बतकुच्चन ‍ – ८३

by | Oct 25, 2012 | 0 comments


केकर केकर लीहीं नाम, कमरी ओढ़ले सगरी गाँव.

अब रउरा कहब कि हम का हँसुआ का बिआह में खुरपी के गीत उठा दिहनी. परब तेहवार का समय में ई करिखा आ कजरी वाला मुद्दा उठा के मूड बिगाड़त बानी. जी हमहु जानत बानी कि आजु काल्हु भईंसासुर मर्दिनी माता दुर्गा के पूजा चलत बा सगरी ओर. आ एही से एह जमाना के भईंसासुरन के सवाल उठावे के चाहत रहनी. बाकिर ई का? महिषा भईंसा कब बन गइल, कइसे बनि गइल?

पानी ऊपर से नीचे बहेले आ भाषा कठिन से आसान ओर. पानी का राह में बाँध बना के ओकरा से बिजली बनावे के कोशिश होला त भाषा का राह में व्याकरण के बाँध बना के ओकरो के बढ़िया बनावे के, परिमार्जित करे के, सजाए सँवारे के काम होला. बाकिर का हमेशा ई संभव हो पावेला ? इतिहास गवाह बा कि जब जब भाषा के बाँध मजबुत हो गइल ऊ दरार तूड़ के निकल पड़ल आ एगो नया भाषा के जनम हो गइल. पानी पर के बाँधो टूटे के अनेसा बनल रहेला आ जब टूटेला तब महाप्रलय ले आवेला. अइसहीं जनता के सबुर के बाँध होला. बरदाश्त के हद का तरफ गँवे गँवे बढ़त अत्याचार अनाचार एक दिन ओकरा सबुर के सीमा से बाहर हो जाला तब ऊ टूट पड़ेला. ओकरा लगे माता दुर्गा के प्रताप आ माता काली के हुँकार आ जाला आ तब जे तीन बेर खात रहल ऊ बीन बेर खाए लागेला. तीन बेर खाते थे वो बीन बेर खाते हैं, विजन डोलाते थे वो विजन डोलाते हैं वाला हाल हो जाला.

आ कमरी पर एगो अउर कहाउत इयाद आ गइल. एक त काली अपने गोर, ओह पर से लिहली कमरी ओढ़ि. एहिजा गोर तंज कसत कहल गइल बा. बाकिर सेर पर सवा सेर हमेशा से भेंटात आइल बा. जुलुम किए तीनो गए, धन धरम अउर वंश, ना मानऽ त देखि ल, रावण कौरव कंस. हर अनाचारी अत्याचारी के भरम हो जाला कि ऊ अब दिग्विजयी हो गइल बा आ भुला जाला कि बिना बोलाए बरूआ बोले,बिना हवा के पीपर डोले आ दिन भर कुछ ना कुछ बके लागेला. भुला जाला कि देश ऊहो दिन देखले बा जब एक लाख पूत सवा लाख नाती ओकरा घरे दिया ना बाती, काहे कि राजा गलत राह पर चल निकलल रहुवे आ हर रात के भिनुसार होखबे करेला. हर घूरा के दिन एक ना एक दिन फिरबे करेला.

इतिहास गवाह बा कि जब जब होय धरम के हानी, बाढ़े असुर अधम अभिमानी तब तब कवनो ना कवनो रूप में भगवान के आवे के पड़ जाला. बाकिर एह भरोसे हाथ पर हाथ राखि के बइठल ना जा सके. हर आदमी के कुछ ना कुछ उद्यम करे के पड़ी. आ ना करी त ऊ कहाउत साँच हो जाई कि जस करनी तस भोगहु तापा, नरक जात नर क्यों पछताता! जइसन कइलऽ हो कुटुम्ब वइसन पवलऽ हो कुटुम्ब. त अब फेर रोवत काहे बाड़ऽ? कातिक में सूतल रहि गइल त चइत में जागिए के का कर लेबऽ? कातिक में बोअलऽ ना त चइत में कटबऽ का? हँ त हम कहत रहनी कि केकर केकर लीहीं नाम कमरी ओढ़ले सगरी गाँव. कवनो फरीक बाँचल नइखे एह छूतहा से. लागत बा कि इनारे में भाँग पड़ि गइल बा आ सबही मस्त बा ओह नशा में. या देवी, कल्याण करऽ! घर परिवार, देश समाज सभकर मंगल करऽ. पचरा गाए ना आवेला, से हम बतकुचने के पचरा उठा लिहनी. जानत बानी कि हर पचरा देवी गीत होला बाकिर का हर देवी गीत पचरा होला? शायद ना! शायद हँ!

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अनुपलब्ध
18 जून 2023
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(3)

24 जून 2023 दयाशंकर तिवारी जी,
सहयोग राशि - एगारह सौ एक रुपिया
(4)
18 जुलाई 2023
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(7)
19 नवम्बर 2023
पाती प्रकाशन का ओर से, आकांक्षा द्विवेदी, मुम्बई
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सुतला मे, जगला में, चेत में, अचेत में। बारी, फुलवारी में, चँवर, कुरखेत में। घूमे जाला कतहीं लवटि आवे सँझिया, चोरवा के मन बसे ककड़ी के खेत में। - संगीत सुभाष के ह्वाट्सअप से


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