बतकुच्चन ‍ – ९१

by | Dec 26, 2012 | 0 comments


हेलल-हेलल भईंसिया पानी में. पिछला हफ्ता गुजरात के चुनाव के पोस्टपोल सर्वे क बाद मन में ई पुरान गाना गूंज उठल. बाकिर चुनाव-चरचा छोड़ हम सोचे लगनी कुछ अउर. हेलल आ घुसल में कुछ फरक होला कि ना, आ होला त का? अगर गीतकार घुसल-घुसल भईंसिया पानी में ना कहलें त जरूर कवनो कारण होखी. आ कारण ईहे कि घुसला आ हेलला में फरक होला. जंगल में, घर में, कोठरी में घुसल जाला बाकिर पाँक में, तालाब पोखरा पानी में हेलल जाला. हेलल क मतलब कवनो दोसरा माध्यम का बीच से गुजरल. ओह दौरान ऊ पानी, पाँकी रउरा चारो तरफ रउरा से सटल रहेला जबकि घुसला में एह सटला के कवनो जरूरत ना होखे. एही चलते घर भा खेत में पानी हेले ना घुसेला. कहवाँ से हेलत आवत बाड़ऽ आ केने से घुसत आवत बाड़? फरक खुद देखीं आ सोचब त जान जाएब हेलला आ घुसला के फरक. भर गाँव भले बाढ़ के पानी हेलत बन्धा पर चल आवे बाकि बाढ़ के पानी गाँव में घुस त जाला हेले ना. हेलला में बाहर निकले के गुंजाइश होला घुसला का बाद निकले ला लवटे पड़ेला.

हेलल आ घुसल का चरचा का बीच अपना कल्पना में बहत हम सोचे लगनी कि कल्पना जब साँच ना होखे त लोग कलऽपे काहे लागेला. कलपल दुख में विरह में पीड़ा में रोअला के कहल जाला. का हो गइल जे तोहर आस निराश कर दिहलसि? एह में अतना कलऽपला के कवन जरूरत बा. ई त चुनाव ह जवन पाँच साल भितरे दुबारा आई कल्प थोड़े लागी अगिला चुनाव आवे में. खेल, मुकदमा आ चुनाव में हार जीत त लगले रहेला. से हम फेर लवटि अइनी हेले आ घुसे पर. कवनो आदमी तालाब, पोखरा, नदी में घुस के नहाला बाकिर पवँड़त बा हेलत ओह पार चल जाला. बीच के बाधा, अब ऊ पानी के होखो, पाँकी के होखो भा दोसरा कवनो चीझु के, पार कइला खातिर हेले पड़ेला. हेलला में आदमी एक तरफ से दोसरा तरफ निकल सकेला जबकि घुसला में सामने निकले के राह ना होखे. बाघ के मुँह में घुसब त घुस जाईं हेले के गुंजाइश नइखे ओहिजा. आ ओकरा बाद बाघ पर निर्भर करत बा कि ऊ रउरा के लवटे देत बा कि ना.

हँ बात फेरू बहकि गइल रहे बीच में. आईं अब कलपल पर लवटल जाव काहे कि जे हारल बा से रोवत नइखे, कलपत बा. रोवत में आदमी बस आपन दुख निकालेला. जबकि कलप के ऊ दोसरा से सहानुभूति खोजेला जेहसे ओकर रोवाई रूके. आ एह रोअल, कलपल से बढ़ के होला फेंकरल. फेकरलो एक तरह के राआइए ह बाकिर एकर आवाज दूर ले जाले. जइसे कि कुकुर-सियार के फेंकरल बहुत खराब मानल जाले. कहल जाला कि फेंकरल कवनो बड़हन अनिष्ट के सूचक होला. कलपल में आपन दुख पर दोसरा के सहानुभूति खोजाले त फेंकरल में दोसरा के चेतावल जाला कि हमरा पर जवन बीतल भा बीतत बा ओकर छोड़ऽ, आपन सोचऽ. अइसन ना होखे कि तहरो कलपे के पड़ जाव. रउरा सभे जब एह बतकुच्चन के पढ़ब तहिया ले साफ हो गइल रही कि के रोअल, के कलपल, के फेंकरल. गजुरात भा हिमाचल में भइल का.

हालांकि जइसन हमरा बुझात बा, हारल उमेदवार रो के संतोष कर ली, पार्टी कलपि के. बाकि मीडिया के एगो धड़ा अब फेंकरल शुरू कर दी सभके चेतावे ला कि सम्हरऽ लोग बघवा आवत बा.

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(3)

24 जून 2023 दयाशंकर तिवारी जी,
सहयोग राशि - एगारह सौ एक रुपिया
(4)
18 जुलाई 2023
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सहयोग राशि - एगारह सौ रुपिया
(7)
19 नवम्बर 2023
पाती प्रकाशन का ओर से, आकांक्षा द्विवेदी, मुम्बई
सहयोग राशि - एगारह सौ रुपिया

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