एगो परीकथा : सपना में सोना

by | Oct 24, 2013 | 0 comments

– ‍हरिराम पाण्डेय

एगो साधु कहाए वाला सपना देखलन कि एगो ताल्लुकदार का किले का नींव में सैकड़ो टन सोना दबाइल बा आ चूंकि देश के अर्थव्यवस्था खस्ताहाल बा एहसे ई सोना मदद दे सकेला. अब कहे के ऊ साधु वक्त के हाकिम के आ अउरिओ लोग के लिखलस आ नतीजा में खुदाई शुरू हो गइल. सोना ना मिलल काहे कि सपना में सोना मिलल आ जमीन का भीतर से सोना मिलला में बहुते फरक होला. अब किला के खुदाई करे वाली संस्था जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (जी एस आई) वाले ई कहत चलतारें कि उनुका सोना से कुछ लेबे- देबे के नइखे ऊ त बस ऐतिहासिक तथ्यन के पड़ताल ला खोनाई करत बाड़े. अब जहां ले डौंडिया खेड़ा, जिला उन्नाव, उत्तर प्रदेश के किला के इतिहास के सवाल बा त ई किला राजा रामबख्श के रहुवे आ ओहिजा सिपाही विद्रोह का जमाना में अंग्रेज कमांडर कॉलिन कैम्पबेल के सिपाहियन से रामबख्श के नेतृत्व में विद्रोहियोन के जंग भइल रहे.

खजाना के तलाश में चलत सरकारी कुदारन के ई नजारा भारत के पूरा कहानिए बता देत रहे. ई एगो बेजोड़ नजारा रहे, जहां भारत के भूत, भविष्य आ वर्तमान एके साथ लउकत रहे. एहमें हमनी का जान सकीले कि हमनी का जवन हईं तवन काहे हईं. उन्नाव के ई गांव भारत के मिनिएचर मॉडल बन गइल बा. ई दास्तान ओही अवैज्ञानिक सोच आ भाग्यवाद के बा जवन भारत के इतिहास गढ़लसि. पुरान सबूत, बहस, तर्क आ बौद्धिक उत्तेजना के एगो लमहर परंपरा के गवाही देत बा, जवन भारतीय दर्शनशास्त्र के छह अंगन का बीचे चलल. हालांकि साइंटिफिक सोचे में भारत के दावा तबहियो कमजोरे रहल, लेकिन जब से मिथक आ भाग्यवाद का सोझा ठेहुनिया दीहल गइल तब से चेतना के अन्हरिए चलत गइल.

कवनो समाज के इनार में धकेले के होखे त भाग्यवाद के घुट्टी से बेहतर जहर कुछ अउर ना हो सके. भाग्यवाद हमनी के काम करे में यकीन खतम क देला. ओहिजा खजाना सिरिफ सपने में लउकेला आ ओहिजे गड़ाईओ जाला. हमनी का जमींदोज दौलत का ऊपर ठेहुना में मूड़ी दिहले अउँघत रहीले. ओही अउंघी में हमनी का गौरव अउर महानतो के सपना देखीले आ हमहन के खून खौलत रहेला. उहे नींद हमनी के जातीय भा मजहबू जोश भरत कुर्बानी ला बेचैन बना देला. हमनी के सपना मे समय थथम जाला. हमनी के अतीते हमनी के भावी बन जाला. एह मोड़ प आ के हमनी का जानीले कि भारत के दुर्दशा क इतिहास का रहल. लेकिन ई घटना बतावत बिया कि इक्कीसवींओ सदी में हमनी का ओही सपान में जीयत बानी जा. भाग्यवाद पर हमहन के आस्था आ साइंटिफिक सोच सस्पेंड राखे के हमनी के काबिलियत में जरिको फरक नइखे आइल. हमनी का एह छल के कायम रखले बानी कि ‘सोना क चिडिय़ा’ के पंजा का नीचे से सोना के ज्वालामुखी फूट पड़ी. इहाँ ले कि हमनी का अपना पढ़ल साइंसो के (एहिजा जी एस आई पढ़ीं) सपना के हवाले कर दीलें. तरक्की नींद से बाहर घटे वाली घटना होले. असल तरक्की ओही समाज के होला जे अपना काम पर यकीन करेला. जे अतीत ओरी मुंह कइले ना पड़ल रहे भा फेर जेकरा लगे कवनो अतीत होखबे ना करे.

उजड़ल समुदाय एहीले पुरुषार्थी होले कि भाग्य पहिलही उनकर साथ छोड़ चुकल होला. भारत के ट्रेजिडीए ई बा कि हर चोट का साथे एकर नींद लमहर होत चल गइल. का एकरा के बेहोशी कहल जाए? हजार साल लंमहर बेहोशी? कुछ बरीस पहीले अइसन लागे लागल रहे कि भारत एह नींद से बहरी निकलत बा. एह जवान देश में पीढ़ीगत बदलाव का साथे बहुते खानदानी दोष बेअसर होत लउकत रहे. उम्मीद बनल रहे कि भारत अब अतीत के ना भविष्य के सपना देखल करी. अब ई एह उम्मीद का खिलाफ एगो ऐलान का तरह बा. अगर रउरा पॉजिटिव ख्याल के हईं त बस अतने सोच सकीले कि ई घटना नींद आ चेतना के बीच, सपना आ हकीकत, भाग्य आ पुरुषार्थ, अतीत आ भविष्य के बीच एक टकराव भर हवे, एगो जंग हवे. ई जंग, उम्मीद बा कि, तरक्कीए के पाले जाई. भारत के पीछे ले जाए वाला खयालात के हार हमनी का पहिलहु देखले बानी. सोना के ई सपना हमनी के भविष्य के हमेशा ला गँवाए से पहिले जगाइओ सकेला.
(२१ अक्टूबर २०१३)


पाण्डेय हरिराम जी कोलकाता से प्रकाशित होखे वाला लोकप्रिय हिन्दी अखबार “सन्मार्ग” के संपादक हईं आ उहाँ के ब्लॉग ह खोज खबर

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