Santosh Patel

– संतोष कुमार

नवीन जागरण युग के अग्रदूत के रूप में हिंदी साहित्य में स्थापित “कबीर” आजु जनता के हृदय में व्यक्ति के रूप ना बलुक प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठित बानी. भगवान् बुद्ध के बाद उत्तर भारत में सामाजिक क्षेत्र में नव चेतना आ मानववाद के स्वर फूँकेवालन में कबीर सबले महान महामानव बानी. इहां के हिंदी के आदि कवि मानल जाला. इहां के परंपरागत काव्य भाषा संस्कृत आ पालि तियाग के जनभाषा अपभ्रंश मिलल हिंदी में आपन बानी मुखरित कइनी. एह शोध आलेख में इ बतावे के कोशिश कइल गइल बा कि कबीर खाली हिंदीये के ना भोजपुरी भासो के आदि कवि हई. कबीर के बिहार प्रान्त के चंपारण क्षेत्र से आ संगे संगे भोजपुरी भाषा से का संबंध बा ओकरे परख करत इ शोध आलेख बा.

भोजपुरी भाषा के आदि कवि: कबीर

भोजपुरी साहित्य आ भाषा के इतिहास पढ़ला क बाद आ अलग अलग स्त्रोतन के देखला क बाद ई साबित कइल सहज हो गइल बा कि जवना कबीर के जनभाषा अपभ्रंश फेंटल हिंदी के कवि मानल गइल उहां के सही मयने में भोजपुरी भाषा के आदि कवि हई. डॉ. उदय नारायण तिवारी, डॉ. कृष्ण देव उपाध्याय, दुर्गा शंकर प्रसाद सिंह ‘नाथ’, रासबिहारी पाण्डेय, हवलदार त्रिपाठी सहृदय, पं­­.गणेश चौबे, नर्मदेश्वर सहाय, डॉ. गदाधर सिंह, डा. तैयब हुसैन पीडित, डॉ.राजेन्द्र प्रसाद सिंह आ डॉ. गोरख प्रसाद ‘मस्ताना’ जइसन भारतीय विद्वान अपना किताबन, लेखन, निबंध आ शोध-निबंध के माध्यम से कबीर के भासा तय करे के काम कइले बाडे.

कबीर चरित्र बोध के मोताबिक कबीर के जनम संवत 1455 वीं (वर्ष 1398) के जेठ पूरनमासी के भइल रहे बाकिर बाबू श्याम सुन्दर दास, डॉ. माता प्रसाद गुप्त, डा. पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल जइसन भारतीय विद्वानन का राय में कबीर के जनम के बारे में मतभेद बा.

कबीर के जनम के बारे में कइगो जनश्रुति बाड़ी स आ कहल जाला कि उहां के एगो विधवा ब्राह्मणी के बेटा रहनी. ऊ ब्राह्मणी कबीर के जनमते उनका के लहरतारा नदी का लगे फेंक दिहली जहवाँ से नीरू आ नीमा नामके जुलाहा दम्पति उनका के उठा के ले अइलें आ उहे बालक आगे चलके कबीर साहेब कहलइलें. मिश्रबंधु एह कथा के मनगढ़त मानेलें आ उनकर कहनाम बा कि संत कबीर वास्तव में नीरू जुलाहा के बेटा रहस.1

नागरी प्रचारिणी सभा से प्रकाशित कबीर ग्रंथावली में कबीर के वाणी संकलित बा. कबीर के वाणी के भाषा पर विचार करत एकर संपादक लिखत बानी कि “यद्यपि उन्होंने (कबीर ने ) स्वयं स्वीकार किया है कि ‘मेरी बोली पूरबी है’ तथापि खड़ी, ब्रज, पंजाबी, राजस्थानी, अरबी आदि अनेक भाषाओं का पुट भी उनकी उक्तियों पर चढ़ा है.’

सांचो कबीर खुदे अपना एगो दोहा में आपन भासा भोजपुरी मनले बानी:-
बोली हमरी पूरब की, हमे लखे नहीं कोय.
हमके तो सोई लखे, धुर पूरब का होय.

आचार्य राम चन्द्र शुक्ल आपन हिंदी साहित्य के इतिहास में एह सम्बन्ध में विचार करत लिखत बानी कि “इनकी भाषा सधुक्कड़ी है अर्थात् राजस्थानी, पंजाबी, खडी बोली है, पर रमैणी और सबद में गाने के पद हैं जिनमें काव्य की ब्रजभाषा और कहीं कहीं पूर्वी बोली व्यवहार है. 2

भोजपुरी भाषा और साहित्य के दूसरका अध्याय ‘भोजपुरी साहित्य, भोजपुरी भाषा और साहित्य’ में डॉ. उदय नारायण तिवारी जी लिखले बानी कि ‘‘यद्यपि अत्यन्त प्राचीनकाल से बनारस का सांस्कृतिक सम्बन्ध मध्यदेश से रहा है तथापि उसकी भाषा तो स्पष्ट रूप से मागधी की पुत्री है. यह बोली बनारस के पश्चिम मिर्जामुराद थाना से दो तीन मील और आगे तमन्चाबाद तक बोली जाती है वस्तुतः यही बोली कबीर की मातृभाषा थी. यह प्रसिद्ध है कि कबीर पढे़ लिखे न थे अतएव अपनी मातृभाषा में रचना उनके लिए सर्वथा स्वाभाविक था. कबीर के अनेक पद आज भी बनारसी बोली अथवा भोजपुरी में है.’’ 3

भोजपुरी भाषा का इतिहास के ‘कबीर की भाषा भोजपुरी’ अध्याय में रास बिहारी पाण्डेय डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी के उद्धृत कबीर के चार गो पद के वर्णन कइले बानी जवना के डा॰ चटर्जी खांटी भोजपुरी में मानेनी, जइसेः-

“कनवा फराई जोगी जटवा बढवलें
दाढ़ी बढाई जोगी होई गइलें बकरा
कहत कबीर सुनो भाई साधू
जम दरवाजा बान्हल जइबे पकरा”
जंगल जाई जोगी दुनिया रमौले
काम जराय जोगी बन गइले हिजरा.’’ 4

डॉ. उदयनारायण तिवारी भोजपुरी साहित्य के जवन उदाहरण से कबीर के भोजपुरी भासा के आदि कवि मनले बानी उ अपने आप में सिद्ध बा. कबीर साहेब के शब्दावली (भाग पहिला) पृष्ठ -23, सबद 5 में –

“कवन ठगवा नगरिया लूटल हो, टेक
चन्दन काठ कै बनल खटोला, तापर दुल्हिन सुतल हो
उठो री सखी मोरी मांग संवारी, दूल्हा मोसे रुसल हो
आये यमराज पलंग चढी बैठे, नैनन आंसू टूटल हो
चारी जने मिली खाट उठाइन, चहुँ दिसि धू धू उठल हो

कबीर साहेब की शब्दावली, भाग दूसरा पृष्ठ संख्या 40, शब्द 28

तोर हीरा हेराइल बा कीचडे़ में. टेक.
कोई ढूंढे पूरब कोई ढूंढे पच्छिम, कोई ढूंढे पानी पथरे में..

कबीर साहेब की शब्दवाली, दूसरा भाग, पृष्ठ संख्या- 69

सुतल रहलूँ मैं नींद भरी हो, गुरु दिहले जगाई .टेक.
चरण कवल के अंजन हो, नैना लेलूं लगाई.

कबीर साहेब की शब्दावाली, चौथा भाग, पृष्ठ संख्या-19

अपने पिया की मैं होइबो सोहागनि – अहे सजनी.
भइया तजि सइयां संग लागब रे की.

भोजपुरी के कवि और काव्य के ‘महात्मा कबीरदास’ अध्याय में श्री दुर्गानाथ सिंह ‘नाथ’ पृष्ठ संख्या 33 से 47 तक कबीरदास के लगभग 25गो भोजपुरी पद के उल्लेखित कइले बाड़े:-
1.तोर हीरा हेराइल बा कीचड़े में….
2. कउन ठगवा नगरिया लुटल हो…..
3.का ले जइबो ससुर घर जइबो ….
4. अइली गवनवा के सारी हो, अइली गवनवा के सारी
साज समाज ले सइयां मोरे ले अइले कहारवां चारी
मन विचार दरदियो ना बुझे जोरत गठिया हमारी
सखी सब गावेली गारी..

एह गीतन में भोजपुरी शब्द, क्रिया पद आदि के ढ़ेर प्रयोग बा खाली एतना कहल उचित ना होई वास्तव में इ कुल्ही गीत भोजपुरी के ह जेकर विशेष विवेचना के आवश्यकता नइखे बुझात.

कबीर के भोजपुरी भासा के आदि कवि के रूप में मानत भोजपुरी भाषा के प्रसिद्व आलोचक नागेन्द्र प्रसाद सिंह आपन ‘भोजपुरी साहित्य के संक्षिप्त इतिहास’ में लिखत बाड़े कि ‘‘कबीरदास के रचना का प्रसंग में बीजक के नाव आवत बा. जवना में 809 साखी, 400 पद आ 07 रमैनी बा बाकिर कबीर साहित्य के शोधकर्त्ता आ विद्वान डॉ. पारसनाथ तिवारी 200 पद, 744 साखी, आ 21 गो रमैनी मानेनी.’’

आगे श्री सिंह लिखत बाड़े कि ‘‘कबीरदास के रचना के भाषा मूल रूप से ठेठ भोजपुरी रहे. घुमंतू साधू भइला से विभिन्न क्षेत्रन के शिष्य परंपरा से स्थानीय संसोधन का कारन उहाँ का रचनन में अन्य भाषा राजस्थानी, पंजाबी, मगही, अवधी, आदि के शब्द और क्रिया पद मिलेला जवन स्वाभाविक बा.’’ 5

एही तरे कबीर के भासा के विश्लेषण करत नर्मदेश्वर चतुर्वेदी भोजपुरी साहित्य के इतिहास में काल विभाजन के क्रम में संत काल के शुरुआत कबीर से मानत बानी. भोजपुरी के संत साहित्य (लेखक: नर्मदेश्वर चतुर्वेदी) में नर्मदेश्वर लिखत बाड़े कि ‘भोजपुरी के संत साहित्य के शुरुआते भोजपुरिया महात्मा कबीर से भइल बा. आपन कथनी आ करनी के सच्चाई से ई आपन बात निर्भीकता से कहत रहले जवना के असर दोसरो में आत्माविश्वास जगावत रहल बा.’

डॉ. राम कुमार वर्मा ‘हिंदी साहित्य के आलोचनात्मक इतिहास’ ग्रन्थ में कबीर के भासा भोजपुरी बतवले बाड़े. उहें डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी आपन पुस्तक कबीर में कबीरदास के उहे कुल्ह पद के संग्रह कइले बाडे़ जवना के भासा में भोजपुरी के अधिकता बा.

प्रोफेसर मैनेजर पाण्डेय मानत बानीं कि ‘‘कबीर की भाषा मूलतः भोजपुरी है. कबीर के शिष्यों की कृपा से उसमें अन्य क्षेत्रीय भाषाएं आ गयी हैं.’’ 6

कबीर आ चंपारण

’’चंपारण’’ प्रकृति के लीला भूमि, पर्वतराज हिमालय के आंगन भूमि, चम्पक वन के सुवास भूमि, बालक ध्रुव के तपोभूमि, आदिकवि महर्षि बाल्मीकि के काव्यभूमि, भगवान बुद्ध के यात्रा भूमि, पांडव लोगन के वनवास भूमि, चाणक्य चन्द्रगुप्त के मर्मभूमि, प्रियदर्शी अशोक के धर्मभूमि, अरेराज सोमेश्वर महादेव के अनुकम्पा भूमि, सरभंग संतन के सिद्ध भूमि, महात्मा कबीर के उपदेश भूमि, राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के कर्मभूमि अउर अन्नपूर्णा के अन्नभूमि आ सदानीरा गण्डकी के निवास भूमि ह.

साँचो इहां के माटी आ पानी में उ गरिमा बा जवन शुन्य के समग्रता प्रदान करेला. चंपारण के धरती जेतना खेती ला उपजाऊ बा ओकरो से कहीं जादे साहित्य सृजन खातिर उपजाऊ बा.

डॉ शोभाकांत झा आपन शोध पुस्तक हिंदी साहित्य को चंपारण की देन में लिखले बानी कि ‘सम्पूर्ण चंपारण के भू भाग पर मूलतः भोजपुरी, मैथिली एवं बज्जिका लोकभाषा के रूप में बोली जाती है किन्तु जहाँ तक साहित्यिक योगदान का प्रश्न है भोजपुरी लोकभाषा में कई रचनाएँ यहाँ के साहित्यिक पुरोधाओं ने रची है जिसका विशेष महत्व है.’ 7

चंपारण के धरती पर महात्मा कबीर अउड़ उनुका शिष्य भक्त भगवान गोस्वामी द्वारा स्थापित छोट बडे सैकडो मठ आजुओ मौजूद बा जवन सिद्ध, तांत्रिक, आ नाथ पंथियन से पूरा तरह से प्रभावित बा. कुछ सिद्धन के सम्बन्ध निश्चित रूप से चंपारण से रहल बा. चंपारण से जवना सिद्ध लोगन के संबंध तय मानल जाला ओहमें ‘चम्पकपा’ बाड़े जिनकर समय एगारहवीं शताब्दी मान जाला. डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी चम्पकपा के चंपारणे के मनले बाड़ें आ प्रो॰ कामेश्वर शर्मो इनका के चंपारणे के सकरले बाड़े. दोसर सिद्ध कवि ‘कोकालिया’ त निश्चिते चंपारण के रहलें. उनकर संबंध कवनो राज खानदान से रहल जेहसे उनका के चंपारण के राजकुमार के रूप में याद कइल जाला. 8

भोजपुरी के आदि कवि महात्मा कबीर के सहचरी चम्पारण के धरती के मिलल बा एकर पकिया प्रमाण चटिया-बडहरवा-तधवा मठ के महंत रामरूप गोस्वामी क लगे सुरक्षित बा. एह तरह संत साहित्य में कबीर पंथियन के मजगर परंपरा चंपारण में आजुओ बा. ओह मठन से मिलल सुबूतन से कहल जा सकेला कि कबीर के बीजक के रचना चम्पारणे में भइल रहे. एकर पांडुलिपि आजुओ महंत रामरूप गोस्वामी का लगे राखल बा. एहसे चंपारण के पावन धरती युग पुरुष कबीर के सहचरी आ साधनास्थली जरूरे रहल होखी. 9

भोजपुरी साहित्यकार आ भोजपुरी जिनिगी के मुख्य संपादक डॉ. गोरख प्रसाद मस्ताना के अनुसार ‘कबीर आ भगवान गोस्वामी के चरण से पवित्र चंपारण के माटी आ भोजपुरी के बड़ा गहिर सम्बन्ध बा आ एह सम्बन्ध के बनावें में भगवान गोस्वामी के योगदान बहुते लमहर बा. भगवान गोस्वामी द्वारा कबीर बाबा के विचारधारा पर आधारित भगताही पंथ के स्थापना करके एगो लमहर काम भइल. जदि कबीर के साहित्य लिपिबद्ध ना होईत त साहित्य जगत कबीर के खाली किस्से कहानी में झांकित. उनका साहित्य से परिचित ना हो पाईत. एह हालत में निर्विवाद साँच बा कि आजु दुनिया जवन कबीर साहित्य पढ़त बा, भोजपुरी के सराहत बा ओकर श्रेय कबीर के चेला भगवन गोस्वामी के जाता. 10

डॉ शुकदेव सिंह, संत कबीर और भगताही पंथ पुस्तक में भगताही पंथः वृत्त अध्याय में लिखत बानी कि ‘‘ भगवान गोस्वामी संत कबीर के साथ काशी और गंगा का तट पकड़े हुए नारायणी नदी के संगम स्थल से होते हुए नारायणी के किनारे किनारे एक ऐसे वीरान स्थल पर पहुंचे जिसे चटिया कहा जाता है. चटिया के नारायणी तटवर्ती एकान्त में उन्होंने कबीर के द्वारा निर्देशित अनहद नाद की साधना का तार पकड़ कर सहजकार की भूमिका में अमृतपान किया. दरअसल कबीर के वचनों की श्रुति इसी चटिया में उनके अपने आत्मबोध के रूप में प्रत्यक्ष हुई …….भगवान गोस्वामी के लिए संत कबीर का मिलवाना और बीजक का संग्रह जितने महत्वपूर्ण हैं उतने ही महत्वपूर्ण चटिया में उनके आत्मसाक्षात्कार के क्षण भी.’’ 11

शुक देव सिंह आगे लिखत बानी कि ‘भगवान गोस्वामी संत कबीर के साथ साथ घुमने लगे. शिक्षित थे, विद्वान थे, भगवान गोस्वामी कबीर के अनुगामियों में शायद पहले महत्वपूर्ण व्यक्ति थें जिन्होंने कबीर के वचनों को लिपिबद्ध करने का यथा संभव प्रयास किया. रमैनी, सबदी, सखी और सबदी के विभिन्न रूपों – चांचरी, बेली, विरहुली,चौतिसा इत्यादि को उन्होंने इस ग्रन्थ गुटिका का नाम बीजक रखा. बीज अर्थात मूलमन्त्र बीजक अर्थात् कबीर के अनेक प्रकार के कथनों का तारतम्यबद्ध निश्चित प्रकार के केंद्रीय विचारों से अभिप्रेरित उक्तियों का संग्रह. भगवान गोसाई का बीजक धीर धीरे कबीर का प्रतीक बन गया.’ 12

भगवान गोस्वामी के भगताही पंथ के प्रवर्तक मानल जाला जे चंपारण के चटिया में कबीर वाणी के लेखन के परंपरा बीजक ग्रन्थकर्ता के रूप में शुरू कइलें. भगताही पंथ के दोसर संत-महंत लोगन में घनश्याम गोस्वामी (बेतिया), उद्होरण गोस्वामी (दरभंगा से आकर चटिया गादी संभलले), दवन गोस्वामी, गुणाकर गोस्वामी, गणेश, कोकिल, बनवारी नयन, भीषण भूपाल, क्षत्र, राम प्रसाद, तुला, गोपाल राम लगन, राम खेलावन यदुवंशी बानी सभे आ अब राम रूप गोस्वामी एह संत परम्परा के आगे बढ़ा रहल बाड़ें.
भगताही पंथ के संतन लोगन के वाणी में भोजपुरी भासा के स्पष्ट देखल जा सकेला. जइसे कि :
1. मन्हंत घनश्याम गोस्वामी (बेतिया) ध्यानमुद्रा में जाके आपन कुटिया में पंचम सुर के गाना शुरू करसु –
करब हम कवन बहाना, गवान हमरो नगिचाना.
सब सखियाँ में मैली चुनरिया हरमो पियर घर जाना..

2. एक डर लागे मोरे सासू ननद के
दुसरे पिया मारे ताना
बटिया चलत मोहि सद्गुरु मिलि गए, राम नाम को बखाना..

भगताही पंथ के दोसरो संत लोगन के उपदेश में भोजपुरी आइल बा बाकिर गुणाकर गोस्वामी के उपदेश में भोजपुरी खूब निखर के आइल बा –
फुलवा भार न सही सके, कहे सखिन से रोय
ज्यों ज्यों भीजें कमरी, त्यों त्यों भारी होय.

महंत रामरूप गोस्वामी खुद भोजपुरी के एगो उद्भट विद्वान बाड़े. उनकर काव्य संग्रह चौरासी में भोजपुरी के चौरासी भक्ति धारा व प्रवचन के काव्यरूप बा. श्री रामरूप गोस्वामी के प्रभाव से खगनी गांव, मोतिहारी, पुर्वी चंपारण के प्रसिद्ध कवि श्री धनुषधारी कुशवाहा के अजगुत कबीर नामक खंड काव्य भोजपुरी भाषा में रचले महंत रामरूप गोस्वामी के कविता के एक बानगी देखीं –

निंदक निमन एह दुनिया में, जानेला सब कोई
आदमी छूई आकाश के, जबले निंदा होई. 13

कबीर मठ के बारे में हिंदुस्तान टाइम्स लिखत बा कि:
” Champaran is known for the experiment with truth and non-violence of Mahatma Gandhi year back in 1914 but it is also the first preaching place of Saint Kabir-Chatia &Badaharwa the first preaching place of great saint is 10 km away from Areraj, a subivision under East champaran district which his first Math of the Firke Bhaktahi Branch of Kabir Panth was established year back in 1577-” 14

निष्कर्ष:

अब सवाल इ बा कि कबीर के मूल भाषा का ह ?

एह कुल्ह तथ्यन के धेयान में रखल जाय त साफ हो जाता कि कबीर चंपारण के कतना नजदीक रहले जहवाँ आजूओ 40-50 लाख लोगन के मातृभाषा भोजपुरी ह.

कबीर के समय में राजस्थान में डिंगल साहित्य के भासा रहे उहें ब्रजभाषा के पिंगल कहल जात रहे लेकिन एकर प्रचार प्रसार एतना ना रहे जेतना अष्टछाप कवियन के समय में भइल. दिल्ली में हिन्दवी रहे. डक्कन क्षेत्र में हैदराबाद, दौलताबाद आ गुलबर्गा दक्कनी हिंदी कहल गइल. एकरा अलावे अवधी आ भोजपुरी के क्षेत्र रहे. भोजपुरी बिहार, उत्तर प्रदेश मध्य प्रदेश के कुछ जिलन में आ झारखण्ड के कइ गो क्षेत्र में नागपुरिया के नाम से बोलल जाला आ आजो चलन में बा.

विद्यापति मिथिला के, सिद्ध लोग मगध क्षेत्र अउर नाथ पंथ के गोरखनाथ के गोरखपुर भोजपुरी के क्षेत्र ह. अवधी आ भोजपुरी में समानतो ढे़र बा. एह सबसे हम मानत बानी कि कबीर के भासा मूलतः भोजपुरी ह.

संदर्भः-

1.हिंदी साहित्य का इतिहास- आचार्य दुर्गा शंकर मिश्र पृष्ठ संख्या- 77
2.हिंदी साहित्य का इतिहास, पं.राम चन्द्र शुक्ल, संशोधित प्रवद्धित संस्करण पृष्ठ-98
3.डॉ.उदय नारायण तिवारी, भोजपुरी भाषा और साहित्य, पृष्ठ संख्या-254
4.कबीर : एक विश्लेषण : डॉ. प्रकाश चंद गुप्त, पृष्ठ संख्या-22
5.नागेन्द्र प्रसाद सिंह ‘भोजपुरी साहित्य के संक्षिप्त इतिहास, पृष्ठ संख्या- 31-32, लोक प्रकाशन, पटना
6.भोजपुरी भाषा का इतिहास, प्रो.गदाधर सिंह, नालंदा खुला विश्वविधालय, एम.ए. भोजपुरी भाषा, पहिलका-पत्र, पृष्ठ संख्या- 214
7. हिंदी साहित्य को चंपारण की देन, चंपारण की साहित्यिक विधाओं, पृष्ठ संख्या-149, ललित प्रकाशन,1994
8.उपरिवत्, पृष्ठ संख्या- 58
9.डॉ शोभा कान्त झा, महर्षि कबीर और चम्पारण, प्रकाशक- आचार्य महंत रामरूप गोस्वामी, भगताही पन्थ, तधवा मठ, पं चंपारण, पृष्ठ संख्या 21-22, प्रथम संस्करण, 2003
10. भोजपुरी जिनिगी, तिमाही भोजपुरी पत्रिका में प्रकाशित डॉ गोरख प्रसाद मस्ताना का आलेख भोजपुरी के पुरातन आ पवित्रभूमि- चंपारण, पृष्ठ संख्या-28, जनवरी-मार्च, 2009, इन्द्रप्रस्थ भोजपुरी परिषद्, नई दिल्ली
11. संत कबीर और भगताही पंथ, भगताही वृत्त लेखकः शुकदेव सिंह, प्रकाशकः विश्वविद्यालय प्रकाशन चौक, बनारसी-01, पृष्ठ संख्या-06, 1998
12.उपरिवत पृष्ठ संख्या- 05
13. चौरासी, भोजपुरी काव्य संग्रह, कवि महंत रामरूप गोस्वामी, प्रकाशनः धनुषधारी कुशवाहा, वर्ष विक्रम सम्वंत 2056, पृष्ठ संख्या-24
14. Hindustan Times, Thursday, November 27, 1997


संतोष कुमार भीमराव अम्बेदकर बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर से भोजपुरी में पीएचडी करत बाड़न.

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