बतकुच्चन ‍ – ७९

by | Oct 3, 2012 | 1 comment


चोट त चोट ह आ कचोट? कचोट के कम चोट समुझे वाला के बुड़बके बुझे के पड़ी. काहे कि कचोट झलके ना भितरे भितर चोट मारत रहेला. देह के चोट त देर सबेर भुलाइओ सकेला आदमी बाकिर मन के चोट, कचोट, भुलावल बहुते मुश्किल होला. आजु जब लिखे बइठल बानी त एगो मंत्री जी के बयान कान में गूंजत बा. बुझात नइखे कि हँसी कि रोईं आ कि उनुकर मुँह बकोट ली. काहे कि उनुका भरोसा बा कि हमेशा का तरह कोयला के एहु घोटाला के लोग भुला जाई आ सरकार में बइठल लोग फेर कवनो दोसर घोटाला करत रही. खैर छोड़ीं. आ नोचले बकोटल तक सीमित राखल जाव एह बतकुच्चन के. भकोसे वाला लोग भकोसत रही आ जनता जे बा कि चाहिओ के ओह लोग के भँभोर ना पाई. जनता के जवन करे के बा तवन करबे करीं आईं हमनी का नोचल, बकोटल, भकोसल आ भँभोरल पर बतियावल जाव. बिलाई के त आदत होला कि चौका चुहानी घुसत रही आ दूध मलाई चाटत जाई. आ अगर जे रउरा ओकरा के चुहानी में घेरे के गलती कर देब त ओकरा बाघो बनत देरी ना लागी. काहे कि कहल गइल बा कि दुश्मन के कोना में ना घेरे के चाहीं आ ओकरा चेहरा पर वार ना करे के चाहीं. एह दुनु हालात में ऊ बिलाई से बाघ बन जाई आ झपट पड़ी रउरा पर. कोयला के आग डीजल आ रसोई गैस से लागल आग का सोझा हलुक हो जाई. रउरो भुला जाएब कि इहे बिलइया राउर सगरी दूध मलाई भकोस गइल बिया आ झट से ओह बाघ से बचे का तइयारी में लाग जाएब. एह बीच कुछ लोग के भरम हो गइल रहे कि बाघिन के घेर बान्ह लिहल जाव त ऊ बिलाई बनि के मियाऊं मियाऊँ कर के चुपा जाई. बाकिर बाघिन के बिलाई बनावल अतना आसान ना होला. राँड़ साँढ़ सीढ़ी सन्यासी एहसे बचे त सेवे काशी! आ देखीं ना बाघिन त अस भँभोरलसि कि अब सामने वाला के हेकड़ी भूला गइल. कोयला से लागल दाग डीजल से ना छोड़ावल जा सके. एह बीच एगो नेता के अउर बयान आइल बा कि ढहत दीवाल का नीचे ना आवे क चाहीं काहे कि ऊ केहु के ना छोड़े. एक त बाँड़ अपने गइले नौ हाथ के पगहो ले गइलें. से अब एह बाँड़ के बचावे बान्हे खातिर आपन पगहा के दी. साँच कहीं त हमहूं चक्कर घिन्नी में आ गइल बानी. मन के कचोट कुछ लिखे नइखे देत. जवन लिखत बानी तवन बहक जात बा. कहीं से ले के कहीं चल जात बा मन के कचोट. आ अइसनके में रहीम के दोहा याद आवत बा. रहिमन जिन मन की व्यथा मन ही राखो गोय, सुनि इठलइहें लोग सब बाँट न लीहें कोय. हमहुं जानत बानी कि एकरा के बाँटे वाला नइखे मिले वाला. सामने देखत बानी टीवी पर कि कइसे लोग मजबुर से मगरूर बनल जात बा नोचल, बकोटल,भकोसल, आ भँभोरल के एगो नया दौर शुरू हो गइल बा. जेकरा खातिर चोरी कइनी उहे कहलसि चोर. बाँचल रहब त भेंट मुलाकात होते रही.

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1 Comment

  1. masoom

    bahut sundar vyang ba,pahilahi ber padhi ke hum rour follower ho gaini,… na jane kb hamare desh me saanch logan k sarkaar bani

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(3)

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(4)
18 जुलाई 2023
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19 नवम्बर 2023
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