• डॉ अशोक द्विवेदी

एगो जमाना रहे कि ‘पाती’ (चिट्ठी) शुभ-अशुभ, सुख-दुख का सनेस के सबसे बड़ माध्यम रहे। बैरन, पोस्टकार्ड, अन्तर्देशी आ लिफाफा में लोग नेह-छोह, प्रेम-विरह, चिन्ता-फिकिर, दशा-दिशा आ परिस्थिति-परिवेश पर अपना हिरदया के उद्गार लिखि के भेजे । कबो-कबो त ‘पाती’ जेतना लिखनिहार का लोर से ना भींजे, ओसे बेसी पढ़वइया का लोर से भींजि जाय । ‘पाती’ तोष आ सम्बल रहे अदिमी के । चार-छव डाँड़ी में टाँकल – आस-भरोस का शब्दन से गूँथल, सनेस के नया अँजोर रहे-अन्हार-कुँआँ में छटपटात लोगन खातिर। ‘पाती’ मिलत, बाँचत भा बँचवावत आगा बढ़े के प्रेरना आ बल मिल जात रहे …ऊ समय, ऊ जमाना चल गइल। अभिव्यक्ति के सबसे छोट बाकिर असरदार एह माध्यम के, नवकी संचार-व्यवस्था टेकनीक आसान करत-करत खा गइल। टेलीफोन आ सेलफोन से होत आधुनिक मोबाइल आ आईफोन ले आवत-आवत पूरा दुनिया मुठ्ठी में आ गइल। एतना बड़हन बदलाव वाली क्रान्ति में सकपकात-बढ़त लोग, गते-गते लिखन्त-पढ़न्त के भाषा आ ‘पाती’ लिखल-बाँचल भुलाइ गइल । ई पिछड़ापन के निशानी मनाये लागल। एही नयका उफान में, लिखित साहित्य पढ़े-पढ़ावे के ललक आ आदत दूनों पर गरहन लागल। नवका संचार क्रान्ति के फायदा त भइल, बाकिर नोकसानो कम ना भइल। टी0वी0, वी0 सी0 आर0 वाली दृश्य मीडिया का ग्लैमरस मनबहलाव में, प्रिन्ट मीडिया बेमाने लागे लागल …पढ़ल जहमत बुझाये लागल । एसे अखबार, पत्रिका पर प्रतिकूल असर पड़ल ..पढ़वइया का कमी से आ नया पाठक वर्ग ना भइला से पत्र-पत्रिका के खर्चीला प्रकाशन बन्द होखे लागल। भोजपुरी में सहित्यिक पत्रिका का दिर्साइं हमरा क्षेत्र का लोगन में पहिलहूँ, ओइसन ललक आ रुझान ना रहे, जइसन बाँग्ला, मराठी आ दक्षिण भाषा-भाषियन में लउकेला। अजुओ अधिकाँश लोग का दवेनागरी लिपि में लिखल, अपने बोले-बतियावे वाली भाषा के पत्रिका पढे़ में अनकुस बरेला। भागादउरी के एह अरथ जुग में अइसनका लोगन के भोजपुरी पढ़े के फुरसत कहाँ बा? फुरसत ऊ निकालेला जेकर मन अपना माटी से जुड़ल रहेला, जेकरा अपना भाषा के अनुराग आ स्वाभिमान होला। सवंदेना के महसूस करे खातिर भितरी सवंदेनशीलता चाहीं। हिरऊ-संबाद के अपनपन, सहृदयता आ लगाव चाहीं। सुनीला कि हिया से निकलल सच्चा भाव-संवेदन के दोसरा पर गहिर असर होला, बाकिर पढ़े-सुनेवाला रही तब नू ओकरा पर असर होई। हमरा नीक से याद बा, 1979 में, जब हम “पाती” के पहिला अंक निकललीं त बहुत लोग भोजपुरी पत्रिका का नाँव पर हमार हँसियो उड़ावल, बाकिर भाषा साहित्य से जुड़ल अइसनको सुधी आ सहृदय लोग मिलल जे नीक से दू शब्द बोलि के, भा चिट्ठी लिखि के हमार उछाह बढ़ावल । डा0 कृष्णदेव उपाध्याय, आचार्य विद्यानिवास मिश्र, डा0 देवेन्द्रनाथ शर्मा, विवेकी राय, मुक्तेश्वरनाथ तिवारी (चतुरी चाचा), डा0 रामविचार पाण्डेय, प्रभुनाथ मिश्र, मोती बी0ए0, भोलानाथ गहमरी, पं0 गणेश चौबे, रामनाथ पाण्डेय, कैलाश गौतम आदि कई लोगन के लिखल दू चार डाँड़ी के ‘पाती’ हमार संबल आ शक्ति बनल । आज ऊ लोग नइखे, हम ओह लोगन के हृदय से नमन करत एगो निहोरा कइल चाहत बानी कि जदि अपना भोजपुरी साहित्य के जीवित राखल आ आगा बढ़ावल चाहत बानी सभे, त कागज कलम थाम्हीं, चिट्ठी-पाती लिखीं आ पत्रिका पढ़े-पढ़वावे के रुझान पैदा करीं। अपने सभ के हलुको कोशिश से, भाषा का मूक रचनात्मक आन्दोलन के बड़ा बल मिली।

अंक-6 जून-1993 ”कथा-विशेषाँक” रहे, जवना में सात कथाकारन के कहानी का साथ, नगेन्द्र प्रसाद सिंह के समकालीन भोजपुरी कथा-साहित्य पर एगो परिचयात्मक लेख रहे । अंक-7 -सितम्बर-93, ”कविता विशेषाँक” रहे । अंक-8, जन0 1994 भोजपुरी के पहिल ”समालोचना-अंक” रहे । अंक-8 का बाद सहृदय पाठक का रूप में जेवन आदरणीय लोगन के पाती (चिट्ठी) मिलल …ओम्मे से कुछ प्रतिनिधि चिट्ठी, ”पाती” -अंक-9/10 में छपलो रहे। इयाद ताजा करे खातिर फेरु कुछ चिट्ठी एह अंक में दिहल जा रहल बा। कवनो पत्रिका के आगा बढ़ावे आ दिशाबोध करावे में, अइसनका सुधी लोगन के प्रेरना आ सुझाव- सीख के बड़हन जोगदान होला। आज एम्मे से कई आदरणीय लोग हमहन का बीच नइखे, बाकि ओह लोगन के असीस ”पाती” पर परोक्ष रूप से मिल रहल बा ……

राउर ”पाती’’ हर बेर एगो नया सनेस लेके आवेले आ पाठक का मन में नया उमंग उत्साह के जोत जगाइ जाले। भोजपुरी भाषा आ साहित्य के मौलिकता आ नवीनता के धार आ तेवर दिन पर दिन तेज होखो, एकरा खातिर तत्पर आ तइयार रहे के बा। ”पाती” से बहुत उमेद बा । नर्मदेश्वर चतुर्वेदी, इलाहाबाद ।।

”पाती” का प्रस्तुत अंक मोहन और सुदर्शन तो है ही अन्तः से भी स्वस्थ, समृद्ध और संपन्न है। इस समृद्धिसूचक यात्रा से मेरा मन आश्वस्त-विश्वस्त हुआ। आपकी सुरुचि-संपन्नता और सम्पादकीय कौशल रिझाते और मेरे मन को आश्वस्त करते हैं । सुखी हूँ आप ऐसे बन्धु को पाकर। गर्व है मुझे, आप पर। बहुत बड़ी संभावना मैं आपमें देख रहा हूँ । ”पात” में आपकी एक पाती भी है, आपसे रुष्ट होने का अभिप्राय है, अपने आपसे रुष्ट होना। सुसंस्कृत,शालीन ज्ञान-ज्येष्ठ और आत्मीय बन्धु से रूष्ट होना। यानी साँस्कृतिक अपचय ।मानसिक दिवालियापन और सब तरह से खूँख होना .. डा0 अनिल कुमार ”आँजनेय”, उजियार, बलिया ।।

”पाती” कविता-विशेषाँक ।अंक में कवि आ कवितन के, ओकरा स्तर से चुन के राखल बा । एह से हमके अउर खुशी भइल । भोलानाथ गहमरी, गाजीपुर (उ0प्र0)

”पाती” के समकालीन कविता अंक मिलल,मन-मयूर नाचि उठल -कवितन के पढ़ि के । अपने, पुरान पीढ़ी आ नया पीढ़ी के एक जगे समेटि के नया परम्परा कायम कइलीं । पहिले कविता अधिकतर इतिवृत्तात्मक होत रहे, लेकिन रउरा सँग में नवबोध के कविता प्रकाशित कइ के, एक तरह से क्रान्ति उभारे के प्रयास कइले बानी । ‘दिल्ली दरबार’ कविता वर्तमान प्रशासन पर करारा व्यंग्य बा। उमकान्त वर्मा जी भिव्यक्ति के नया आयाम खोजे में सफल बानी पाण्डेय कपिल, मोती बी0ए0, आनन्द सन्धिदूत का गजलन में, निराशा का बीचे आशा के किरन बा। भोलानाथ गहमरी के गीत हृदय के झंकृत करत बा।। ब्रजभूषण जी आपन आत्मानुभूति बाँटे में कवनो कसर नइखीं उठा रखले राउर दूनों गीत मानवीय तादात्म्य स्थापित करे में आपन सानी नइखे राखत । भगवती प्र0 द्विवेदी का कविता में जन-क्रान्ति का आग में घीउ लेखा बा। ई अंक मननीय आ संग्रहणीय बा ।। हरिश्चन्द्र साहित्यालंकार, मोतिहारी (बिहार)

”राउर पन्ना’’ में, ”पाती’’ का नाँवें पाती ..;बरिस-1993-94 समकालीनता से सन्दर्भित, एक से एक प्रतिनिधि कवि के रचना पढि के आजु के वर्तमान स्थिति से रूबरू होखे में ‘पाती’ के ई अंक उपयोगी आ सराहे जोग बा । एसे भोजपुरी कविता के विकास यात्रा के सहज अन्दाजा लगावल जा सकत बा। सम्पादकीय का माध्यम से साहित्य आ पत्र, पत्रिकन पर मँडरात खतरा से आगा करत ,साहित्यकार-पत्रकार आ समकालीन कविता पर राउर दू टूक बिचार बहुत प्रासंगिक लागल .. सूर्यदेव पाठक ‘पराग’, संपादक ”बिगुल’’, सीवान (बिहार)

”पाती’’ के रचना-चयन आ सम्पादकीय-विवेक देखि के हम दंग रहि गइनी हाँ ।’पाती’ के ई स्वरूप भोजपुरी के विकास में सहायक होई । एह बोली के ,भाषा में बदले के राजनीतिक आन्दोलन से बड़ काम ई बा कि एकरा के सिरिजन लायक साहित्य से भरि दीहल जाय ।। निलय उपाध्याय, आरा (बिहार)

”पाती’’ के पछिला कथा विशेषाँक… भोजपुरी दिशाबोध के सार्थकता समेटले बा। मानवीय मूल्यबोध से जुड़ल एक से एक कहानी कृष्णानन्द कृष्ण कहानी सामयिक मानवीय पक्ष के उजागर करत बा। ‘चूल्हा सुनुग गइल रहे’ (भगवती प्र0 द्विवेदी आ राउर कहानी ”पोसुआ” बहुते मार्मिक बाटे । जहाँ आजु के भोजपुरी कहानी तत्सम शब्दन का पाछा भाग रहल बा ,रउरा कहानी में ठेठ भोजपुरी शब्दन का प्रयोग से, भाषा के निठाह रूप प्रस्तुत भइल बा । वैद्यनाथ विभाकर, सारण, (बिहार)

पिछले कथा-विशेषाँक में ‘सोनवा’, ‘धोखा’ और ‘पोसुआ’ कहानी मुझे विशेष अच्छी लगी। कुछ कहानियों में प्रवाह की कमी दिखी ।कवितायें अधिकांश ठीक हैं .. डा0 शालिग्राम शुक्ल ‘नीर’, आजमगढ़ ।।

सितम्बर, अंक में पृष्ठ-7 ”सिकाइत तहरा से नइखे/ऊ लोग से बा/जे हमनी के कुँआरे सोहागिन बनावेला” …। हमनी किहाँ त कुँआरे सोहागिन बनेली सन।। ‘सोहागिन’ से अभिप्राय सेक्सुअल-एब्यूज से बा ते कवि के दोसर शब्द-प्रयोग करे के चाहत रहे। भोजपुरी भाषा के चरित्र बँचवले राखल सबसे जरूरी बा। ‘श्वेतबसना, प्रज्ञा, बोधिसत्व लिखेवाला कवि, ‘उरबसी’ काहें लिखी ? पृ०11 पर ‘शोर (आनन्द सन्धिदूत)’ के जगहा ‘सोर’ बा, जेकर माने जड़ होला।… दोसरा भाषा के शब्द जइसन लिखल-बोलल जाला ओइसहीं ऊ भोजपुरी में लिखे के चाहीं, ना त अर्थ के अनर्थ हो जाई । डा0 विश्वरंजन, छपरा (बिहार)

”पाती” के काया, छपाई, कागज, शुद्धता आ मन के स्पर्श करे वाली रचनन के पाके हृदय लहलहा उठल। बीच में ..(1980 के बाद ) ”पाती” के प्रकाशन बन्द भइला से जब तब हमरा भीतर टीस उठत रहल ।आज ”पाती” के कलेवर आ सामग्री देखि के अपार आनन्द के अनुभूति भइल ।…साँच कहे में लाज का ? एह अंक में प्रकाशित स्तरीय कवितन से, भोजपुरी के सीना उभरि आइल बा । सम्पादकीय सत्यपरक आ अन्हार से अँजोर का तरफ उन्मुख करे वाला विचारन से भरल बा । डा0 किशोरी शरण शर्मा, लखनऊ ।।

”पाती” का अंक के स्वागत भइल तबे ,जब हमरो लगे चार पाँच गो पाठक पत्र भेजले । ”पाती” अकेले भोजपुरी जगत् में, साहित्यिक कलेवर का साथे बिया ! साफ-सुथरा के सँगे सँगे, रचना चुनाव पर ध्यान ई साबित करेता कि ”पाती” के मूल उद्देश्य भोजपुरी साहित्य के श्री वृद्धि के बा । अपने जइसन सप्रबुद्ध ,सजग साहित्यकार के सम्पादन में, ”पाती”के हरेक अंक प्रभावकारी होई । कुमार विरल, मुजफ्फरपुर (बिहार)

सम्पादकीय के अनुसार, सँचहूँ नयका पीढ़ी के रचनाकारन —प्रकाश उदय, अनीस आ विजय प्रताप के रचना शिल्पगत कथ-कसाव आ सधिकार भाषा-प्रयोग के नमूना बाड़ी सन । स्व0 नरेन्द्र शास्त्री के कहानी देइ के, अपना पाठकन पर रउआ बड़ी कृपा कइले बानी । गंगा प्रसाद ‘अरुण’, टेल्को टाउन, जमशेदपुर ।।

भोजपुरी में, एह तरह के साहित्यिक पत्रिका प्रकाशित हो रहल बा, ई हमनी का सोचियो ना सकत रहलीं हँ। एकर मेकप, गेटप, रूप आ स्तरीय रचना से मन भरि गइल । जगदीश पन्थी, राबर्ट्सगंज, सोनभद्र ।।

अंक के अधिकांश कविता ना खाली समय आ समाज के तस्वीर पेश कर रहल बाड़ी, बलुक अपना तल्ख तवेर आ सरंचना का जरिये गहिर छाप छोड़त बाडी़ स । सही माने में र्इ कविता समकालीन भोजपुरी कविता के प्रतिनिधित्व करत बाड़ी स । ”हमार पन्ना” के तहत साहित्य पर घहरात सकंट आ समकालीन काव्य पर समालोचनात्मक दृष्टि गौरतलब बा ।…काश भोजपुरी के नामी गिरामी संपादक लोग ”पाती” का अब तक के अंकन से प्रेरणा लिहित ! भगवती प्रसाद द्विवेदी, पटना-1

”पाती” देखि आँखि जुड़ा गइल । राउर मेहनति, राउर समीक्षक-व्यक्तित्व कुल्ह क एगो मधुपर्क ‘पाती’ में झलकत बा । सबसे बड़ विशेषता बा कि रउरा निर्भय निरपेक्ष होके रचना क चुनाव कइले बानी …भइया अइसन कम्मे होत बा ..भोजपुरी के नाँव पर कचरा पत्रिका बहुत होई, बाकि ”पाती” से कइयन संपादकन के दिशा मिली । आप जइसन समीक्षक के अँचरे भोजपुरी साहित्यिक भाषा बनी। एक से बढ़ के एक रचना कइसे जुटवले होखब, एकर पीरा त आप खुदे समझ सकीला। मधुर ‘नज्मी’, गोहना मुहम्मदाबाद, आजमगढ़ ।।

समकालीन कविता-अंक मिलल। मुखड़ा में भाव शालीनता के मोहिनी आ शरीर का भीतर दमदारी। एकर माथा दिल्ली दरबार का सच्चाई से प्रखर बा आ पाँव ऊषा का महावर आ ललाई से चटकार। बीच का शारीरिक अंगन पर भोजपुरी के बूढ़,पट्ठा आ नवहा कवियन के रचना भोजपुरी क्षेत्र के सुख दुख के, भाव-विचार के महि के, उरेहल बाड़ी सन । रउआ भोजपुरी के, कबो ना भुलाये जोग सेवा करत जात बानी। प्राध्यापक अचल, हरिहरपुर, गाजीपुर ।।

”पाती” जैसी पत्रिका के विषय में क्या कहना है । जो भी डा०अशोक द्विवेदी को जानेगा, वह, उसकी कृति, चाहे वह सृष्टि ही सम्पादित हो या संकलित, उसकी सराहना किये बिना नहीं रह सकता । अंक बहुत ही सुन्दर, समीचीन, समर्थ, सुधी साहित्यसेवियों के समावेश से संग्रहणीय बन पड़ा है ।कविताओं के साथ, कवियों के विचार बहुत ही उपादेय लगे । अशोक द्विवेदी, कुमार विरल की छाप अनोखी है। भगवती प्रसाद द्विवेदी, पाण्डेय कपिल के साथ, मोती बी०ए० को देख कर ऐसा लगा, जैसे भोजपुरी की ठोस भाव-भूमि पर भविष्य की साहित्यिक संरचना सुदृढ़तर होती जायेगी । अविनाश चन्द्र विद्यार्थी, यारपुर, पटना ।।

भोजपुरी भाषा की समृद्धि, समकालीन कविताओं के बहाने देखने को मिली। आपका श्रम स्तुत्य है। मुखपृष्ठ पर प्रकाशित ग्रेगरी की पंक्तियों को आप सार्थक कर रहे हैं । हस्तीमल हस्ती, सम्पादक ”काव्या’’, बम्बई ।।

भोजपुरी के काम में जे लागल बा, ऊ लोग आपन हड्डी गला रहल बा। एकरा बिना भोजपुरी भाषा आ साहित्य के विकासो संभव नइखे। कुछ लोग परले-परल खाली बात बघारेला ..केहू के कुछ कहला-सुनला के परवाह ना करे के चाहीं । ”पाती” में सभकर खोज-खबर रउआ लेले बानी । डा0 प्रभुनाथ सिंह, प्रोफे0, मुजफ्फरपुर विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर ।।

”पाती” पत्रिका उत्तरोत्तर प्रगति पर है। स्वच्छता, सुन्दरता, मुद्रण की शुद्धता प्रशंसनीय है । अंक की जितनी भी सराहना की जाय, कम है। प्रायः कविता के स्थान-निर्धारण में सम्पादकीय बुद्धि प्रशंसनीय है। काव्य से, काव्य की परख अधिक महत्वपूर्ण है, जिसमें आप सक्षम हैं । डा०उमाकान्त वर्मा, पाण्डेय कपिल, सन्धिदूत की रचनायें सराहनीय हैं। उमाकान्त जी खड़ी बोली के व्यामोह से दूर नहीं हैं । मोती बी०ए० जी तो पुराने काव्य शिल्पी हैं …..कविताओं में नया कथ्य, नव शिल्प और नूतन तेवर देखने को मिला, आपका तो गद्य पद्य दोनों, दीन-दलितों और उपेक्षितों को मसीहाई अन्दाज में प्रस्तुत करता है । डा0 लक्ष्मीशंकर त्रिवेदी, नरही, बलिया ।।

भोजपुरी ‘पाती’ से मुझे आश्चर्यमिश्रित खुशी हुई। अब तो आपलोगों को एक के बजाय दस प्रतियाँ तूरा (मेघालय) में भेजने की व्यवस्था करनी पड़ेगी । प्रताप नारायण, तूरा, मेघालय ।।

”पाती” सम्पादकीय सुरुचिसंपन्नता के उदाहरण बा । सामग्री परोसे के लूर, रउरा पास बढ़िया बा। डा0 ब्रजभूषण मिश्र, काँटी, मुजफ्फरपुर ।।

”पाती” कविता अकं पाकर प्रसन्नता के मारे विह्वल और निहाल हो गया हूँ. सम्पादन कौशल देखते ही बनता है। कोई उत्तरवर्ती कविता, अपने पूर्ववर्ती से जरा भी कम नहीं है, यहाँ तक कि आपका सम्पादकीय और स्व0 नरेन्द्र शास्त्री की कहानी भी कविता ही है। कहानी का नायक क्या स्वयं में रचनाधर्मिता का एक सजीव अमर प्रतीक नहीं है? सन्तोष है कि आपके रूप में बलिया की वह शक्ति आज भी वर्तमान हौ। इस अंक के सभी कवि साक्षात् कवि हैं। जी करता है कि इस कविता-अकं में प्रकाशित कविताऔं पर एक बढिय़ा समीक्षात्मक निबन्ध लिख डालूँ। आपकी कविता और सम्पादकीय अंक में सर्वोपरि है…। मोती बी0 ए0, बरहज, देवरिया ।।

”पाती” के सातवाँ अंक आइल आ अपना सँगे, नरेन्द्र शास्त्री के शोक समेटले आइल। बुझाते नइखे कि एह शोक में आपन संवेदना प्रकट करीं कि ‘पाती’ के लहालोट में मस्ती मनाईं । महेश्वराचार्य, भोजपुर, बिहार।।

भोजपुरी में बोली एवं भाषा की सीमाओं को पार करके, साहित्य बनने की सम्पूर्ण शक्ति है … ”पाती” से इसकी प्रतीति हुई। डा0 किशोर काबरा, सम्पादक ‘भाषा सेतु’, अहमदाबाद (गुजरात)।

भोजपुरी में यह अलग ढंग का सार्थक प्रयास है.. जो महत्वपूर्ण भी है। भोजपुरी में समृद्ध साहित्य सृजन की ओर और अधिक गम्भीरता से कार्य होना चाहिये । शिवकुमार ‘पराग’, आजमगढ़ । ”पाती” श्रेष्ठ आ स्तरीय पत्रिका बा …भोजपुरी दिशा बोध के पत्रिका । सम्पादकीय सामयिक आ विचारोत्तेजक बा। कवि परिचय के जगहा आत्मकथ्य, कविता के मूल्याँकन में सहायक बा । कविता में युग आ जीवन के तवर सफ झलकत बा। विश्वास बा कि ई अंक चर्चा के विषय बनी । डा0 स्वर्णकिरण, सम्पादक ‘नालन्दा दर्पण’, सोहसराय (बिहार)।

भोजपुरी के अलख जगावे वाला, स्थापित कवियन के सवक्तव्य कविता पढ़ि के मन झूमि उठल। संपादकीय में आज के लेखन, बदलल समाज के अनुरूप कवि के दायित्व बोध, प्रचार के माध्यम से आइल साहित्य-संकट आ भोजपुरी कविता के, परिवेश का अनुरूप बदलत तेवर का ओरि थोरहीं लेकिन सारगर्भित संकेत बा । डा0 कमलाशंकर त्रिपाठी, लखनऊ ।

”पाती” पत्रिका से यह जान कर हृदय व्यथित हो गया कि प्रियवर नरेन्द्र शास्त्री का निधन हो गया । वे बड़े ही प्रतिभाशाली और विद्वान लेखक थे । डा0 श्रीधर मिश्र, प्रोफे0, बम्बई (महाराष्ट्र)।

जब-जब आवेले द्विवेदी जी के ‘पाती’। लागे जइसे पहुँचल दमगर सँघाती ।।
लागे भोजपुरी आगे डेगवा बढ़वलस। रहिया के बाधा-बिघिन, कुछ त हटवलस।।
काँपत लइकवा के बान्हि देले गाँती ! जब जब आवेले द्विवेदी जी के ‘पाती’ ।।
फूलऽ-फरऽ भोजपुरी-माई पा धधइली। धिया-पूता ,नाती-पोता पाइ अगरइली ।।
सबके सिखावे जेसे मानी उतपाती। जब जब आवेले द्विवेदी जी के ‘पाती’ ।।
गीत आ गजल जइसे पूड़ी रसबुनिया । कथा आ कहानी फुलसुँघी-चुनमुनिया।
नया सँगे उबिछेले पुरखन के थाती। जब जब आवेले द्विवेदी जी के ‘पाती’ ।।
सूतल समाज के जगावेला नगाड़ा । शोषक-शिकारी के निकालेले कबाड़ा ।।
नेहियाँ के दिया-बाती जरे सारी राती । जब-जब आवेले द्विवेदी जी के ‘पाती’।।
चौधरी कन्हैयाप्रसाद सिंह, जगन्नाथपुर, आरा ।।

रउरा सम्पादन में प्रकाशित ”पाती” के कहानी विशेषाँक मिलल रहे। पाती के साज-सज्जा देखि के, सम्पादक के साँस्कृतिक सुरुचि के दर्शन भइल। आजु कवनो पत्रिका यदि दुसरा के अनुकृति बाड़ी सन, त कवनो में हिन्दी -भोजपुरी के खिचड़ी पकावल बा। राउर सम्पादकीय भोजपुरी गद्य के एगो नमूना बा। गद्य के भाषा अइसने परिनिष्ठित होखे के चाहीं….भोजपुरी भाषा के दू गो रूप में परखल आ लिखल जरूरी बा। (क)-काव्य-भाषा (ख)- गद्य-भाषा …..काव्य भाषा माने ऊ भाषा, जे कविता, नाटक, कहानी, उपन्यास में सृजनशील कल्पना के जरिये रचनाकार प्रस्तुत करेला । एमें भोजपुरी के आँचलिक रूप बचावल जा सकेला। गद्य भाषा में, वस्तुनिष्ठ विचारन के प्रस्तुति, विवेचना, विज्ञान संबंन्धी चर्चा, शास्त्रीय-अवलोकन वगैरह समेटल जाई। गद्य के भाषा तबे ठोस होई, जब दिल ना, दिमाग झलकी। शायद एही बिचार से प्रेरित होइ के, रउरा काव्य-भाषा आ गद्य-भाषा दूनों के प्रयोग पत्रिका में कइले बानी। रउरा कहानी (‘पोसुआ’) के भाषा निछक्का काव्य-भाषा बा, जेमें भोजपुरी के ठेठ रूप देखल जा सकेला। एकरा बिपरीत रउरा सम्पादकीय के भाषा, सोरहो आना गद्य के भाषा बा। एही आधार पर, भोजपुरी का अन्य गद्यकारन के कसौटी पर कसल जा सकेला। सतीश्वर सहाय वर्मा’सतीश’, बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर।

(”पाती” के अंक -8 छपला तक लगभग अढ़ाई सौ पाठकीय प्रतिक्रिया वाली पाती हमके मिलल रहे। सभकर जिकिर आ सबके छापल कठिन रहे। ओही में से कुछ प्रतिनिधि पत्रन के बीनत-बरावत, छापल मोश्किल भइल रहे… तब्बो कुछ खास रचनात्मक कमेन्ट आ सुझाव वाला पत्रन के छापल जरूरी रहे। नीचे हम अंक-9 में छपल कुछ आदरणीय पाठकन के पत्र दे रहल बानी ……)

”पाती” मिलल। हमरा हिसाब से, ऊँच स्थान त राउर बा। एक जमाना में, रउआ हिन्दी में, चोटी के कथाकार रहि चुकल बानी। सन् साठ-सत्तर के दशक का, हिन्दी के बहुचर्चित पत्रिका ”सारिका’’ में छपल राउर कहानी ”सूखे बबूल” आज तक हमरा इयाद बा। अभी आज तक रउआ से लोग हिन्दी कहानी के उमेद करेला, लेकिन रउआ हिन्दी में लिखल छोड़ि के, भोजपुरी में पत्रिका निकालऽ तानी। हमरा से आ बाकियो लिखे वाला लोगन के, भोजपुरी में लिखे के सुझाव दे तानी, ई का राउर बड़प्पन ना हऽ? रउआ नियर भोजपुरी-भाषा के प्रति समर्पित आदमी के मिली? बिना विज्ञापन के आजु का जुग में, नीक पत्रिका निकालल कतना मुश्किल काम बा, सभ जानत बा। रउआ चहितीं त हिन्दी में स्थापित भइल कठिन ना रहे, अपना प्रतिभा आ कलम काबल पर । भोजपुरी भाषा के प्रति भोजपुरी बुद्धिजीवी लोगन क जवन नजरिया बा, ओके देखि के राउर पीड़ा जायज बा। हमहूँ भोजपुरी में लिखेनी बाकिर ओतना ना, जेतना रउआ आ भगवती प्रसाद द्विवेदी। रउआ सब मिशन बना लेले बानी। भोजपुरिहा लोगन के कर्तव्य बा । अगर हमनी के अपना भाषा का प्रति तनिको मोह बा आ स्वाभिमान बा त, ‘पाती’ के छाती से लगावे के चाहीं । ‘पाती’ घर-घर जाव, ई इन्तजाम रउआ ना, भोजपुरिहा लोगन के करे के चाहीं। रउआ जवन करऽतानी, ऊहे बहुत श्रमसाध्य आ खर्चीला बा। ई बात हम एहसे कहत बानी कि हम बहुत गहिरे भाषा के पीड़ा भोगि रहल बानी। हम कलकत्ता में बानी। इहवाँ बाँग्ला के बोलबाला बा। हिन्दीभाषी लोग एइजा दोसरा दर्जा के नागरिक मानल जालन। ओहू में भोजपुरिहा लोग ”काऊ बेल्ट” वाला कहाला लोग। एहूजा भोजपुरिहा लोग भोजपुरी खातिर कुछ ना करेला। बस जीवन के ईहे परम लक्ष बा। तब हमनी के भाषा के का होई ? भाषा कवनो व्यक्ति के प्राण हवे, जब हमहीं अपना प्राण के आदर ना करब, त दोसर केहू त अउरी ना करी। दोसर केहू हमरा भाषा के निकृष्ट कही, लतियाई। नइखीं देखत हमरा समाज में केहू कविता लिखेता, त ओकरा के पंच कबिजी कहि के रिगावे लागऽता। इहे संस्कृति हवे हमनी के। डूब मरे के चाहीं। हमनी के बाँग्ला, कन्नड, तेलगू, मलयालम आ मराठी लोगन से सीखे के चाहीं। कला आ संस्कृति का प्रति सम्मानजनक रवैया अपनावे के चांहीं । जब अपना विरासत से हमहीं उदासीन रहब, त दोसर केहू से का मतलब बा कि ऊ रुचि लेव, उहो एह उपभोक्ता आ बाजारवादी संस्कृति का जुग में …माफ करब, ढेर लमहर चिट्ठी लिख दिहनी…ई हमार भीतर क पीड़ा हऽ अब तनी मन हलुक भइल। रउआ जवन बड़ काम कर रहल बानी, ओकरा प्रति हम ऋणी बानी। हमरा लायक कौनो सेवा होई त लिखब निःसंकोच ! विनय बिहारी सिंह, उपसंपादक ”जनसत्ता”, कलकत्ता।

समकालीन कविता अंक और समालोचना अँक। पाती’ इतनी अच्छी लगी कि सब काम छोड़ कर तब तक उसे पढ़ता रहा, जब तक दोनों अंक की पूरी सामग्री समाप्त नहीं हो गई । शायद ऐसा पहली बार है किसी भोजपुरी पत्रिका के सथ रस बस जाने की क्रिया हुई । बहुत बहुत बधाई अगर आप अत्युक्ति न मानें या मेरा अतिरिक्त मोह भी न मानें तो मुझे यह कह लेने की इजाजत दीजिए कि आपकी यह ‘पाती’ पत्रिका, भोजपुरी भाषा की तमाम पत्रिकाओं को, सामग्री की दृष्टि से बहुत पीछे छोड़ जाती है। हमें यह कहने में तनिक भी आपत्ति नहीं कि ”पाती” के समालोचना अंक को पढ़ कर बहुत कुछ जानने और सीखने को मिला । इस तरह के अंक ऐसे व्यक्ति के लिये दिशाबोध का काम करेंगे, जो कम समय में भी भोजपुरी भाषा की संपूर्ण गतिविधि की जानकारी कर लेने का आकाँक्षी है। संपादकीय से लेकर, अंक के एक एक निबन्ध, एक-एक कवितायें सब-कुछ मन को मोह लेने की क्षमता समेटे कैसा कुछ है, इसके सम्बन्ध में क्या कहूँ। इतना सुख …उपकृत हूँ आपका । भोजपुरी समालोचना के कद काठी, रचना आ आलोचना से निकलल समीक्षा का स्वरूप पर कुछ जरूरी बतकही, जैसे.. अपने आप में संपूर्णता लिये हुये निबन्धों की कितनी भी सराहना की जाय, कम है। मैं किन किन रचनाओं की चर्चा करूँ…. ‘को बड़, छोट, कहत अपराधू…। समकालीन कविता अंक में डा0 उमाकान्त वर्मा, भोलानाथ गहमरी, पांडेय कपिल, मोती भैया, आनन्द सन्धिदूत से लेकर कुमारी दीप्ति तक को समेट कर भोजपुरी कविता की विकास यात्रा की अच्छी सैर कराई है आपने। मैं समझता हूँ ‘समकालीन’ शब्द का सही प्रयोग और उपयोग किया है आपने, नहीं तो आजकल ‘समकालीन’ शब्द का प्रयोग एक खास तरह की कविता के लिये किया जा रहा है..खेमाबन्दी ने साहित्य को बड़ा नुकसान पहुँचाया है। आप उससे बच कर, सबको समेट कर चल रहे हैं। विन्ध्यवासिनी दत्त त्रिपाठी, बेली रोड, पटना ।।

”पाती” क ‘समालाचेना-अकं’ नसीब भइल । अइसन साहित्यिक पत्रिका निकालल टेढ़ी खीर बा। आप नियमित निकालत बानी, ई भगीरथ प्रयासे कहल जाई । फिल्मी-उल्मी पत्रिका में फोटो से सेक्स क जहर घोरि के त पत्रिका संभव बा… निखालिस साहित्य त रउरे माथे नू घहरात होई । … अइसना में केहू मदतियो ना करे, हराम के मिलेत सभ पढ़ल चाहेला। आपके त जियते परमबीर-चक्र मिले के चाहीं.. न्यायमूर्ति आनन्द नारायण मलुला एगो बड़िय़ार उर्दू कवि, लिखले बाडऩ…’ खूने शहीद से भी है कीमत में कुछ सेवा, फनकार को कलम की सियाही की एक बूँद !’ रउरे बताईं कि ”पाती” छपले में, एह स्थिति से आप शहीदन अस कई कई मोर्चन पर ना गुजरीला? भोजपुरी में, केहू सम्पादक ई हिम्मति साइते जुटावे । मधुर ‘नज्मी’, गोहना मुहम्मदाबाद, मऊ ।।

अपने के ”पाती” के ई ‘समालोचना-अंक’ निकाल के एह पर सोचे खातिर मजबूर कइये दिहले बानी। सब मिलाइ के ई अंक, भोजपुरी समालोचना खातिर इयाद कइल जाई । रामनाथ पाण्डेय, छपरा (बिहार)

रउरा एह अंक लागि सुन्दर आ उपयोगी सामग्री जुटा लिहले बानी। भोजपुरी में समीक्षा का प्रति, जेतना चेतना जागे के चाहीं,ओतना लोगन में नइखे जागल । एह अंक के, एहू दृष्टि से महत्व बा। गणेश चौबे, बँगरी, पूर्वी चम्पारण ।।

”पाती” के कविता-विशेषाँक, भोजपुरी कविता में नया भाव बोध के उजागर करे वाला अपना ढंग के पहिला प्रयास रहे। अब ई समालोचना-अंक दोसरका मजिगर प्रयास बा। साँच त ई बा कि भोजपुरी में समालोचना के कबो गम्भीरता से लेहल ना गइल । प्रो0 विजयानन्द तिवारी, सम्पादक ”जगरम”, बक्सर ।।

इतने श्रेष्ठ स्तर की पत्रिका निकालने के लिये मेरी हार्दिक बधाई। आपने भोजपुरी भाषा को ऊँचे मूल्य की पत्रिका प्रदान की है …। प्रोफे0 रामेश्वर नाथ तिवारी, आरा (भोजपुर) ।।

राउर नया ”पाती” आइल.. झड़प (कुलदीपनारायण झड़प)-शोक लिहले। पुरनियन के गइल देखि के लागता कि… प्रकृति के यौवन का श्रृंगार, करेंगे कभी न बासी फूल” सही बा । रउरा सभे साहित्य के श्रृंगार करब.. महेश्वराचार्य, शाहपुर, भोजपुर ।।

‘जनसत्ता’ कलकत्ता -संस्करण 22 मई 1994 में ”पाती” की परिचयात्मक समीक्षा पढ़ने को मिली थी …भोजपुरी की इस पत्रिका के बारे में जान कर बड़ा ही हर्ष हुआ। जितेन्द्र ‘धीर’, कलकत्ता -24

”पाती” का यह अंक पठनीय सामग्री से ओतप्रोत है। सम्पादकीय बड़ा स्पष्ट और सारगर्भित लगा। सभी आलेख तथ्यपूर्णर खोजपरक हैं कविताओं और लघुकथाओं ने पत्रिका का प्रभाव बढाने में योग दिया है। पुस्तक समीक्षा भी संक्षिप्त और सारगर्भ है । मदन मोहन वर्मा, ग्वालियर, मध्यप्रदेश ।।

अइसन अंक भोजपुरी भाषा-सहित्य में, अब तक समीक्षा, समालोचन का नाँव पर ना आइल रहे…। समीक्षा लिखे वाला के रचना, बिना पक्षपात के प्रकाशित करे के चाहीं । रासबिहारी पाण्डेय, सम्पादक, ”भोजपुरी भाषा सम्मेलन पत्रिका”, देवघर, बिहार।

साज-सज्जा, संयोजन, स्तरीय चयनित सामग्रियों और सुयोग्य सुधी-व्यक्तित्व सम्पादक के विचार-भावों से भरा सम्पादकीय अग्रलेख…. इन सबके साथ जगमगाती ‘पाती’ का हजार बार अभिनन्दन ! मोती बी0 ए0, बरहज, देवरिया।

ऐसी स्तरीय सम्पादन-सेवा मिले तो भोजपुरी क्यों नहीं ऊँचाइयों को छूने लगेगी। आपका श्रम सार्थक है। यह अंक सचमुच यथार्थ रूप में, समीक्षा – अंक हो गया है । डा0 विवेकी राय, बड़ी बाग, गाजीपुर (उ0प्र0)

”पाती” अंक-8 पढ़ि गइलीं। बलिया जइसन जगही से, एके निकलले में रउरा जरूरे बहुत मेहनत करे के परत होई। लेकिन इहो सच बा कि छोट-छोट जगहिन से बड़हन बड़हन काम होला। बड़का जगहिन के लोग ए कूल्हि कामन के छोट बूझेलें। भोजपुरी में बढ़िया से बढ़िया साहित्य छापीं, अच्छा अच्छा लोगन से लिखवाईं। एसे एह भाषा के महत्व बढ़ी। एह देश के हेत्ती हेत्ती भाषा के सरकारी मान्यता मिलि गइल, लेकिन करोड़न के ई भाषा जहें के तहाँ रहि गइल।… हमरा खुदे पछतावा बा कि जवने भाषा में हमार लेकार फूटल, जवना में हम दाना-पानी मँगलीं- पवलीं ओह भाषा खातिर कुछ क ना पवलीं ”दस्तावेज” के एगो अंक एह भाषा में निकाले के इच्छा बहुत दिन से बाटे। डा0 विश्वनाथ तिवारी, सम्पादक, ”दस्तावेज”, बेतिया हाता, गोरखपुर।

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.