भोजपुरी दिशा-बोध के पत्रिका पाती के नयका अंक आ गइल। पेश बा ओकरा संपादक डॉ0 अशोक द्विवेदी जी के “हमार पन्ना” –

एघरी कविता जवना लूर-ढंग , शैली आ कलात्मक अन्दाज से, मौलिक शब्द-सँवार वाली भाषाई-बिनावट में लउक रहलि बिया ओके देखि-पढ़ि आ सुनि के मन अगरा जाता! भाव-संबेदन आ कथ के नया अर्थवान उरेह का कारन, कविता प्रेमी पढ़वइया-सुनवइया लोग के रुझान आ सवादो बढ़त बा ! बाकिर एगो सवाल इहो बा कि कविता से अउँजाइल-पाकल लोगन के ध्यान अइसनका सुघर-सवदगर कबिताई का ओर कब फिरी ? कब ओ लोगन के नजर एकरा ओर जाई?

बोली-भाषा का क्षेत्रीय विशेषता से कवनो इनकार नइखे।हर माटी के आपन खूबी-खुसबू होले, फेर खित्तावार खूबी वाली भोजपुरी के त पुछही के नइखे! गुरहर्सन (ग्रियर्सन) से लगाइत आजु ले केतना लोग ए भाषा के खूबी लिखल । इहाँ बात ए भाषा का कविता के हो रहल बा। अब कबिता बा, त चीझ -बतुस लेखा ओके नापे जोखे, तउले के बाट बटखरा, तरजूई आ नपना होखही के चाहीं। एइजा नाप जोख के खास लोगवो बा। बाकि एमे तनी पेंच आ झंझट बा। बा त, बा। केहू मात्रा देखत बा, केहू गुन-गुनधर्म (क्वालिटी)। केहू मात्रा-स्टाक (क्वान्टिटी) देखेता, केहू रूप सुघराई आ सवाद से अन्दाज लगावत बा । हमनी का ओर पहिले जवन नपना आ बटखरा रहे, छटाक, पउआ, सेर-पंसेरी वाला, आजकल ग्राम, लीटर, किलो किन्टल में बदल गइल बाकिर जोखे वालन में एगो ‘केंड़ी मार’ रहे, ऊ नइखे बदलल, आ बदले के उमेदो नइखे, ऊ जोखी तऽ केँड़ी मरबे करी। बात कुबात, कुतरक आ पेंच के कमी नइखे ओकरा पास।

पहिले ‘सुबरन’ के चाहे, जोहे वाला कबि, ब्यभिचारी आ चोर के जिकिर होत रहे। अब कबि, व्यभिचारी आ चोर के नया नजरिया, नया नपना, नया तरक से देखल जाता। जइसे ऊ हिन्दू हवे कि मुसलमान? हिन्दुए हऽ त कवन जात के हऽ, बाम्हन हवे कि पिछड़ा? आकि दलित? सेकुलर हवे कि ना ! हमनी का प्रदेश के हऽ कि दोसरा प्रदेश के ! प्रोगरेसिभ हवे कि पोंगापंथी! गोयाकि एघरी पेंच आ पेंचकस बढ़ल बा साहित्त जोखे में।

‘सु बरन’ के कविता आ ओकर कवि लोग के एघरी एह दिसाई चुनौतियो बढ़ल बा ! अब ओह लोग के ईहो सोचे के परी कि ऊ अपना आ परिवेश-प्रकृति वाला जीवन-संसार के केन्द्र में राख के लिखो-गावो कि एह केंड़ीमारन के सोच आ नजरिया वाला, दोसरा ‘लोक’ के बाट बटखरा, नपना आ तरजूई आ नजरिया के खारिज कइ के, केनियो कचरा में फेंक देव!

– डॉ0 अशोक द्विवेदी

(पाती के दिसम्बर 2022 अंक से साभार)

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By Editor

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