( दयानन्द पाण्डेय के बहुचर्चित उपन्यास के भोजपुरी अनुवाद )

धारावाहिक कड़ी के नउवां परोस

( पिछलका कड़ी अगर ना पढ़ले होखीं त पहिले ओकरा के पढ़ लीं.)

मुनक्का राय अप्लीकेशन तइयार करववलन, सर्टिफ़िकेटन के फ़ोटो कापी नत्थी कइलन आ दे अइलन बेसिक शिक्षा अधिकारी के. मुनमुन राय अब अपने गांव के स्कूल के शिक्षा मित्र हो गइली. गिरधारी राय जब ई सुनलन त अकबका गइलन. एगो नज़दीकी से बोलबो कइलन कि, ‘ई मुनक्का हमरा के पटकनी दीहले बा. ना त ओकरा का जरुरत रहुवे अपना बेटी के शिक्षा मित्र बनवावे के.’ खैनी बगल में कोना देख के थूकत ऊ जइसे जोड़लन कि, ‘ज़रूरत त हमरा रहुवे.’

मुनमुन राय शिक्षा मित्र भलही हो गइल रहली बाकिर गिरधारी राय के उम्मीद रहुवे कि ऊ ई थी नौकरी ढेर दिन ले ना खींच पाई. दू गो कारण से. एगो त बांसगांव से गांवे आवते-जात में ओकर पाउडर छूट जाई. आ तबो ना मानी त बिआह का बाद त छोड़िए दी. वइसे ऊ एही बहाने मुनक्का के घर में भेद डाले के एगो चालो चल दीहलन. धीरज के गांवे का एगो आदमी से फ़ोन करवा के ई ख़बर परोसवइलन ई पूछत कि, ‘का तोहरा लोग के कमाई कम पड़त रहुवे जे अपना फूल जइसन बहीन के शिक्षा मित्र बनवा दीहलऽ लोग ?’

धीरज ई ख़बर सुनते भड़क गइल. पलटते बांसगांव फ़ोन कइलसि. बाबू जी भेंटइलन ना, ना ही मुनमुनवे. भेंटइली अम्मा त उनुके से आपन विरोध दर्ज कइलसि. बाकिर अम्मो एगो सवाल क के ओकर बोलती बन्द करा दिहली, ‘बाबू तोहरा बाबू जी के प्रैक्टिसे अब कतना के रहि गइल बा. तू अब भलही ना जानऽ, सगरी बाँसगांव के मालूम बा. तू जब मास्टर रहलऽ त घर के ख़रचा चलावत रहल. अब अफ़सर बनला का बाद जनलऽ भा जाने के कोशिशो कइलऽ कि घर के ख़रचा कइसे चलत बा ?’

‘हम सोचनी कि जज साहब बाड़न, तरुण बाड़न आ अब तो राहुलो बा.’ दबले जबान में धीरज बोलल.

‘आ ऊ सब सोचत बाड़ें कि तू बाड़ऽ.’ – अम्मा बोलली, ‘बाबू एगो राजा रहलन. सोचलन कि ऊ दूध से भरल एगो तालाब बनावसु. तालाब खुदवइलन आ प्रजा से कहलन कि फला दिन सुबह-सुबह राज्य के सगरी प्रजा एक-एक लोटा दूध एह तालाब में डाली. ई सभका ला जरुरी क दीहलन. प्रजा तोहरा लोग जइसन रहुवे. एगो मनई सोचलसि कि सभ लोग त दूध डलबे करी तालाब में, हम अगर एक लोटा पानिए डाल देब त केकरा पता चली ? से ऊ पानी डाल दिहलसि. दिन में राजा साहब देखलन कि पूरा तालाब पानी से भर गइल बा. दूध के त कतहीं नामोनिशान नइखे. त बाबू तोहरा लोग के बाबू जी अपने परिवार के उहे राजा हउवन. सोचत रहलन कि सब बेटा लायक़ हो गइल बाड़े सँ. तनिको-तनिको भेजत रहिहें त बुढ़ापा सुखी-सुखी गुज़र जाई. बाकिर जब उनुकर आंख खुलल त ऊ देखलन कि उनुका तालाब में त पानियो नइखे. ई कइसन तालाब खोदलन तोहरा लोग के बाबू जी. बेटा हम आजु ले एकरा ना समुझ पवनी.’ – कह के अम्मा रोवे लगली.

धीरज फ़ोन रख दिहलसि. साँझ बेरा जब मुनक्का राय कचहरी से लवटलन त चाय पानी का बाद पत्नी बतवली कि, ‘धीरज के फ़ोन आइल रहुवे. मुनमुन के नौकरी से बहुते नाराज़ बा.’ बाकिर मुनक्का राय पत्नी के बात अनसुना कर दीहलन. देखावे ला त मुनक्का राय मुनमुन के शिक्षा मित्र बनवा के गिरधारी के पटकनी भलही दिहले रहलन बाकिर अचल में त ऊ घुमा-फिरा के एगो नियमित आमदनी के सोता खोलले बाड़न. इहो एगो निर्मम सचाई रहुवे. सचाई इहो रहुवे कि मुनमुन राय छोट होइओ के, लड़की होइओ के उनुका बुढ़ापा के लाठी बन गइल रहुवे. गँवे-गँवे मुनमुनो राय के एह आर्थिक वास्तविकता से वास्ता पड़े लागल. शिक्षा मित्र के वेतन मुनमुन पहिले त जेब ख़रचा मान के उड़ावे लगली. फेर कबो-कबो मिठाई आ फलो ले आवे लगली घर में. बाद में सब्जिओ ले आवे के पड़े लागल, पहिले कबो-कबो आ बाद में नियमित. आ अब त सब्जिए बा साबुन-सर्फ़ अउर बाबू जी के दवाईओ ले आवे लगली. पहिले का दिनन में ऊ सोचल करे कि कइसे खरचे ई तनखाह. आ अब सोचे के पड़त रहुवे कि अतने से घर के ख़रचा कइसे चलावे.

फ़र्क़ आ गइल रहुवे मुनमुन राय के ख़रचा में, सोच में, आ चाल में. बांसगांव के सड़क ई दर्ज करत रहुवे. कवनो जमीन के खसरा, खतियौनी, चौहद्दी अउर रक़बा का तरह. ऊ अब गावत रहल, ‘ज़माने ने मारे हैं जवां कैसे-कैसे!’ ऊ अब जिअतो रहल आ मुअतो रहल. ओकर लागत रहल कि बाबू जी अउर अम्मा का तरह उहो अब बूढ़ाए लागल बिया. बाबू जी आ अम्मा के आर्थिक संघर्ष अब ओकर संघर्ष बन गइल रहल. ओकर शेखी भरल शोख़ी के संघर्ष के साँप जइसे डसले जात रहुवे. एक दिन रात के खाना खइला का बाद ऊ बाबू जी का लगे आ के बइठ गइल. पुछलसि, ‘बाबू जी हम एल.एल.बी. कर लीं ?’ बाबू जी हंस के बोलले, ‘तूं एल.एल.बी. क के का करबू ?’

‘राउर हाथ बटाएब !’

‘त शिक्षा मित्र के नौकरी छोड़ देबू ?’ डेराइल मुनक्का राय पूछलन.

‘ना-ना’ ऊ बोलल, ‘हम इवनिंग क्लास ज्वाइन कइल चाहत बानी आ क्लास में कमे जाएब, घरे में ज़्यादा पढ़ब. आ जे कुछ फंसी त रउरा त बड़ले बानी बतावे खातिर.’

‘से त बा. बाकिर शहर गइल, फेरु राति खाँ लवटल. ई सब मुश्किल लागत बा. आ फेर ई बांसगांव ह, लोग का कही ?’’

‘लोग के त कामे ह कहल !’ ऊ ठनकत फ़िल्मी गाना पर आ गइल, ‘कुछ तो लोग कहेंगे!’

‘ई तू अपना बाप से कहत बाड़ू कि फ़िल्मी डायलाग मारत बाड़ू.’

‘रउरा से बतियावत बानी.’ ऊ बोलल, ‘फ़िल्मी गाना के भाव डालत बानी आ रउरा के बतावत बानी कि केहू के कुछ कहे सुने के हमरा पर कवनो असर नइखे पड़े वाला.’

‘ठीक बा’ मुनक्का राय बोललन, ‘बेटी तोहरा जवन करे के बा करऽ.’ बाकिर अब बांसगांव में वकालत के कवनो भविष्य नइखे. मुक़दमा घटत जात बाड़ी सँ आ वकील बढ़ल जात बाड़ें.’ ऊ बोललें, ‘फेर एहिजा कवनो महिला वकील नइखे आ शायद बांसगांव के आबोहवा महिलन ला ठीक नइखे.’

‘महिलन ला त सगरी समाजे के आबोहवा ठीक नइखे. आ बांसोगांव ओही समाज के हिस्सा हउवे.’ मुनमुन बोलल.

मुनक्का राय बेटी के ई बाति सुन के ओकरा के टुकटुकात देखत रह गइलन. मुनमुन जवन पहिले ब्यूटीफुल रहल अब बोल्डो होखल जात रहुवे. राहुल के ऊ दोस्त जवना के नाम विवेक सिंह रहल, जवना के बाइक पर ऊ अकसरे देखल जात रहुवे, उहो कहे लागल रहुवे मुनमुन के बोल्ड एंड ब्यूटीफुल. ऊ खुश हो जात रहुवे.

संयोगे रहल कि विवेक का बड़का भाईओ थाईलैंड में रहुवे. विवेक आ मुनमुन के दोस्ती के ख़बर जब ओकरा ले चहुँपल त ओकर माथा ठनकल. ऊ राहुल से बतियवलसि आ कहलसि कि, ‘भई अपना बहिन के समुझावऽ. हमहूं अपना भाई के समुझावत बानी. ना त जे कहीं कवनो ऊंच-नीच हो गइल त दुनु परिवारन के बदनामी होखी.’ राहुल विवेक के भाई के बात सुनते बौखला गइल. ऊ पहिलका फोन विवेके के कइलसि आ जतना नीक-बाउर ओकरा के कह सकत रहुवे ओतना कह दिहलसि. आ बोलल, ‘तोरा हमार बहिने मिलल दोस्ती करे ला. बाइक पर बइठा के घुमावे ला ? काहें हमरा पीठ में छूरा घोंपत बाड़ऽ?’

‘बात त सुनऽ !’ विवेक कुछ कहे के कोशिश कइलसि.

‘हमरा अब कुछऊ नइखे सुने के.’ राहुल बोलल, ‘जवन सुने के रहल तवन तोहरा भइया से सुन लिहनी. दोस्ती तहरा हमरा से रहुवे. अब हम ओहिजा बानी ना से तोहरा हमरा घरे जाए के कवनो दरकार नइखे. आगे से जे तू हमरा घरे गइलऽ, हमरा बहीन से मिललऽ त हमरा ले बाउर केहू ना रही. अबहीं ले तूं हमार दोस्ती देखलऽ, अब दुश्मनी देखीहऽ. ओहिजे आ के तोहरा के काट डालब.’ कह के राहुल फ़ोन काट दिहलसि. बांसगांव अपना घरे फ़ोन मिलवलसि त पता चलल कि फ़ोन नान पेमेंट में कट गइल बा. पड़ोस का फ़ोन पर फ़ोन क के अम्मा के बोलववलसि आ पुछलसि कि, ‘ कब से फ़ोन कटल बा ?’

‘बिल जमा ना भइल होखी त कट गइल होखी.’ अम्मा डिटेल में ना गइली. फेर राहुल संक्षेपे में मुनमुन-विवेक कथा बतावत अम्मा से कहलसि कि, ‘मुनमुन से कह द कि आपन आदत सुधार लेव. ना त ओहिजे आ के काट डालब. कह द कि बाप भाई के इज़्ज़त के खयाल राखे.’ ऊ इहो बतवलसि कि, ‘विवेकवो के ख़ूब हड़का दिहले बानी. भरसक त ऊ आई ना आ जे आवे त कूकूर लेखा दुआरी पर से भगा दीहऽ़.’ अम्मा कुछ कहे का बजाय, ‘हूं-हां’ करत गइली. काहें कि पड़ोसी के घर में रहली. बात पसरे आ बदनामी के डर रहल.

मुनक्का राय जब कचहरी से साँझ बेरा लवटलें त मुनमुन के अम्मा राहुल के फ़ोन के ज़िक्र करत सगरी वाकया बतवली त मुनक्का के होशे उड़ गइल. कहलन, ‘बात थाईलैंड ले चहुँप गइल आ हमरा भनक तक ना लागल.’ फेर अचके पूछलन कि, ‘फ़ोन त काम करत नइखे त फेर बात कइसे भइल ?’

‘पड़ोसी गुप्ता जी का फ़ोन पर फ़ोन आइल रहुवे.’ पत्नी संक्षेपे मे बतवली.

‘फेर त उहो सब जान गइल होखिहें.’ ऊ आपन माथ रगड़त कहलन, ‘आ अबमुसल्लम बांसगांव जान जाई !’

‘जान जाई ?’ पत्नी कहली, ‘जान चुकल बा. आखि़र बात थाईलैंड ले चहुँपल बा त बिना केहू के जनले त पहुँचल ना होखी.’

‘हँ, हमहने के आंखि पर पट्टी बन्हाइल बा. बेटी का दुलार में हमहन अन्हरा गइल बानी जा.’ फेर ऊ भड़कले, ‘कहां बिया ऊ ?’

‘अबहीं आइल नइखे पढ़ा के.’

‘गदबेरा हो गइल बा आ अबहीं ले लवटल नइखे.’

थोड़ देर बाद मुनमुन आइल त घर में कोहराम मच गइल. मुनमुन कवनो अछरंग माने ला तइयार ना रहुवे आ मुनक्का राय ओकर कवनो दलील सुने ला. आखिरकार कवनो जज का तरह ऊ फैसला सुना दीहलन, ‘कवनो बहस, कवनो जिरह, कवनो गवाही ना. सगरी मामिला एहिजे खतम. अब तोहरा काल्हु से घर से बाहर नइखे जाए के. पढ़ावहूं ना. ‘

ओह रात मुनक्का राय का घरे चूल्हा ना जरल. सभे लोग पानिेए पी के सूत गइल. अगिला दिने मुनक्का राय कचहरिओ ना गइलन. उनकर ब्लड प्रेशर, शुगर अउर दमा तीनो बढ़ के उनका के तबाह कइले रहल. आ मुनमुन सगरी गिला-शिकवा भुला के उनुका सेवा में लागल रहुवे. मुनक्का राय के एगो समस्या इहो रहल कि अतना सगरी बेमारी पोसला का बादो ऊ एलोपैथिक दवाई गलतिओ से ना लेत रहलन. भलही जान चल जाव पर आयुर्वेदिक दवाईयने पर उनुका यक़ीन रहल, आयुर्वेदिक दवाईअन का साे दू गो दिक्कत रहुवे. एक त ऊ तुरते आराम ना दीहल करऽ सँ. दोसरे जल्दी भेंटाव ना. आ तिसरे महँगो रहली सँ. तबहिंओ आयुर्वेदिक दवाइयन के असर आ मुनमुन के अनथक सेवा मुनक्का राय के हफ़्ते भर में फिट कर दिहलें. ऊ कचहरी जाए जोग हो गइलन. एने ऊ कचहरी गइलें ओने मुनमुन पढ़ावे निकल गइल. जात बेरा अम्मा रोकबो कइली कि, ‘तोहार बाबूजी मना कइले बाड़न त कुछ सोचिए के मना कइले होखिहें.’

‘कुछ ना अम्मा. ऊ खीस में रहलन से मना कर दीहलन. अइसन कवनो बात नइखे.’ मुनमुन बोलल, ‘ऊ बात अब खतम हो गइल बा.’ आ निकल गइल. ऊ जानत रहल कि शिक्षा मित्र के नौकरी छोड़ला के मतलब रहुवे रूटीन खरचन के तंगी. भाई लोग अफ़सर, जज भलही हो गइल रहुवे बाकिर घर खरचा के, अम्मा-बाबू जी के स्वास्थ्य के सुधि केकरो ना रहल. सबहीं अपने-अपना में सिमट के रह गइल रहलें. ऊ त गांव से बटाई पर दीहल खेतन से अनाज मिल जात रहुवे. खाए भर के राख के बाकी अनाज बेचा जात रहुवे. कुछ ओकरा से, कुछ बाबूजी के प्रैक्टिस से आ कुछ ओकरा शिक्षा मित्र वाला तनख़्वाह से घर ख़रचा जइसे-तइसे पार लागत रहुवे. बाबू जी त पैदले कचहरी जात रहलन बाकिर ओकर गांव बांसगांव से पंद्रह किलोमीटर फरदवला रहुवे. सोझ सवारी ना रहुवे. दू तीन बेर सवारी बदले के पड़त रहल. कुछ दूर पैदलो चले के पड़े. कबो-कभार रिक्शो से. त आवे-जाए के खरचो रहल. आ एहू सबले बड़ बात इ रहल कि ऊ खाली ना रहल अपना बाकी सखी-सहेलियन का तरह जवन शादी का इंतज़ार में घर में पड़ल खटिया तूड़त रहली सँ. खरचा चलावल तनिका मुश्किल जरुर रहल बाकिर अपना खरचा ला केहू का आगा हाथ पसारे के ना पड़त रहल, एही में ऊ वह ख़ुश रहल. बस ओकरा तनिका अपराधबोध ज़रूर रहुवे के एह दौड़-धूप आ आपाधापी में ऊ विवेक का नियरा चल गइल रहुवे. पहिले त अइसहीं, फेर भावनात्मक आ अब देहो जिए लागल रहुवे ऊ. ई सब कब अचके में हो गइल ऊ बुझिए ना पवलसि. बाकिर आज रास्ता में ना त आवते, ना जाते विवेक लउकल त ओकरा खटकबो कइल आ अखरबो कइल.

साँझ बेरा घरे आइल त देखलसि कि बाबू जी के कचहरी वाला करिया कोट त खूंटी पर टंगाइल बा बाकिर ऊ नइखन. तबहियोंं ऊ अम्मा से कुछ पुछलसि ना. ना ही अम्मा ओकरा से कुछ कहली-सुनली. तनिका देर बाद बाबूओ जी आ गइलन. ऊ बाबू जी का लगे चाय ले के गइल. ऊ चाय पी लिहलन बाकिर मुनमुन से कुछ कहलन ना. ज़िनिगी रूटीन पर आ गइल बाकिर का सचहूं ?

(उपन्यास के नायिका मुनमुन के कहानी तेजी से चले लागल बा बाकिर का करीं हमार काम ओतना रफ्तार नइखे पकड़ पावत. अकेला मनई, दोसरो बहुत कुछ करत रहे के बा. एहसे मुनमुन के जिनिगी का सचहूं रुटीन पर आ गइल ई जाने ला फेर कुछ दिन तिकवे के पड़ी. मनाईं सभे कि जल्दिए लवटीं हम अगिला कड़ी का साथे.)

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