(पाती के नयका अंक, दिसंबर २०१२, के संपादकीय)


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(भोजपुरी दिशा बोध के पत्रिका “पाती” के भोजपुरी प्रकाशनन में एगो खास जगहा बा. अँजोरिया के एह बात के खुशी बा कि पाती संगे एकर अपनापन पिछला कई बरीसन से चलल आवत बा. पाती के प्रकाशित अंक अँजोरिया का मार्फत दुनिया भर में पसरल भोजपुरी प्रेमियन खातिर परोस दिआला. अँजोरिया दोसरो भोजपुरी प्रकाशनन के अइसने सेवा देबे ला हमेशा तईयार रहेले. साथही भोजपुरी में प्रकाशित होखे वाला किताबनो के अँजोरिया का मार्फत पूरा दुनिया में उपलब्ध करावल जा सकेला.

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जुग बदलल. सोच-विचार क पैंतरा बदलल. केहू सोचले ना रहल होई कि ’टू जी’ आ ‘थ्री जी’ अतना भूचाल ले आई. दरियें बइठि के, बिना भूइं पर गोड़ धइले मय काम हो जाई. वोट खातिर नोट बरिसी आ, बे नोकरी कइले, बइठले बेरोजगारी भत्ता पाई. वोट दिहले मोबाईल आ ‘टेबलेट’ मिल जाई. कबो केहू का मुहें सुनले रहलीं कि टेबलेटवा में दुनिया बन बा. अब कहां बइठले-बइठल दुनियां-संसार क मजा आ कहां ए बिना बिजुली पानी वाला पिछड़ा इलाका में खेती बारी?

सांचो ए भाई एह ‘टेबलेटवा’ में कमाल बा. धरती आ ओकरा प मौजूद चीजन के पता ठेकान त एमे बटले बा. अकासो क जनकारी बा. सरकार एकर नॉंव ‘आकाशे’ ध लेले बा. वोट खातिर धरती छोड़ि ‘‘अकास’’ बॅंटाये क जोजना बा. पेट्रोल, डीजल, किरासन आ महॅंगाई में मचल गैस सिलेन्डर गेम बहुत भइल अब जनता के कुछ नया सौगात ना मिली त जनता का कही? एही से ‘आकास’ बँटाई, ‘कैश सब्सिडी’ मिली माने वोट खातिर नोटो मिली. माने राजनीतियो अब एह हालत में पहुँच गइल बिया कि नाजायजो के जायज बना दिहल जाई.

सरकार चाहऽतिया कि लोग खीस आ चिन्ता छोड़के एकदमे पटा जाव. चुका-मुका बइठि जाव कम्पूटर अस भा ‘टेबलेट लैपटाप’’ बनके काँखि का झोरा में लटक जाव. देहिं हिलवला आ काम कइला के जरूरते नइखे. जाही विधि राखे राम ताही विधि रहिये. रामोजी त कंप्यूटर में बन बाड़न. गूगल से खोजा जहें आ ई मेल भा जीमेल से भेजा जइहें. बाप रे बाप! एम्मे सज्जी देवता पित्तर आ देबी दुरूगा झलकिहें. कम्पूटर अदिमी खातिर एक लेखा कल्पवृक्षे बा. लइकन के जनमते टीपन बना लीं, भविस्य देखाइ लीं. लइकनो के ढेर मजा ‘कम्पूटर-गेम’ में आई आ पढ़ल चाहे त ओही प पढ़ि ली. ताजा समाचार से लेले हर विषय के जानकारी बा. इंटरनेट से जोरला क देरी बा ओकरा बाद दुनिया जहान मुठ्ठी में. लइकी के बियाह खातिर लइका आ लइका के बियाह खातिर लइकी कम्पूटरे में पसन हो जाई. बियाह-शादी, दोस्त दोस्तिन खोजाइ जाई. एमे ‘फेस बुक’, ‘ई बुक’ न जाने कवन कवन बुक आ खिड़िकी (विन्डो) बा. मन करे त, घरे बइठल बजार हाट, खरीद-बेची हो जाई. खुसी भा दुख के सनेसो भेजा जाई.

साँच पूछऽ भइया त ई लैपटाप कम्पूटर देस के किसानो मजूरन के मिल जाये के चाहीं. संगे संगे नेट कनेकसनवो फ्री रहे. तबे न ऊ जनिहें सऽ कि सरकार उनहन खातिर आ उनहन का लड़िकन खातिर बहुत कुछ कर रहल बिया. बेचारा ऊहो तनी आराम-विराम क लँ सऽ . ढेर दिन से काम करत करत खिया गइल बाड़न सऽ. डिस्कवरी चैनल में दुनियां क अजगुत-अचरज खाली शहरी लइके लोग काहें देखी? काहें ऊहे लोग कम्पूटर गेम खेली? ओइसहूँ ई देखि-देखि के ससुरन क आँख क रोसनी घट जाता, रीढ़ टेढ़ हो जाता, कुबराह बना देता. कतने जाना के गर्दन आ कपार में दरद बढ़ गइल बा. ओह लोगन के फील्ड में उतारे के चाहीं. कुछ दिन खेती-बारी, पसुपालन सीखो. ओह लोगन का जगहा गाँव का लड़िकन के, शहर भेजाये आ पढ़ावें लिखावे के इन्तजाम होखे के चाहीं, जेसे पूरा देस में समानता आ समाजवाद के लहर पैदा होखे. हो सकेला कि ए लहर से कमजोर आ गरीब जनता जनार्दन के स्वास्थ, शिक्षा, न्याय आ सुरक्षा बिना भेदभाव के, संपन्न लोगन लेखा, समान रूप से मिले लागे. हो सकेला कि एह लहर से ऊँच-नीच आ छोट बड़ के असमानता आ भेदभाव मिटि जाव आ रोज रोज सुरसा का मुँह लेखा बढ़त आरक्षण के बेमारियो खतम हो जाव. हमन क देस के बड़ बड़ नेता जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा जी एह राहे चले के बड़ा कोसिस कइल लोग. ओह लोगन क पछलगुवा समाजवाद से पता ना काहे मुँह मोड़ लिहल?

एह घरी त हमनी क सरकार अतना आधुनिक आ नया प्रगतिशील सोच वाली बिया कि देस त देस, बिदेसियो कंपनियन के इहवाँ आपन रोजिगार बैपार फइलावे क सुबिधा देले जातिया. उदारवादी बाजार में सबके ढुकवले जातिया/कुछ राष्ट्रवादी, समाजवादी आ देसी उद्योग व्यापार में लागल सर्वहारा क राजनीति करे वाला लोग चिहुके-चिचियाये लागल आ सब जगह ‘बंद’ आयोजित कइलस/संसद में बहस का बाद, बहुमत के जोगाड़ कइके सरकारो ए लोगन के लहंेठ दिहलस. एही तरे एक बेर ‘परमाणु’ करारो पर हंगामा मचा के ए लोगन के कुछ ना भेंटाइल रहे. कम्पनियो अमरीका के हऽ त हथकंडो अमरीके लेखा. लोग कहत बा कि ‘वालमार्ट’ कंपनी एइजा बिल का ‘फेवर’ में गोलबंदी (लाबींग) कइलस आ एहमें करोड़न रूपया पहिलहीं फँूकि दिहलस. अब ई कूलि कहल-सुनल बेकार बा भाई. पहिलहूँ तऽ संपन्न आ शक्तिशाली समूह आ लाबी सरकारी कामकाज में आपन दखल आ प्रभाव राखते रहली स. तनी अउर बढ़ गइल त का भइल? आखिर जनतो के त फायदा होई. पहिले ‘लोकतंत्र’ पर ‘दल तंत्र’ हावी भइल अब ओकरा सँगे कंपनी आ कारपोरेटो तंत्र चढ़ि जाई त का बिगरे के बा? जइसे एक मन क बोझा तइसे डेढ़ मन.

ई जमाना ‘‘प्रान जाय पर बचन न जाये’’ वाला थोरे हऽ कि बचन देके केहू, बन्हा जाई आ भीखम पितामह आ राजा दसरथ लेखा दुख उठाई. इहाँ सॉंझ-बिहाने में लोग मुकर जाता. राजनीति करे वाला दल काहे ना कथनी-करनी में फरक करी? देखावे खातिर जनता का पक्ष में सरकार के विरोध करी, फेर बाद में सरकार का तरफ खड़ा हो जाई. जनता एतना देखे-सुने आ इयाद राखे जातिया? ‘जइसन राजा ओइसने परजा’’ अब एघरी ‘‘सूट’’ नइखे करत. अब ‘‘जइसन प्रजा ओइसने राजा’’ ढेर ‘‘सुटेबुल’’ लागऽता. काहेंकि सब देखियो जानि के परजे (जनता) न एह नेतन आ दलन के सरकार बनावे खातिर चुनत भेजत बिया. लोगन के देस ले ढेर अपना जाति-वर्ग आ फायदा के चिन्ता बा; ऋण राहत, अनुदान, आरक्षण, आर्थिक मदद, मोबाइल आ टेबलेट से मतलब बा. वोट खातिर नोट मिले, एहले बढ़ के का बा ? आर्थिक सुधार, विकास, सुशासन आ हल्ला बोल रैली से हवा बान्हे वाला पार्टी आ नेता जनता का नस आ मन-मिजाज के पकड़ लेले बाड़न सऽ. त जवन भइल तवन भइल अब अगिला साले जवन होई तवन होइबे करी. चिन्ता फिकिर कइला के ना, फेंकला के चीझु हऽ ! जतने फेंकाई, ओकरा दोबरी आई ! आई त आवो !!

– डा॰ अशोक द्विवेदी

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