जर जोरु जमीन जबरदस्त के (बतकुच्चन – 176)

admin बतकुच्चन 182

बात विजयादशमी के दिन के ह. ओह दिन कई जगहा मूर्ति भसान ले के झगड़ा फसाद हो गइल आ हम सोचे लगनी कि केकरा के अबर भा दुबर कहाव आ केकरा के जबर. बर अकेले होखे त बरगद के गाछ हो सकेला भा दुलहा. बाकिर अबर दुबर जबर के बर बल के बिगड़ल रूप ह. अबल बिगड़ के अबर हो गइल आ दुर्बल दुबर हो गइल. हालांकि दुबर के मतलब कई बेर पातरो जस होखेला. दुबला आ दुर्बल दुनू अलग अलग मतलब बतावेला. कवनो जरूरी ना होखे कि जे दुबला बा से दुर्बलो होखो. आ एहिजा हमरा घाघ के एगो कहाउत याद आ गइल. पातर दुलहा आ मोट मेहरारू के जोड़ी देख के घाघ का मुँह से निकल गइल कि ‘पातर दुलहा मोटी जोय. कहे घाघ रस कहाँ से होय?’ सुनते ऊ मेहरारू जबाब दिहलसि कि ‘घाघ दढ़िजरा अस कस कहे, पातर ऊँख बड़ा रस रहे.’ अब घाघ के कहाउत खेती से जुड़ल रहत रहुवे आ इहो खेतिए से जुड़ल बा तनिका घुमा के. हो सकेला कि बाद वाला बात बतावे खातिर घाघ पहिलका बात अइसहीं बना दिहले होखसु.

बाकिर बतकुचना के संतोष कहाँ. ऊ त दुबर का फेर में दुबराइल जात बा. आजु देश में जे दुबर बा से जरूरी नइखे कि ऊ अबरो बा. कई जगहा त ऊ सोझे सोझी जबर हो गइल बा आ ओकर हर बात मानल मजबूरी बन गइल बा. अब एह बात के घाघ के कहाउत से जोड़ दीं त ई सब एह चलते कि पातर ऊँख बहुते रसगर होला. ओकरा से जतना रस देश चलावे वालन के मिलेला ओतना पनछुछुर सवाद देबे वाला मोटका ऊँख में ना मिल पावे. आ उपर से जस अलग से मिल जाला कि दुबरका के संरक्षण दिहल लोकतंत्र ला जरूरी होला. खैर जवन बोअब उहे नू काटब! जइसन चहलऽ हो कुटुम्ब, तइसन पवलऽ हो कुटुम्ब!

जबर आ अबर से जुड़ल कुछ अउरीओ कहाउत बाड़ी सँ जवना में से कुछ के एहिजा दुहरावल बेजाँय ना कहाई. जर जोरू जमीन जबरदस्त के. जबरा मारबो करे आ रोअहूँ ना देव. अबर के जोरू भर गाँव देवर. बाकिर सबर कहाँ गइल. सबुर त सुनले बानी आ कुछ लोग गलती से सबुर के सबर कह देव त उ अलग बात बा. अबल से अबर भइल त सबल के सबर काहे ना बनल. सोचे वाली बात बा. ठीक ओही तरह कि हर जगहा सु माने बढ़िया होला आ कु माने खराब बाकिर तब कुँवर जी काहे कहाइल, सुँवर जी काहे ना. बुड़बक चिन्हाए ला? सबल खातिर बरियार कहि के काम चला लिहल गइल. अब ऊ सबल अपना बल से सबल होखो भा बर का इयारी से. बरियार के मतलब इहो भइल कि ना कि बरियार ऊ जेकर बर बा इयार! आ एह बरियार के महातम अतना बढ.गइल बा हमरा उलटा प्रदेश में कि ‘सईंया भए कोतवाल तब डर काहे’ वाला कहाउतो झूठ हो गइल बा. बरियार आवत बाड़े आ कोतवाले के धून के चल जात बाड़े! आ ई धून धुनिया वाला धून ह, संगीत के धुन ना. धूनी रमावे वाला धून के बात अलग बा. उहो त धुनबे करेला अपना प्रिय के आ ओही में रमल रहेला.

हम त चलत बानी दियरीबाती आ छठ के शुभकामना देत. अब रउरो धून के देखीं कि का का धुना गइल बा आजु!

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