बतकुच्चन ‍ – ७६

by | Sep 10, 2012 | 2 comments


बारी आ बारी के बाति पिछला बेर बाकी रह गइल रहुवे से ओहिजे से शुरु करत बानी. बारी के एक मतलब होला कतार में पड़ल आदमी भा काम के बारी भा मौका आ दोसर मतलब होला बगइचा. भा समूह. बारी का जगहा कुछ जगहा वारी लागेला . जइसे कि फूल के बगइचा फुलवारी आ महुआ के महुआबारी, बाँस के बँसवारी. कहीं कहीं ई बारी जगहो का हिसाब से हो जाला जइसे कि मठियाबारी, बाबू के बारी वगैरह. मठिया वाला बगइचा मठियाबारी आ बाबू के बगइचा बाबू के बारी. कलकता आ एकरा उपनगर में छोट छोट कमरन के समूह के बाड़ी कहल जाला जवना के मुबंई में चाल कहल जाला. अब बारी के बात चलल त बगइचा से जुड़ल एगो कहानी याद आ गइल. बतकुच्चन में कबो कवनो कहानी ना कहत लिखत रहीं बाकिर पिछला दिने कुछ अइसन भइल जे लिखे के मन कर गइल. एगो आदमी रात के बगइचा में मैदाने गइल त ओहिजा गंदा पर गिरल एगो अमरूद मिल गइल. एने ओने देखलसि कि केहु देखत त नइखे आ उठा के पानी से धो के खा लिहलसि. अगिला दिन संजोग से एगो बारात जाये के मौका मिलल. ओहिजा जनवासा में जुड़ल महफिल में बइठले. नाचे वाली नचनिया गावे शुरू कइलसि “कहि देब हो राजा रात वाली बतिया..”. अब त ओह आदमी के करेजा धक से कर गइल. मुँह धुआँ गइल. संजोग से नचनिया ओकरा सोझा बइठल त परंपरा का हिसाब से पाकिट से निकाल के कुछ रुपिया दिहलन. नचनिया के लागल कि एह आदमी के गाना पसंद आइल बा से हर दू लाइन का बाद “कहि देब हो राजा रात वाली बतिया..” कहत ओकरा सोझा बईठ जाव आ ऊ आदमी आपन पाकिट खाली करत गइल. हालत ई हो गइल कि ओकरा लगे कुछ बाचल ना त अँऊजिया के कह पड़ल कि “का कहबे? इहे नू कि रात गंदा पर गिरल अमरूद खइनी.” ओह आदमी के अतना कहते महफिल सन्न रहि गइल आ थोड़ देर बाद बड़ी जोर के ठहाका लागे लागल. अब सोचे के बाति ई बा कि अगर ऊ आदमी “रात वाली बतिया” से परेशान ना रहीत त का ऊ ओतने परेशान होखीत ओह नचनिया के बाति से. ना नू! एगो अंगरेजी शब्द हवे ब्लैकमेल. अब अंगरेजी में मेल त डाक के कहल जाला आ ब्लैक करिया के. त करिया डाक त होखे ना. ब्लैकमेल शब्द कइसे बनल एकरा बारे में अंदाजा लगवला पर इहे लागत बा कि जब केहु के करिया कारनामा. “रात वाली बतिया”, उजागर कर देबे के धमकी देत कवनो चिट्ठी, मेल, आइल होखी त ओह मेल के ब्लैकमेल कह दिहल गइल होखी आ तब से ई ब्लैक मेल शब्द समाज में चले लागल होखी. ब्लैक मेल ओकरे के कइल जा सकेला जेकरे लगे कवनो ब्लैक होखे, “रात वाली बतिया” लुकावे जोग होखे. एहसे कबो मत कहीं कि फलनवा रउरा के ब्लैकमेल करत बा. काहे कि ई बात कहि के रउरो मान लेत बानी कि राउर कवनो “रात वाली बतिया” बा जवना के कहि देबे के धमकी दिहल जात बा. दाल में कुछ करिया होखे के बात पहिले कहल जात रहुवे अब त देखे में सगरी दलवे करिया लागत बा. आ बात जब निकलल त मोटा मालो के चरचा कइला बिना ना मानब. अगिला हफ्ता ले दम धर लीं.

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2 Comments

  1. चंदन कुमार मिश्र

    बगइचा वाला बात से इयाद आइल कि गोपालबारी (गोपालबाड़ी) सब्द एगो मसहूर सब्द बा।

  2. चंदन कुमार मिश्र

    ब्लैकमेल खातिर हिन्दी में सब्द बा- भयादोहन। बारी के बात तनी कमे रह गइल अबकिर।

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