साहब बुझले पियाज, सहबाइन बुझली अदरख (बतकुच्चन-201)

साहब बुझले पियाज, सहबाइन बुझली अदरख. ना ना, बतावे के कवनो जरूरत नइखे कि हम गलत कहाउत कहत बानी. असल कहाउत हमरो मालूम बा बाकिर सेकुरल कब कवना बात प बवाल मचा दीहें केहु ना बता सके. आ मतलब बात समुझवला से बा, कहाउत के माने भा ओकरा शब्दन से ना. एह कहाउत के जरूरत एहसे पड़ गइल कि हमरा अखड़ेरे मन कर दिहलसि कि आखर आ आखर के चरचा कर लीं. अब कवनो साहित्यकार से आखर के मतलब पूछब त ऊ कहीहें कि एकर मतलब भइल अक्षर आ ओकरे के भोजपुरी में आखर कहल जाला. बाकिर उनुके घरवाली से पूछब त कहीहें कि बिना घी मक्खन लगावल रोटी के आखर कहल जाला. गाँव वालन से पूछब त कहीहें कि बिना दरी बिछवना के खटिया भा चौकी आखर होला. अब आखर वाली रोटी आ आखर खटिया अखरे नू हो गइल.

अखरे आखरे से बनल. काहे कि आखर खाएब भा आखर पर सूतब त अखरबे करी. जइसे कि साहित्यिक के अखरत होखी हमार आखर के चरचा. बाकिर अगर आदमी के कुछ अखरे ना त ओकरा के चिक्कन करे के कोशिश कइसे होखी? नया बात, नया विचार सामने कइसे आई? आखर आ आखिरी के एक जगहा राख दिआव त अक्षर के माने समुझल आसान हो जाई. अक्षर जवन आखिरी होला, जवना के अउरी क्षर ना हो सके, अउरी तूड़ल ना जा सके. बाकिर आखिरी अक्षर ना होखे, ऊ त बस आखिरी होला, जवना के बाद जाइल, समुझल, देखल, बतावल ना जा सके. जबकि अक्षर ध्वनि से बनेला. ओह ध्वनि से जवना के बरनन कइल जा चुकल बा ओकरा के एगो बरन, वर्ण, दे के. बरन माने पहिरावा. वर्ण ध्वनि के पहिरावा होला. वर्ण देख के ओह ध्वनि के उचारल जा सकेला. वर्ण व्यंजन आ स्वर दू तरह के होला. स्वर के ऊँच खाल से व्यंजन के उचार बदल जाला आ हर उचार से माने. संस्कृत के 13 स्वर, भोजपुरी में 20 गो, बाकिर हिन्दी में बारहे गो रह गइल. एह बारह बीस का फेर में हिन्दी पढ़निहार अइसन अझूरा जालें कि ओह लोग के भोजपुरी लिखलका पढ़े में दिक्कत होखे लागेला. हिन्दी के आ हिन्दी में पढ़ाई करत करत हमनी का भोजपुरी पढ़ले भुला गइल बानी. लिखल बोलल समुझल सभे कर लेला बाकिर लिखलका पढ़े का बेरा अकबकाए लागेला, कुछ के कुछ पढ़ देला. एकर नतीजा ई होले कि वाक्य के सही मतलब समुझे में फरक पड़े लागेला. त जबले भोजपुरी के एह बाइसो स्वर के उचार ना आई तबले भोजपुरी पढ़े में दिक्कत होखहीं के बा.

अब भोजपुरी के योद्धा लोग एह समस्या से लड़ल छोड़ मान्यता के लड़ाई शुरु कर देलें बिना सोचले समुझले कि मान्यता के सवाल आई त उच्चारण के समस्या से दू-चार करहीं के पड़ी. अब भोजपुरी के योद्धा लोग हमरा के आखरे सुनावे लागे त ओकर चिन्ता नइखे. आखिर भोजपुरिया सुभाव ह बात कहब खर्रा, गोली लागे चाहे छर्रा. लोग के प्रतिक्रिया का डर से साँच बात कहे से हटल भाषा का साथे अन्याय हो जाई. एहसे कबो कवनो बतकुच्चन हम अखड़ेरे ना लिख दीं. हँ कवनो शब्द अखड़ेरे धियान में आ जाला आ हम ओकरा पर बतकुच्चन कर देनी. जरुरी त इहो नइखे बाकिर बतावत चलीं कि अचानके के अखड़ेरे कहल जाला. शायद एही चलते अखड़ेरे दिमाग में आइल बात कह देबे वाला भा ओह पर अड़ जाए वाला के अक्खड़ कहल जाला. जात जात भोजपुरी के 20 गो स्वरो गिनावत चलीं त बेजाँय ना होखी. तीन गो अ (अर्ध मात्रिक, एकमात्रिक आ द्वि मात्रिक), दू गो आ (दीर्घ आ ह्रस्व), दू गो इ (अर्धह्रस्व आ ह्रस्व), ई, दू गो उ (अर्धह्रस्व आ ह्रस्व), ऊ, चार गो ए (ह्रस्व, अल्पदीर्घ, दीर्घ, अतिदीर्घ), ऐ, ओ के दू गो (दीर्घ आ ह्रस्व), औ, आ ऋ. जरूरत एह बात के बा कि भोजपुरी के विद्वान या त एह स्वरन खातिर वर्ण खोजसु, ना त एकरा के कम करसु. हमरा समुझ से आ, इ, उ, ओ के ह्रस्व रुप आ ए के तीनो अधिका रुप हटावल जा सकेला. बाकिर अ के तीनो रूप बरकरार राखहीं के पड़ी बस ओकरा ला वर्ण तय कर लिहला के काम बा. पढ़्, पढ़, आ पढ़ऽ तब जा के भोजपुरी पढ़ल आसान हो जाई.

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1 Comment on "साहब बुझले पियाज, सहबाइन बुझली अदरख (बतकुच्चन-201)"

  1. Abhishek Yadav | August 9, 2016 at 12:48 am | Reply

    सही बात बा ।

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