दिनेश पाण्डेय उहाँ का सँगहीं रहनीं। बइठार रहे त चलीं सउदा-सुलुफ का सँगे कुछ मटरगस्तियो हो जाई, एक पंथ दुइ काज। तय भइल जे किराना बाजार मुँहें चलल जाई, फेरू सब्जीहाट होते हुए लवटि आवल जाई। अब दु अदिमी सँगे चले आ चुप रहे भा एगो बोलते जाय आ दोसरकापूरा पढ़ीं…

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