हँसुआ के बिआह में खुरपी के गीत, हिंदी का पेपर में गणित के सवाल. हो सकेला कि आजु के बतकुच्चन रउरो कुछ अइसने लागे. पिछला दिने तीन जगहा बम फटला के खबर आइल. अमेरिका के बोस्टन, पाकिस्तान के पेशावर आ भारत के बेंगलुरु से. एह तीनो में बहुत कुछ एके जइसन होखला का बावजूद बहुत कुछ अलगा बा. एह बम धमाकन के आवाज हमरो कान में गूँजल आ अबहियों गूँजत बा बाकिर ओहु ले अधिका आवाज पिछला दिने नीकु जी का भाषण से उठल. संगे रहि के घात करे वाला संघतियन का तरह नीकु हमेशा से नमो का खिलाफ रहल बाड़न. बाकिर बात हम एकरो ना करब. बात करब आजु टोपी आ टीका के. टोपी पहिरला आ पहिरवला के टीका कइला, लगवला, आ लगावे के.

ओह दिन नीकु जी का भाषण में कहल गइल कि देश चलावे खातिर कबो टीको लगवावे के पड़ी आ कबो टोपीओ पहिरे के पड़ी. देश के राजनीति कवन हद ले टोटरम बनत चल गइल बा एकर ई बड़हन नमूना बा,. टोटका कइल टोटरम कहल जाला. अगर लागे कि केहु टोना क दिहले बा त ओह से बचे बचावे ला टोटका भा टोटरम कइल जाला. बाकिर वोट बैंक हथियावे खातिर परिश्रम ना कर के कमे मेहनत में कुछ टोटरम कर के हथिया लिहल जाव एकरे कोशिश में समेटा गइल बा आजु के राजनीति. ना त टोपी पहिरल अतना बड़हन मुद्दा ना बन जाइत. टोपी पहिरला आ पहिरवला में फरक होला. आ टोपी पहिरावलो दू तरह के होला. एगो में सम्मान देखावे करे खातिर सामने वाला के टोपी पहिना के इज्जत दिहल जाला त आम बोलचाल का भाषा में केहु के बुड़बक बनावे का बारे में कहल जाला कि टोपी पहिरावत बाड़ऽ का?

टोपी का संगे टीका क बात कहल गइल रहे. त चलीं कुछ टीको पर टीका कर लिहल जाव. टीका के एक रुप एगो जमाना से साहित्य में चलत आइल बा जब कवनो बात समुझावे खातिर ओकर टीका लिखात रहुवे. भगवद्गीता के अनेके टीका मौजूद बाड़ी सँ, जवना में हर टीकाकार अपना अपना अंदाज में गीता पर टीका कइले बा, माने कि ओकरा के समुझावे के कोशिश कइले बा. दोसर टीका उ भइल जवन लिलारे लगावल जाला. चंदन भा भभूत के टीका. बिआहल मेहरारू मँगटीका पहिरेली सँ जवन माँग पर टिकल रहेला. टिकल आ टीकल के मतलब अलग अलग होला. टिकल माने कवनो आधार पर ठहरल आ टीकल माने कि टीका लगावल. अब टीका कई तरह के हो सकेला. एक टीका त ऊ जवन लिलारे लागेला आ दोसरका ऊ जवन डाक्टर लोग कवनो रोग से बचावे खातिर लगावेले. जइसे कि चेचक के टीका लागत रहे एक जमाना में आ टीबी के टीका आजु ले लागत बा. बाकिर का अइसनको कवनो टीका बनल बा जवन आम आदमी के लगावल जा सके नेतवन के पसारल बीमारी से बचाव खातिर ? शायद ना, आ शायद बनहु ना दीहें ई नेता लोग. जइसे कि आजु ले महिला आरक्षण बिल कानून ना बन सकल, जइसे कि आजु ले सेकुलरिज्म के परिभाषित ना कइल गइल. अदालतो इहे कहि के रहि गइल कि सेकुलरिज्म एगो लचीला अवधारणा ह आ एकरा के अइसहीं रहे दिहल जाव. आ एकरे परिणाम ह कि सेकूलर राजनीति टीका लगावे आ टोपी पहिरावे के टोटरम ले सिमट के रहि गइल बा. जय हिन्द !

By Editor

कुछ त कहीं...

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