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माई बाबूजी कब मम्मी डैडी हो गइल लोग केहू के पता ना लागल. बाकिर आजु टीचर के गुरू कहला पर बखेड़ा खड़ा करे के कोशिश हो रहल बा. एहसे कि ई उलटा चाल बा. कहल जाला कि आदमी के भाषा में ओकर संस्कृति लउकेला, संस्कार झलकेला. एहसे जब कवनो विजेता समाज हारल समाज के संस्कृति खतम करे के सोचेला त सबसे पहिले ओकरा भाषा के तूड़े के कोशिश कइल जाला. भारतो में भइल. आ दुख एह बात के बा कि ई कोशिश बहुत हद तक सफलो हो गइल काहे कि हमनी के सरकार कबो एह ला चिंतित ना रहल. ओकरा बस आपन सरकार बनत रहे, चलत रहे अतने के चिंता रहे. पुरनका जमाना मे कहल जात रहे कि अगर राजा के नियत में खोट आ जाव त देश में अकाल पड़ जाला. प्रजा के कष्ट झेले के पड़ेला. ई बाति आजुओ साँच बा. एहिजा के राजनेता हमेशा ई कोशिश करत रह गइले कि देश के समाज एकरस मत हो पावे. हमेशा एकरा के बाँट के राखे के कोशिश होत रह गइल. केहू के खराब मत लागो एह चिंता में वन्दे मातरम के राष्ट्रगीत ना बने दिहल गइल आ ओह गीत के राष्ट्रगीत के दर्जा दे दिहल गइल जवना के रचनाकार खुद बतवलन कि ई गीत जार्ज पंचम के बखान करे खातिर लिखल गइल रहे. सरकार बनावे चलावे का फेर में समाज के बाँट के राखल गइल. एक के दोसरा पर भारी बतावे के कोशिश के हाल ई हो गइल कि आजु देश में कुछ जगहा कुछ लोग के जियल मुहाल हो गइल बा. बात चिंता के बा बाकिर कतहूँ चिंता झलकत नइखे. कोशिश हो रहल बा कि खबर मत बन पावे ई सब खबर. आ अगर केहू साँच कहे पर आमादा हो जात बा त ओकरा के गलत ठहरावे में लाग जात बा बाकी लोग.

बुझात रहो हमरा एहसे का? हम त बतकुच्चन करे आइल बानी बतकुच्चन कर के चल जाएब. माई बाबूजी के लोग मम्मी डैडी कहे लागल त ई भाषा के मजबूती का चलते ना भइल देखा देखी चले के भेड़चाल का चलते भइल. कहे के त कहल जाला कि भाषा मजबूत होले दोसरा भाषा के शब्द अपना लेबे से. हर भाषा में दोसरा भाषा से आइल शब्द शामिल होत रहेला. आजु दुनिया के सबले बड़ भाषा अंगरेजी के महारत हासिल बा दोसरा भाषा से आइल शब्द अपना लिहला में. हिन्दी के साहित्यकार लोग हालांकि एह बात के पसन्द ना करे आ हिन्दी में भरसक संस्कृत से आइल शब्द पर जोर दिहल जाला. बाकिर भोजपुरी में अइसन ना भइल. कारण ई रहल कि एहिजा व्याकरणाचार्य लोग के कमी रहल. भोजपुरिया समाज के लोग भर दुनिया में छितराइल बा. हर जगहा के शब्दन के अपनावे में माहिर होला ई लोग. भोजपुरी में अरबी फारसी से आइल शब्द ओतने मिली जतना अंगरेजी से आइल शब्द. एहिजा जोर सहजता पर रहल. जीभ लटपटाव ना बोले में एहसे सहज शब्द अधिका प्रचलित हो गइली सँ, संयुक्ताक्षर वाला शब्दन पर समाज के कैंची चल गइल. स्टेशन टीसन हो गइल आ मास्टर साहब माटसाहब हो गइले. गुरू गुण हो गइल आ गुरू के हमेशा गुरुजी कहिके संबोधित कइल गइल. अब गुरुजी के गुरू कहल जाव, टीचर कहल जाव, मास्टर कहल जाव भा माटसाहब का फरक पड़त बा. बस आदर होखे के चाहीं उनुका ला. माई बाप त जनम दिहलें बाकिर जीवन जिए के सलीका आ माध्यम त गुरूएजी सिखवले.

अब आखिर में तनिका चरचा टीचरो डे के कर लिहल जाव. हमनी किहाँ गुरू पुर्णिमा के प्रचलन रहल. आ चुकचन्दा के. गणेश चतुर्थी का दिने स्कूल से लड़िकन के झुण्ड निकलत रहुवे गावत बजावत आ भर गाँव घूम घूम के चदा बटोरल जात रहुवे गुरूजी ला. चतुर्थी से चउथ बनल दिन बटोरल जात ई चंदा चुकचंदा बन गइल. चउथचंदा बिगड़ के चुकचंदा बन गइल एह पर ढेर चिंतित होखे के जरूरत अब नइखे काहे कि अब एह तरह के चंदा नइखे बटोरात. अब सीधे फीस ले लिहल जात बा तरह तरह के नाम से. गुरूजी लोग कर्मचारी बन के रहि गइल बा शिक्षा के बाजार बना देबे वाला व्यवसायियन का दुकान पर. तबहियों गुरूजी लोग के बार बार प्रणाम.

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