बा कि भोजपुरी के संविधान के अठवीं सूची में शामिल कर लिहल जाव.

धरातल पर देखला का बाद त इहे लागत बा कि ओहू लोग के भोजपुरी से कवनो मतलब नइखे. बस भोजपुरी का नाम पर आपन नाँव, धंधा चमकावे के, भोजपुरी का नाम पर सेवा करे का बहाने मेवा खाए के भूख बा. ना त आरा, छपरा, बलिया में भोजपुरी के ई दुर्गत ना होखे के चाहत रहुवे. बा कवनो कोशिश कवनो आंदोलन एह ला कि आईं भोजपुरी जियल जाव, भोजपुरी में बोलल बतियावल जाव, भोजपुरी में लिखल पढ़ल जाव, नेवता वाला कार्ड भोजपुरी में छापल छपावल जाव ? ना.

सोचीं त एक बात साफ हो जाई कि भोजपुरी बोले, लिखे पढ़े के काम गँवारन जाहिलन के मान लिहल गइल बा. पढ़ल लिखल श्लील लोग एह “अश्लील” भाषा के सुधारे श्लील बनावे का कोशिश में लागल बा आ उहो हिंदी में काम करत बा. साँच कहीं त भोजपुरी के सबले बड़का दुश्मन हमरा नजर में हिंदी बिया. सरकारो हिंदी साहित्यकारन से जानल चाहत बिया कि भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता मिलला के असर हिंदी पर का पड़ी? तब के गृह मंत्री संसद में त बयान दे दिहलें कि भोजपुरी के जल्दिए मान्यता दे दिहल जाई बाकिर जवन पत्रक हिंदी साहित्यकारन लगे भेजल जाए के बात कहल जात बा वइसनका कवनो पत्रक भोजपुरी के कवनो साहित्यकार का लगे, कवनो प्रकाशन का लगे नइखे भेजल गइल. बाकिर एकर दोष हम सरकार के ना देब. असल दोष हमनी के बा जे भोजपुरी के सकरले बिना ओकरा के सम्मानित करे के नौटंकी में लागल बा. हँ हम त नौटंकिए कहब ओह सगरी प्रयास के जवन भोजपुरी में ना हो के भोजपुरी का नाँव पर कइल जात बा.

अब आईं भोजपुरी के प्रकाशन पर. कवन कवन नियमित प्रकाशन बा भोजपुरी में? बलिया से छपे वाली “पाती” आ कोलकाता से छपे वाली “भोजपुरी माटी” के अलावा कवनो दोसर नाम हमरा नइखे मालूम. रउरा पूछ सकीले कि हम हई के जेकरा लगे सगरी जानकारी होखल जरूरी होखो? बात सही बा. बाकिर आपन बड़ाई खुद करे के पाप करतो अतना त कहबे करब कि रोज कुछ ना कुछ भोजपुरी में प्रकाशित करे वाला गिनती के लोगन में से एगो हमहूं हईं. दुनिया भर में नेट का माध्यम से भोजपुरी में अतना काम केहू नइखे करत जबकी ढेरे लोग बा जिनका लगे हमरा से बेहतर संसाधन, ज्ञान, आ समूह बा. ओह लोग के एह पर अउरी जोर शोर से काम करे के चाहीं. हम त लँगड़ी गईया के अलगे बथान वाला अंदाज में काम करीले. ना तीन में हईं ना तेरह में. बाकिर ओह लोग के का कहीं जे ई काम बेहतर कर सकेला बाकि करत नइखे?

आजु जब सगरी दुनिया तेजी से इंटरनेट मोबाइल का सहारे आपन बात कहे में लागल बिया भोजपुरी साहित्यकार एह काम में बहुते पीछे बाड़े. हम ओह लोग के बहुत दोस ना दे सकीं काहे कि ऊ पुरनका जमाना के लोग ह, जे कागज पर कलम से लिखल जनले बा की बोर्ड पर खटपट करत आपन बात लिखला के आदत नइखे पड़ल. बाकिर जब आजु हिंदी में हजारन ब्लॉग बाड़ी स, भोजपुरी ब्लॉग खोजलो नइखे भेंटात. भोजपुरी के जाहिलन के भाषा बना के राख दिहले बा लोग. गाँव जवार, खेत खरिहान, आटा पिसान से बहरी नइखे निकलत लोग. अगर भाषा के जियवले राखे क बा त भोजपुरी में हर तरह के लेख, हर तरह के प्रकाशन के जरूरत बा. जिनिगी के हर अंग पर भोजपुरी में लेखन सामने आवे क चाहीं. बढ़िया किताबन के भोजपुरी अनुवाद आवे क चाहीं. बुतड़ुवन ना वर्ण परिचय के किताब सामने आवे क चाहीं. भोजपुरी में प्री स्कूल नर्सरी खुले के चाहीं.

बाकिर ई सब करी के? केकरा फुरसत बा भोजपुरी में भोजपुरी ला काम करे के? सभे लागल बा भोजपुरी का नाँव पर आपन हित साधे में. साधी सभें. ऊ दिन दूर नइखे जब ना रही बाँस ना रही बाँसुरी. भोजपुरी के श्लील बनावल एहू ला जरूरी बा कि जवन गँवार, ड्राइवर, खलासी, मजदूर, रिक्शावाला आजु भोजपुरी गीत गवनई में आपन मन बहलावत बाड़ें ओकनियो से भोजपुरी के दूर कर दिहल जाव. जे श्लील बा से भोजपुरी पढ़ी लिखी बोली ना आ जे अश्लील बा ओकरा से भोजपुरी के नैसर्गिक रूप छीन लिहल जाव. तब पता ना के रह जाई भोजपुरी के नाँव लेवा? तब सभे भोजपुरी के बात हिंदी भा अंगरेजी में कइल करी. आईं ओह दिन के इंतजार कइल जाव.

Advertisements