(इयाद)
(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 7वी प्रस्तुति)

– आचार्य गणेश दत्त ‘किरण’


जन्म: मई 1933 मृत्यु : सितंबर 2011
गहिर संवेदना, इतिहास-बोध, पौराणिक लोक-परम्परा के समझ आ कल्पना-प्रवणता वाला आचार्य गणेशदत्त ‘किरण’ भेजपुरी भाषा के प्रतिभाशाली आ समर्पित कवि-रचनाकार रहलन. भोजपुरी के भूषण नॉँव से चर्चित, ‘बावनी’ (1966) के कवि किरण जी के कवि-प्रतिभा आ कौशल के दर्शन उनका प्रकाशित काव्य-संग्रह ‘अंजुरी भर गीत’, ‘सत्यपंथी’ (खण्डकाव्य) ‘रामचरित’ आ ‘महाभारत’ (महाकाव्य) में कइल जा सकेला. ‘विचार के तार’ उनकर निबन्ध संग्रह हऽ. बहुआयामी सृजनात्मक व्यक्तित्व के धनी ‘किरण जी’ भोजपुरी में पौराणिक, ऐतिहासिक भावबोध के कुछ बेजोड़ उपन्यास भोजपुरी के दिहलन. ‘धूमिल चुनरी’ (1980), ‘रावण उवाच’ (1982), ‘सती के सराप’ आ ‘तोहरे खातिर’ (1985) भोजपुरी उपन्यास-साहित्य के समृद्धि में रेघरियावे लायक विशेषता वाला उपन्यास बाड़न सऽ.



‘बावनी‘ के कुछ छन्द

दसों नोह जोरि सारदा से करीं अरजी हम
कलम के बनाइ आज हमरा लउर दऽ।
बहुत गीत गवलीं, अब गाइब लवटला पर,
भारत के अबहीं बचावे मउर दऽ।
पेकिंग पर जाइ बरसाईं अकासे से
हमरा के ऐटम के टटका भउर दऽ।
चाहे त, खउरे दऽ मुदई के नीके से,
नाहीं त हमरा के निपटे खउर दऽ।।1।।

एने पिया के बाँहि गर्दन में माला अस
ओने गुलामी के फंदा मुँह बावत बा।
एने करेजा में बान लगे नैनन के,
ओने सिपाही के करतब बोलावत बा।
माया के बन्धन ना रोकि सकल बीरन के
कवनो निसाचर कैलास गिरि उठावत बा।
तेजि के बिलास भोग कूदति समरांगन में,
धावऽ धावऽ कहि के हिमालय गोहरावत बा।।2।।

एक बेर सेल्यूकस चंद्रगुप्त पर दउरल
खूब जब कुटाइल, लुकाइल मचानी पर।
आखिर में बेटी ऊ, देइके बचवलस जान
पोंछ सरकाइ के पराइल पलानी पर।
एँड़ी के जगहा पर, अँगूठा हम दिहलीं ना
अइलीं लुटावत हम जान एक पानी पर।
उगिले अँगार जे ना आग भरल बोली सुन
बाटे धिरकार ओह जोश पर, जवानी पर।।3।।

मैकमोहन बुझिहऽ जे लक्षुमन के पारल हऽ
लाँघी से काहे ना खून फेंकि मरि जाई।
भरतमाता के जे, चाही चोरावल तऽ
काहे ना रावन, फतिंगा अस जरि जाई।
लागी केहुनाठ जामवंत हनुमान के तऽ
ठेहुना भर भूभुर में पेटकुनिये परि जाई।
कइलो अनेत भला निबहेला जिनिगी भर
पगरी से मोती के पानी उतरि जाई।।4।।

धइके कचारबि, लथारबि हम पटकि-पटकि
बान्हबि मुसुक दूनो बांहिन के चउर-चउर।
सरपट छोड़ाइ देब, थूर देबि लोल दूनो
ठेगन ठेठाइ देब हुमचि-हुमच टउर-टउर।
हिन्द महासागर में चीन के दबोरबि जब
बाँची ना जान तब लुकइला से दउर-दउर।
अपने त जइबऽ, ले जइबऽ खनदानो के
सबके चबइबऽ तूँ डाहि-डाह खउर-खउर।।5।।

धइके बिलार, जस मूस के दबोरेले
तोहरा के ओसहीं कचाक दे दबोर देब।
हमरा सिवाना में लात जे लगवलऽ त
केतनो केंकियइबऽ, हम तहके भँभोर देब।
आँख के देखावल बरदास कबो कइलीं ना
जानऽ कि आँख जे देखवलऽ त फोर देब।
गुरुये पर चेलाजी लंगी लगइबऽ त
धइला पर चीन्हबि ना, लादे खँखोर देब।।6।।

सूप से ओसाइ पंचशील उधियवले बा,
रात-दिन सपना ई देखत बा जूध के।
गदहा के यारी सनसनहट हऽ लातन के
बड़ भरी लबजा1 बा चेला ई बूध के।
दीक कइल चाहत बा, रहि रहि के डाहत बा
लाँघि के सिवाना दबेरत बा सूध के।
फोर देबि धइके फँफेली नकियवला पर
कबले रहबि भला धोवल हम दूध के।।7।।

भारत के ठाट-बाट ईजति-आ हुरमत तूँ
पूछऽ हुएनसांग से आ फेरू फाहियान से।
अपने पुरनियन से पुछलऽ ना कहलो पर
देखे ना पवलऽ, त सुनिये लऽ कान से।
सोझिया के सोझिया आ ढीठन के ढीठ हम,
लंगा के लंग बनि, कूटीले घानि से।
एक धूर लेबऽ का, देबऽ तूँ चार धूर
दूहीले दूध, गाय-करकट का थान से।।8।।

मारे के चाहे जे, ओकरे के मारीला
आँटेला ओकरा के समती भर आँटीले।
चिरई-चुरुंगो तक मुदई के चीन्हेला
निपटे मत जानऽ कि घास हम काटीले।
के-के पराइल बा, भारत से चोट खइ
पूछऽ तूँ खैबर आ बोलन के घाटी ले।
तखते उलाटीले, धरती के पाटीले
भहराइल कांखेलन, भर-भर मुँह माटी ले।।9।।

जोति भगजोगनी के आदित का आगा का ?
बउली के, सागर का आगा हहास का ?
पत्थल का आगा, के माटी के बात करो ?
कनइल के चन्नन का आगा सुबास का ?
सक्ती के आगा सरूप के बसाइल कब ?
चाउर के आगा, मुरेना के घास का ?
लेखा का भारत आ चीन देस दूनो के
बेना के आन्ही का, आगा बतास का ?।।10।।

खर्चे कंजूस, आ बिलारी से मूस डरे
फूस डरे आगि से, चिरई कुल पासी से।
दाबा से फेंड़-खूँटि, संकर से कालकूट
उरुवा अँजोरा से, चोर डरे खँसी से।
मोरन से साँप डरे, पानी से ताप डरे
पापी के गर्दन डरे न्याय का गँड़ासी से।
कुकुर लुकाठी से, जरते खोरनाठी से
ओसहीं थर-थर काँपे, चीन हिन्दवासी से।।11।।

नइखे चढ़ाई लद्दाख चुसुल नेफा पर
बूझऽ आजादी पर भारत का खतरा बा।
सोना का चिरई के चाहत बझावे के
लासा आ कम्पा से अपना, जगतरा बा।
कोठ भइल दाँत आ रँगाइ गइल ओठ तब
आग में हेराइ गइल कागज क पतरा बा।
छीपा भुलइला पर, खोजत बा गगरी में
मुँह भइल करिया, पोताइल अलकतरा बा।।12।।

रहिला जे होई बरियार अउर गोटहन त
भूँजत खा, फोरि कबो घाली भरसाँई ना।
देखत संसार एह करनी पर भरनी के
बदी से, नेकी के बायन दियाई ना।
झुठहूँ के गोंइठा में, घीउ के सुखवल बा
बखरा हिमालय में केहू के बाइ ना।
नीन कहीं-टूटल त, ना जाने का होई ?
बोली सियारन के, सिंह का सहाई ना।।14।।

सिहुर-सिहुर कइला से दुष्ट कबो माने ना
नीच जीव मानेला सीकम भर कँड़ला से।
पिटले पर झाँझ-डफ, ढोल-झाल बाजेला
बीजो अँखुवा जाला धरती में गड़ला से।
बुद्धी गँवारन के आवे ठेकाना में –
गाल में हुमचि के तमाचा का जड़ला से।
लातन के देव कबो बातन से मानसु ना
कुत्ता के पोंछि भला सोझ होई मँड़ला से ??15।।

चाहीं त पर्बत के फोरि महमंड दीहीं
चाहीं त धरती झकझोरि के हिलाइ दीं।
चाहीं त हाथी के देंहि बिधुनियाइ दीहीं
चाहीं त पत्थल में फूल हम खिलाइ दीं।
चाहीं त सूरुज के पच्छिम उगाईं हम,
चाहीं त माटी में, माटी मिलाइ दीं।
अहल-दिल चाहीं त ‘चाऊ’ का बापो के
रन में उठाइ तेग, पानी पियाइ दीं।।13।।

छेहर करछुटकू के छीलि-छालि छोड़बि हम
छक्का छोड़ाइ देबि छीन-छान छावनी।
लालन के रहत, केहू लीली ना लाल मोर
लहकि-लहकि लुतुकी लय लहराई लावनी।
पीढ़ा पर पटकी आ काटी छप-छप छपाक
पाटी पड़ोसी से पहाड़ी भूमि पावनी।
बुतरू का बेड़ा पर, बम बरिसी बीस लाख
बावन गो बौना पर, एक किरन-बावनी।।16।।


पिछला कई बेर से भोजपुरी दिशा बोध के पत्रिका “पाती” के पूरा के पूरा अंक अँजोरिया पर् दिहल जात रहल बा. अबकी एह पत्रिका के जनवरी 2012 वाला अंक के सामग्री सीधे अँजोरिया पर दिहल जा रहल बा जेहसे कि अधिका से अधिका पाठक तक ई पहुँच पावे. पीडीएफ फाइल एक त बहुते बड़ हो जाला आ कई पाठक ओकरा के डाउनलोड ना करसु. आशा बा जे ई बदलाव रउरा सभे के नीक लागी.

पाती के संपर्क सूत्र
द्वारा डा॰ अशोक द्विवेदी
टैगोर नगर, सिविल लाइन्स बलिया – 277001
फोन – 08004375093
ashok.dvivedi@rediffmail.com

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