पाती के चौहत्तरवाँ अंक का बहाने कुछ मन क बात

– अशोक द्विवेदी

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पत्रिका के 74वाँ अंक रउवा सभ के सामने परोसत हम अपना स्रम के बड़भागी मान रहल बानी जे 1979 से जूझत-जागत, ठोंकत-ठेठावत हमनी का पैंतीसवाँ बरिस में चलि अइली जा। एह यात्रा में, सँग-सँग कुछ डेग चले वाला हर साहित्य-सेवी आ लेखक लोग के साधुवाद! सँगे-सँगे हर ओह भाषा प्रेमियन के आभार, जिनका बदउतल ‘पाती’ के ई मंच आज ले कायम बा। भोजपुरीं भाषा साहित्य का सेवा-समृद्धि का नाँव पर ‘पाती’ का मंच से जुड़े वाला नया लोगन के स्वागत करत आज ई निहोरा जरूर करब कि ऊ लोग थोरिकी अउर समय देके, पछिला 35-40 बरिस में लिखाइल भोजपुरी साहित्य के ईमानदारी से पढ़े-समझे के प्रयास जरूर करो.

एसे ओ लोगन के तीन गो फायदा होई. पहिला ई कि पढ़ला से ई पता चली कि अबले केतना आ का लिखाइल बा आ ऊ कतना मूल्यवान बा? दुसरा ई कि एके पढ़ला से लिखे वाला लोग के भोजपुरी भाषा-के बल-बेंवत मालूम होई. तिसरा ई कि पहिले से लिखल-लिखावल के दोहरउवा नकल ना होई. परंपरा के ज्ञान आ इतिहास बोध से पोढ़ भइला पर, नया लिखे वाला लोग सार्थक आ मूल्यवान लिखे क उतजोग करी.

भोजपुरी साहित्य अपना लोक स्वर से प्रगतिशील रहल. ओमे अउर सब भाषा में चलल वाद के अंधानुकरन ना भइल. भिखारी ठाकुर, राहुल जी आ गोरख पांडे़ का नौ गो भोजपुरी गीतन का अलावा, भोजपुरी में अउर केतना उत्कृष्ट आ महत्वपूर्ण लेखन भइल बा, ओहू के पढ़ला आ जनला-सुनला के दरकार बा. कतने नया कवि कथाकार आ लेखक बाड़ें, जिनका लेखन में नया भाव बोध आ लिखे के हुनर बा. अइसनका लोगन के ‘पाती’ मंच सुरुवे से आगा ले जाये आ उनके अउर निखरे के अवसर देत आइल बा. एहू लोगन के मूल्यांकन होखे के चाहीं.

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र आ आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी के जरिये हिन्दी के कतने यशस्वी प्रतिभा संपन्न सामरथ वाला लेखक ओह काल खण्ड में एही तरे हिन्दी साहित्य के श्री वृद्धि कइल लोग. ओह लोगन के साहित्य पढ़ला आ मूल्यांकन कइला का बादे पता चलल कि ओघरी कतना मूल्यवान साहित्य रचाइल रहे. भोजपुरियो साहित्य में अइसन निष्ठावान लेखकन के कमी नइखे. एह समर्पित लेखकन पर काम होखे के चाहीं. जोरुआ-बटोरुआ आलेख आ कामचलाऊ इतिहास लिखला के काम हो रहल बा, बाकिर मूल्यांकनपरक काम बाकी बा.

भोजपुरी साहित्य के आलोचनात्मक इतिहास आ ‘साहित्य कोश’ पर ठोस काम होखल बहुत जरूरी बा. ई सुन जान के खुसी जरूर होत बा कि भोजपुरी साहित्य पर कुछ संस्था आ विश्वविद्यालययन में शोध हो रहल बा, बाकिर भोजपुरी के कवनो ढंग के पुस्तकालय ना रहला से, आ आधार सामग्री ना मिलला से शोध करे वालन के कठिनाई बा. विश्वविद्यालय, कालेज आ विभागन में भोजपुरी पुस्तक आ पत्र पत्रिकन के अभाव बा. सरकारी अकादमियन के हाल ई बा कि ऊ या त अर्थाभाव में खेवा-खर्चा चलावत बाड़ी सऽ या गोट बजट मिल गइला पर साल में एगो-दू गो गोष्ठी, सेमिनार, कवि सम्मेलन वाला काम क के छुट्टी पा लेत बाड़ी सऽ.

मैथिली भोजपुरी अकादमी दिल्ली से ‘परिछन’ नाँव के एगो तिमाही पत्रिका निकलेले. भोजपुरी अकादमी पटना कइसहूँ आपन पत्रिका निकाले का स्थिति में फेरू आइल बा. भोपाल भोजपुरी अकादमी अपना सुरुआती दौर में बिया. उत्तर प्रदेश में माननीय मुख्यमंत्री जी का घोषणा का बाद अभी अकादमी गठन के इन्तजार होता. एकरा अलावे कतने स्वायत्त सेवी संस्था बाड़ी स जवन भोजपुरी के झंडा गड़ले भा उठवले बाड़ी स, बाकिर कार्यालय से जुड़ल उन्हन का भोजपुरी साहित्य के अइसन पुस्तकालय नइखे, जहवाँ कम से कम भोजपुरी के निकले वाली पत्रिकन के जिल्दबंद अंक शोध करे वालन के मिल सके. बहुत पहिले पाण्डेय कपिल भोजपुरी-साहित्य संस्थान का भीतर एगो मूल्यवान पुस्तकालय बनवले रहलन. एकरा अलावा भोजपुरी अकादमी पटना कुछ पुस्तकन के प्रकाशन आ रख-रखाव कइले रहे.

ई समय भोजपुरी के अउरी विचित्र मोड़ पर पटक देले बा. आपन ताल आपन झाल बजावत केहू इन्टरनेट पर झूलत बा, केहू कैसेट सीडी में आ केहू मारीशस का तीरथ यात्रा प जाता. कतने स्वयंभू भोजपुरी गौरव, असली गौरव का छाती प असवार होके उतराइल फिरत बा लोग. अइसनका समय में भोजपुरी के निष्ठावान साहित्य-साधकन के पूछे वाला कवनो निष्ठावान साहित्य-साधके न आगा आई. काश अइसनका लोगन का रचनात्मक सहजोग से अइसन मंच बनित, जवन कम से कम स्वाभिमान आ भोजपुरी निजता का रच्छा का साथ, भोजपुरी का साहित्य विरासत के सहेजित सँवारित. पहिले का लोगन के पढ़ले-सुनले आ समझले से अपना सिरजन परंपरा का दिसाई कृतज्ञ भइला के अवसर मिलित.

कालेज, विश्वविद्यालय आ अकादमिक स्तर पर उल्लेख जोग काम करे वाला कई विद्वान, प्रोफेसर, निदेषक आ शोधकर्त्ता लोगन का व्यक्तिगत प्रयास से दिन पर दिन ऊपर चढ़त भोजपुरी भाषा-साहित्य के समय-समय पर सहायता आ प्रोत्साहन मिलत रहल बा. अइसहीं अगर एह लोगन के साथ-संरक्षन आगहूँ बनल रही त भोजपुरी लिखे-पढ़े वालन क बहुत भला होई. हमके पूरा भरोसा आ विश्वास बा कि भोजपुरी समाज में अइसन बहुत प्रतिभा संपन्न आ साधन-शक्ति से भरल पूरल लोग बा, जेकरा अपना मातृभाषा से लगाव आ निष्ठा बा. ऊ लोग आगा आई आ भोजपुरी साहित्य के सहेजला-सँवरला में आपन सक्रिय सहजोग दीही.

2014 के साल तमाम आपदा आ बिपत्ति का बावजूद नया बदलाव आ नया जागरण के साल रहल. कुछ गँवाइ के कुछ सीखे के मिलल. आगा सँभरे-सँवरे आ नया राह बनावे क अवसर देबे वाला समय ना भुलाला. अँगरेजी क नवका साल 2015, हमनी का देश-दुनियाँ खातिर शुभ समरस होखे! हम सबका योग-क्षेम के मंगल कामना करत बानी.


ई लेख भोजपुरी दिशा बोध के पत्रिका ‘पाती’ के 74 वाँ अंक के संपादकीय ह. पूरा पत्रिका पढ़े खातिर एकर पीडीएफ फाइल पाती के वेबसाइट पर मौजूद बा.

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