ल बहुरिया हर-फार, मंहगू चललन गंगा पार

– बिनोद सिंह गहरवार भारत के असहीं ना अनेकता में एकता के देश कहल जाला. एकर खिलकत देखे के होखे त बिपच्छी एकता में देखीं. हाथ के हँसुआ-हथउड़ी से कबो…

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