पिछला दिने कोलकाता के प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग का ओर से ‘पत्रकारिता आ भाषा के चुनौती’ पर परिचर्चा के आयोजन विश्वविद्यालय के आचार्य जगदीश चंद्र बोस सेमिनार हॉल में कइल गइल. एह परिचर्चा में विद्वान पत्रकारिता के इतिहास से लेके ओकरा मौजूदा स्वरूप पर गंभीर चरचा कइलन आ जिज्ञासुपूरा पढ़ीं…

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पिछला 10 दिसंबर का दिने भइल मारीशस के चुनाव में ल’एलाएन्स लेपेप के दू तिहाई बहुमत मिलल बा. एह गठबन्हन में मारीशस के तीन गो पार्टी शामिल बाड़ी सँ. हटेवाला प्रधानमंत्री नवीनचन्द्र रामगुलाम के पार्टी के नेतृत्व वाला गठबन्हन के महज 13 सीट पर संतोष करे के पड़ल बा जबकिपूरा पढ़ीं…

विश्व भोजपुरी सम्मेलन के दू दिन के राष्ट्रीय अधिवेशन 11 आ 12 दिसंबर के धरमेर महलिया का समता बालिका इन्टर कालेज, भागलपुर (देवरिया) में भइल. पहिला सत्र : ” भोजपुरी साहित्य के प्रगतिशीलता” ” भोजपुरी साहित्य के प्रगतिशीलता” विषय पर गोष्ठी के संयोजक राष्ट्रीय सचिव डा॰ अशोक द्विवेदी कहलन किपूरा पढ़ीं…

– डा॰ अशोक द्विवेदी गंगा नदी पार होत-होत अँजोरिया रात अधिया गइल रहे. दुख आ पीरा क भाव अबले ओ लोगन का चेहरा प’ साफ-साफ देखल जा सकत रहे. छछात मृत्यु का सामने से, सुरक्षित लवटि आइल साधारन बात ना रहे. संजोग अच्छा रहे कि असमय आ अकाल आवे वालापूरा पढ़ीं…

दुर्गम बन पहाड़न का ऊँच-खाल में जिए वाला आदिवासी समाज के सहजता, खुलापन आ बेलाग बेवहार के गँवारू, जंगलीपना भा असभ्यता मानेवाला सभ्य-शिक्षित समृद्ध समाज ओहके शुरुवे से बरोबरी के दरजा ना दिहलस. समय परला पर ओकर उपयोग जरूर कइलस. खुद क उपजावल असंगति आ अन्तर्विरोध क शिकार सभ्य शिक्षितपूरा पढ़ीं…

ए सूरदास, घीव पड़ल? कड़कड़ाव तब नू जानी. कारण आ परिणाम के एह उदाहरण में परिणाम से पता चलत बा कारण का बारे में. सूरदास खातिर परिणामे प्रमाण बा कि कारण मौजूद हो गइल. हालांकि केहू के हवा से अगर कवनो गोल के लगातार जीत मिलल जात होखे त कहलपूरा पढ़ीं…

अर्थ का बिना सबकुछ व्यर्थ होला. चाहे ऊ कवनो बाति होखो भा आदमी. कुछ दिन पहिले हम कहले रहीं अर्थ, अनर्थ, कुअर्थ वगैरह के चरचा के बात. फेर बीच में कुछ दोसर बाति निकलत गइल बाकिर ऊ बाति बिसरल ना रहुवे से आजु ओहिजे से शुरू करत बानी. रहीम केपूरा पढ़ीं…

पिछला 2 नवंबर का दिने मारीशस आप्रवासियन के अइला के 180वां सालगिरह मनवलसि. एही दिने भारत से गइल गिरमिटिहा मजदूर पहिला बेर मारीशस का किनार पर पानी के जहाज से आ के उतरल रहले. आ हमरा बतकुच्चन के मसाला मिल गइल. आप्रवासी शब्द पढ़ के हम सोचे लगनी कि वासीपूरा पढ़ीं…

– जयंती पांडेय किताबन में, मय अखबारन में पढ़ले बानी कि संसद के एक दिन के कार्रवाई में कई लाख रुपया खर्चा होला. लेकिन बाबा तूं बतावऽ कि कालाधन आउर कई गो मामूली बात खातिर सांसद लोग संसद के कार्यवाही ना चले देला, आ कामकाज ठप क देला. अतना कहिपूरा पढ़ीं…

– अशोक द्विवेदी उहो बजावे ले एकतारा ! तुलसी, सूर प’ मूड़ी झाँटसु ले कबीर के नाँव, सरापसु भदभाव के टाफी चाभत कबिता कहनी लीखसु नारा ! उहो बजावे ले एकतारा ! पढ़सु फारसी, बेचस हिन्दी उर्दू में अंगरेजी बिन्दी अनचितले जब तब चिहाइ के नापसु भोजपुरी के पारा !पूरा पढ़ीं…

– दिलीप पाण्डेय (1) आसरा के बादल बरखे वाला बादल सगरी छाइल खिल गइल चेहरा मुरझाइल अब ना कहीं सुखार होई घर घर में बहार होई बंद जुबानो अब बोली अभागनो के उठी डोली वृद्ध नयन का बावे आस संकट अब ना आई पास झंझट से चेहरा रहे झुराइल बरखेपूरा पढ़ीं…