• शशि प्रेमदेव

दीया-दियारी का दीने मोबाइल पर सबेरहीं उहाँ के फोन आइल . अकसरहा हर तिवहार भा जनमदिन का मोका पर फोन का जरिए हमके ‘शाकिब सर’ के बधाई आ असीरबाद हासिल होत आइल बा. ई अलग बात बाटे कि उहाँ के बतकही चिर-परिचित संदेस भा असीरवाद से शुरू होके फट देने आर० एस०एस०-भाजपा विरोध , हिन्दुत्ववादियन के अत्याचार से होत इस्लाम के गुणगान तक पहुंच जाले ! हमहूँ बेर-बाँगर पोरफेसर साहब के फोन करत रहेलीं . एकही नगर के बासिंदा होखला का चलते बेर-बाँगर हमनीं क मुलाकात होखते रहेला, कबो कवनो साहित्यिक कार्यक्रम में, कबो कवनो
गोष्ठी-सेमिनार में, कबो कवनो आउर मोका पर …. शाकिब सर भा उनका नियर उनकर मुरीद वामपंथी बिचारधारा क अधिकांश लोग हमरा के पुरहर सनेह आ सम्मान देबेला . हम बहुत दिन तक एह् भरम में रहलीं कि ऊ लोग हमरा पर एह् कारन से नेह-छोह लुटावेला कि जिला-जवार में हमार छबी एगो अच्छा टीचर आ गजलगो के बाटे. बाकिर असली कारन हमके कुछ दिन बाद पता चलल कि ऊ लोग हमरा के एगो ‘अच्छा’ हिन्दू (आ, एह् लेहाज से एगो उदार ‘सच्चा’ हिन्दू ) मानि के अपना जमात में उठे-बइठे के जोग समझेला . दोसरा शब्दन में, एगो अइसन सेलेक्टेड हिन्दू जवन बेधाड़क – बिंदास अखलाक आ पहलू खान के लिंचिंग के खिलाफ लिख-बोल सकेला … उर्दू भाषा आ साहित्य के प्रसंसक हउवे … गरीब-गुरबा का बारे में सोचेला-बिचारेला … सेकुलरिज्म आ कौमी-एकता क पक्षधरता करेला !

शुरु-शुरु में शाकिब सर से हमार नजदीकी कई परिचित लोग के नीक ना लागल. हमके हिदायत दिहल गइल जे मियँवा बहुत बड़ लीगी हऽ … जहँवे मोका पावेला हिन्दू धरम क उपहास उड़ावे लागेला … … आदि-इत्यादि . बाकिर हमार एगो नीक भा बाउर आदत हऽ . हम तबले कवनो इन्सान से परहेज ना करेलीं जबले बुझा ना जाव कि ऊ समाज आ देश खातिर सचहूँ खतरनाक साबित हो सकेला ! साँच कहीं त पहिले बातचीत , लबो-लहजा से पोरफेसरो साहब हमरा के अपने नियर संवेदनशील , पाखंड विरोधी , समावेशी संस्कृती के हिमायती आ ईश्वर-अल्लाह-गॉड में फरक ना करे वाला एगो इन्सान प्रतीत भइलीं . ई बात दोसर बा कि जस-जस समय आगा बढ़त गइल , एक बेर फेर ई तथ्य उजागर होखे लागल कि शायद a good Muslim and a good human being can never co exist together inside the same person ! ( एक सँगे सच्चा यानी कट्टर मुसलमान आ अच्छा इन्सान भइल मुसकिल बाटे )!

एह अप्रिय तथ्य के भाँप लिहला का बादो सर से हमार सम्बन्ध टूटल नइखे. हँ, एतना जरुर कहब कि अब हमरा दिल में उनका प्रति उत्साह आ श्रद्धा-भाव पहिले जइसन नइखे रहि गइल. बाकिर हम आजुवो उहाँ के जोश, निर्भिकता आ अध्ययनशीलता के कायल बानीं . उहाँ के बेशक अपना विषय के एगो बहुत बढ़िया शिक्षको हउवीं. अपना आस-पास मौजूद लोग के हमेसा उत्प्रेरित करत रहेलीं . ई खुदा के बन्दा! केतना फन्दा ?

शाकिब सर से नजदिकिए क फल हऽ कि आज हमहूँ थोर-बहुत उर्दू पढ़-लिख लेत बानीं. पोरफेसर साहब कई बेर कहलीं — ‘शशी, जब तुमको उर्दू के अल्फाज की इतनी अच्छी जानकारी है … अपने गीतों-गजलों में भी उर्दू भाषा के शब्द खूब प्रयोग करते आए हो … उर्दू शायरों के प्रशंसक भी हो, तो फिर उर्दू लिखना-पढना भी क्यों नहीं शुरू कर देते ? यहीं बैठे-बैठे सीख जाओगे !’

उहाँ के सुझाव हमरो नीक लागे बाकिर काम कठिन बुझाव. बहरहाल, कोरोना काल में जवना घरी कालेज में पढ़ाई-लिखाई बन रहे , एक दिन ‘सर’ के बुलावा आइल आ हम आपन बाइक निकाल के सीधे उहाँ के मकान पर पहुँच गइलीं . पहुँचला का बाद देखलीं कि उहँवाँ हमेसा की तरह कुछ जनवादी, कुछ प्रगतिशील, कुछ छोट-बड़ लेखक-कवि आ कुछ चाटुकार लोग पहिलहीं से हाथ में कापी-कलम लेके मौजूद रहे. दू जने अपरिचितो रहलन. परिचय का बाद पता चलल कि दूनो जने उर्दू के टीचर हउवन . फेरु पता चलल कि ओह् दिन हमनी के उहँवाँ उर्दू सीखे खातिर बोलावल गइल रहे . तहिए से लगभग हर तीन दिन पर हमनीं क जुटान उहँवाँ नियमित रूप से होखे लगल. कई जने बीच-बीच में गैरहाजिरो होखे लगलन. कारन ई रहल कि जेभी होमवर्क पूरा करे में चूकि जाव, पोरफेसर साहब सबका सोझे बे-मरउत ओकर खिंचाई करे लागस … करीब-करीब एक महीना का ओह् बइठकी में हमके खाली कामचलाउ उर्दुए लिखे-पढे ना आ गइल, मुसलमान आ इस्लाम के भितरी झाँकहूँ के मोका मिलल. एकबेर फेरु हमके अहसास होखे लागल कि हमरा नियर इन्सान के प्रगतिशील, उदार आ सेकुलर समझि के शाकिब सर लेखा जेतने लोग हमके आदर आ सनेह देत आइल बा, ओह् में से अंठानबे फीसद लोग खाल के नीचे अपना मजहबे-इस्लाम, कौम, भाषा अउर परम्परा का ममिला में ओतने अधिक कट्टर, सचेष्ट आ दकियानूसी होखेला …! एह् माने में का अशिक्षित, का अर्द्ध-शिक्षित आ का सुशिक्षित — कमोबेस सबकर मानसिकता एक्के लेखा बुझाला. हम ईहो बात भांप लेले बानीं कि भारत में रहे वाला बाकी धरम-पंथ के लोग त आम तौर पर ‘नेशन फर्स्ट’ के आपन मोटो बना सकेला बाकिर (एकाध फीसद मुसलमान लोग के छोड़ के ) एह् कौम खातिर हमेशा देश आ देश के गौरव ले जादे महत्वपूर्ण अउर पूजनीय आपन इस्लामे रही . लिहाजा अब हमहूँ गते-गते कुछ बिचारक लोग के यह बात क समर्थन करे वालन में शामिल हो गइल बानीं कि एह् देश में सेकुलरिज्म भा समावेशी संस्कृती क बोलबाला खाली एही कारन से बाटे कि एहिजा इसलाम धरम के अनुयायी लोग अबहीं अल्पसंख्यक बाड़न. जहिये संख्याबल बराबरी का अस्तर तक पहुंचल कि एहिजो सेकुलरिज्म क बैंड बजा दिहल जाई. अगर केहू के हमरा एह् दलील से साम्प्रदायिकता भा कवनो दुराग्रह के दुर्गन्ध आवत होखे त ऊ हमरा एगो सवाल के जबाब देव — काहें सबले अधिका दंगा-फसाद ओही प्रान्त, जिला भा इलाका में होत आइल बाटे जहँवाँ एह् कौम क लोग बहुसंख्यक बाटे ? काहें अलगाववादी आ साम्प्रदायिक तत्व अकसरहा ओही जगहा फरत-फूलात आइल बाड़न से जवन क्षेत्र या ते विरोधी देश का सीमा से सटल बाटे भा जहँवाँ बहुसंख्यक समाज के लोग यानी हिन्दू अल्पसंख्यक बाड़न … काहें एह् कौम के अधिकांश लोग आपन नेवता, पम्पलेट, साइन बोर्ड, विजिटिंग कार्ड आदि उर्दू आउर अँगरेजी में ते छपवावे-लिखवावेला बाकिर राजभाषा हिन्दी से तबले परहेज करेला जबले आर्थिक नुकसान के अंदेशा ना होखे … ? आखिर हिन्दी से अतना नफरती बिलगाव काहें?

गिनवावे शुरू करब ते फेहरिस्त बहुत लमहर हो जाई . दरअसल इस्लाम के आधारभूत सिद्धांते हउवे कि येन-केन-प्रकारेण संसार के चप्पा-चप्पा तक एकर प्रभुत्व आ बिस्तार होखे के चाहीं ! दोसरा शब्दन में, धरती पर रहे के अधिकार खाली मुसलमान लोग के बाटे. शाकिब सर बड़ा घमंड से अकसरहा कहेलीं कि मुसलमान खुदा का अलावा आउर केहू से ना डेराला, ना खुदा के सिवा दोसरा के एह् दुनिया में पूजनीय मानेला… ऊ हिन्दुअन नियर ईंटा-ढेला-फेंड-पहाड़ के भगवान ना माने —- ला इलाहा ईलल्लाह …!! उनुकर बात सुनिके ओहिजा मौजूद उहाँ के कौम के लोग आ प्रगतिशील भाई लोग गदगद हो जाला.

आमतौर पर मुँहफट कहाये वाला कवनो वामपंथियो शाकिब सर के कब्बो ना टोकेला कि जवना मजहब के सबसे मूल्यवान वाक्ये (कलमा) नकारात्मकता से शुरू होत बाटे (ला = नहीं ) ऊ कबो सकारात्मकता के कइसे समर्थन कर सकेला ! हमहूँ बड़-जेठ बूझि के ओतना लोग का बीच में अकसरहा चूपे रहल पसन करीलाँ. बाकिर एक दिन पता ना का मन में आइल कि हमार सबर के बाँध टूटि गइल आ हमरा मुँह से बेलगाम निकल गइल — ‘सर ! क्षमा करिएगा मगर आप उन चीजों को सही परिप्रेक्ष्य में नहीं समझते हैं. … मजहबे-इस्लाम कहता है कि परमात्मा के अलावा कोई और पूजनीय नहीं और इसप्रकार वह खुदा और उसकी खुदाई को अलग-अलग करके देखता है … मगर सनातन धर्म कहता है कि दुनिया में परमात्मा के अलावा और कुछ है ही नहीं … शिव-तत्व ही जीव-तत्व तथा जीव-तत्व ही शिव-तत्व है … सृष्टि में जो कुछ भी है उसमें अव्यक्त रुप में ईश्वर ही समाया हुआ है … सर्जक और उसका सृजन इन्सेपरेबुल हैं …और जब सबकुछ ईश्वरीय है ,तो सबकुछ पूजनीय भी है … !’

ओह दिन हम देखनीं कि हमरा नियर दब्बू का मुँह से ई कूल्हि निकलत देखि के खाली शाकिबे सर के ना , सबके चेहरा के भाव बदलि गइल रहे . ‘सर’ के शायद ओह् घरी कवनो उपयुक्त जबाब ना सूझल होखी, लेहाजा आँखि तरेर के उहाँ का एकही वाक्य बोल पवलीं — ‘शट अप, शशी ! एक मोमिन के सामने बैठकर ऐसी काफिराना बातें मत किया करो ! तुम्हारी बेवकूफियाँ तुम्हें ही मुबारक हों … तौबा-तौबा !’

सन् सैंतालिस में जब धरम का नाँव पर, लाखन निरपराध लोगन के जान-माल-इज्जत के बलिदान लेके, भारतभूमि के बिभाजन आ पाकिस्तान के निर्माण भइल रहे त करोड़ो मुसलमान एहिजे रहे के फैसला कइलन. एह् सच्चाई के बूझला-समुझला का बादो कि अब भारत में हिन्दुअन का मुकबिला में उन्हन् लोग के संख्या अउर कम हो गइल बाटे ! ओह् घरी दुनिया के ईहे जनाइल कि इहँवाँ से पाकिस्तान ना जाये वाला लोग प्रगतिशील अउर समावेशी संस्कृती में बिसवास करे वाला मुसलमान होइहें … ऊ लोग के बहुसंख्यक हिन्दुअन के सोच , रहन-सहन आ सांस्कृतिक बिरासत के लेके कवनो आपत्ति नइखे … जइसे ई देस चली , ऊहो लोग राजी-खुसी ओसहीं सबका साथे चले खातिर मानसिक रूप से तइयार बाटे … ऊ लोग आइंदा से कवनो जिन्ना-इकबाल-सुहरावर्दी-मीरकासिम-तैमूर-बाबर-औरंगजेब जइसन अलगाववादी, साम्प्रदायिक आ कतली-लुटेरन से ना बल्कि
आदिशंकराचार्य, नानक, कबीर, रैदास, शिवाजी, महाराणा, विवेकानन्द , गाँधी, अशफाकुल्लाह, आम्बेडकर जइसन लोगन से प्रेरित आ अनुप्राणित होखी … आ ऊ लोग आगा चलि के खाली अपना कौम भा कौम से रिश्ता राखे वाली चीज का पक्षधरता में ना, मातृभूमि के एकता-अखंडता आ ओकरा साँस्कृतिक-विरासत के नुकसान पहुँचावे वाली हर दुष्प्रवृति के खिलाफ एकजुट होके आवाज उठइहन् … बाकि का ई हो पावल?

हमहूँ एह् कटु सच्चाई के बिनम्रता से स्वीकार करत बानीं कि सनातनी हिन्दुअनों में कुछ कट्टर आ संकीर्ण मानसिकता वाला लोग बाड़न ! गद्दारो बाड़न. अइसन लोग जे छब्बीस जनवरी आ पनरह अगस्त के, भा पाकिस्तान के खिलाफ कवनो मैच के दौरान त थोरकी देर खातिर बड़का देशभक्त हो जाला बाकिर अगले दिन से फेरु रिश्वतखोरी, कमीशनखोरी, कामचोरी, मिलावटखोरी, कालाबाजारी, जाल-टाप, कामचोरी, व्यभिचार, कायदा-कानून के उलंघन आदि जइसन काम करके देश के कमजोर बनावे आ बदनाम करे के अभियान में जी-जान से जुटि जालन ! बेशक हर धरम-पंथ-समाज में अइसन धर्मांध लोग हमेसा से रहल बाड़न् जेकर आध्यात्मिकता से दूर-दूर तक संबंध ना होखेला. बाकिर फरक परसेंटेज आ कालखंड के रहल बाटे. हिन्दुवन के हेय दृष्टि से देखे वाला लोग आ हर बात मेंआर०एस०एस०, भा०ज०पा०, गोडसे के नाँव लेके चीखे-चिचियाये वाला स्वयंभू बुद्धिजीवी प्रगतिशील लोग एह् सवाल पर काहें शुतुरमुर्ग नियर बालू में मुँह लुकवावे लागेला कि आज बरिसन से लगभग पूरा दुनिया के जवन आतंकवाद के रक्तबीज तबाह करि रहल बाटे आ जेकरा चलते अबतक लाखन इन्सानन के जान जा चुकल बा, अरबों-खरबों के सम्पत्ति नुकसान हो चुकल बा, शको-शुबहा के एगो अभूतपूर्व माहौल बनि गइल बाटे, ओकरा पाछा सनातन धरम भा संघ-परिवार के लोगन के केतना हाथ बाटे ! बाकिर आजादी का बाद से हमनीं का देश में लगातार अइसने लोगन के महिमा मंडित कइल गइल , बढ़ावा दिहल गइल जे , एगो खास मुद्दा पर , हमेशा सेलेक्टिवली आपन प्रतिक्रिया दिहल आ ‘खीरा-चोर’ अउर ‘हीरा-चोर’ के बलाते एके बरोबर घोषित करे में माहिर रहल. अइसना किसिम के पूर्वाग्रही लोग जानबूझिके इतिहास के ओह् कूल्हि पन्नन से परहेज करे के आदत डालि लेबेला जहवाँ साफ-साफ शबदन में दर्ज बाटे कि धरती पर इस्लाम का अलावा अउर कवनो अइसन दोसर धरम भा पंथ नइखे जेकरा बारे में ई कहल जा सके कि ओकर अधिकांश अनुयायी — मध्य काल से लेके आजु ले — कमोबेश ओतने हिंसक, रुढ़िवादी, भेदभाव करे वाला, स्त्री-विरोधी आ आधिपत्यवादी मानसिकता से ग्रसित रहि गइल बाड़न भा, जुग के अनुरूप बदले के तइयार नइखन … ! का एह प्रगतिशीलता से समाज में समानता आ समदर्शिता के पालन पोसन भइल?

एह् लेख के लिखला के मकसद ई इयाद दिआवल बाटे कि हमनी के एकइसवीं सदी में जी रहल बानीं जा ! अगर एतना पढला-लिखला, देखला-सुनला आ भुगतला का बादो हमनीं का अपनी कबिलाई-बर्बर संकीर्ण मानसिकता से अपना के मुक्त नइखीं जा कर पावत ,ते एह् से ना खलिसा इन्सानियत के बलुक परमात्मो के अनादर हो रहल बाटे. वइसे जवना मनुष्य भा समुदाय में ईश्वर-अल्लाह-गाड के एह् वैविध्यपूर्ण दुनिया के सम्मान करे के समझ नइखे, ऊ कब्बो ओह् सुप्रीम पावर के सम्मान ना कर पायी. एह् से हमनी सभे के भेंड़-बकरी के झुंड नियर आचरण कइल छोड़ के, मनसा-वाचा-कर्मणा आ देश सभ्य-विवेकशील मनुष्य लेखा आचरण करे के चाहीं . हमनी के कवनो धरम के अनुयायी होखीं जा , अपना मातृभूमि के एकता-अखंडता आ जन-सामान्य के भलाई हमनी खातिर सर्वोपरि होखे के चाहीं. हमनीं के अतीत केतनो दागदार होखे, हमनीं के वर्तमान साफ-सुथरा होखे के चाहीं. सबसे जरूरी ई बाटे कि हमनीं के एह् अति खतरनाक धारणा से कि ‘सज्जी बुराई दोसरा में, हमहन में एकहू ना !’ से शीघ्रातिशीघ्र निजात पावे के ईमानदारी से प्रयास करे के चाहीं. जब रिटायर्ड पोरफेसर शाकिब सर जइसन एजुकेटेड अउर वेल- क्वालिफाइडो लोग एह् देश में रहि के सनातन धरम के बहुदेववाद जइसन महान चिन्तन के मरम समझे के तइयार नइखन आ अइसन जीवन-पद्धति के कुफ्र ठहरावे में फकर महसूस कर रहल बाड़न, त दुनिया कइसे मानी कि इस्लाम शांती, प्रेम आ भाई-चारा के पैगाम देबे वाला, वैज्ञानिकता आ स्वस्थ चिंतन पर आधारित एगो समावेशी मजहब हउवे ! दुख ते एह् बात के बाटे कि हर चीज में राजनीतिक फैदा-नुकसान देखे वाला, आ जात-जमात के नाँव पर झुठहीं असुरक्षा-बोध से पीड़ित लोग अइसन जरुरी मुद्दन पर निरपेक्ष होके चिंतन करे के तइयारे नइखे. जहिए अइसन लोग गहराई में उतरि के, अपना पूर्वाग्रह-दुराग्रह से मुक्त होके सोचे खातिर तइयार हो जाई , तहिए ओह् लोग के पता चलि जाई कि दुनिया में जेतना प्रमुख धरम बाड़न स, ओह् में सनातन धरम सबले उत्तम आ कल्याणकारी बा — खाली अपने अनुयायियन खातिर ना, सकल सृष्टि खातिर, जड़-जीव-सूक्ष्म-स्थूल — सबका खातिर. एह् जीवन-पद्धति में सबसे बड़ बात ई बाटे कि ई कुदरत के निराकार – अज्ञात – अलख ‘सुप्रीम पावर’ यानी परमात्मा के व्यक्त रुप मानि के ओकर सतत् संरक्षण आ सम्मान करे के संदेश देत आइल बाटे. सनातन संस्कृती शुरुए से जीव-जड़, छोट-बड़ , दृश्य-अदृश्य , सुन्दर-असुन्दर के बिबिधता आ महत्ता सबीकार करे वाला जीवन-दर्शन से प्रेरित अउर अनुप्राणित रहल बाटे . ई सिखावले कि जेभी हमरा कामे आ रहल बा, भा कामे आ सकेला, ओह् तुच्छ से तुच्छ चीज का प्रति हमहन के अनुग्रहित होखे के चाहीं, ओकर संरक्षण करे के चाहीं. हिन्दुअन के ‘काफिर’ कहि-कहि के मजाक उड़ावे वाला दू-नमरी लोग (converted) अगर बुद्धि-विवेक के इस्तेमाल करित त जानि जाइत कि सनातनी हिन्दू एह् धारणा के समर्थक हउवे कि जेभी हमरा के यानी मनुष्य के कुछ देत बाटे भा देत आइल बा, हमरा नजर में प्रतीकात्मक रूप से ऊ ‘देवता’ भा ‘देवी’ बाटे ! चूँकि बिना ओके आदर दिहले, ओकर खियाल कइले कवनो चीज के संरक्षण-संवर्धन संभव नइखे, एही से हिन्दू लोग खातिर ,कालान्तर में, मनुष्य से लेके जानवर ले, जीव से लेके जड़ ले पूजनीय हो गइल ! सच्चा सनातनी हिन्दू आध्यामिक होखेला , धार्मिक- करमकाण्डी भलहीं ना होखे. ऊ दुनिया के जबरन अपना लेखा बनावे के, भा फुसिलाके-बहकाके-धमकाके दोसरा पर आपन विचारधारा थोपे के, दोसरा के जमीन हड़पे के कब्बो प्रयास ना कइलसि ! सतही तौर पर ऊ भलहीं सगुण-ब्रह्म के उपासक भा अनेकेश्वरवादी जनात होखे बाकिर भितरी से ऊ निर्गुण-निराकार परमात्मा के जाने आ मानेला ! ऊ केतनो कम पढल-लिखल भा पिछड़ा होखे, ओकरा एह् बात के हमेसा अहसास रहेला कि अगर खुदा/भगवान के ईहे मंसा रहित कि एह् धरती पर खलिसा एकही मजहब के माने वाला, एके किसिम के लोग रहो, त ऊ सबके अपने हाथे मुसलमान भा ईसाई भा हिन्दू बना देले रहितन् … ई काम कवनो मौलाना, पण्डा ,पादरी भा सुल्तान, खलीफा, सम्राट के जिम्मे ना सँउपतन् … ! हर समझदार , संवेदनशील इन्सान नियर सनातनी हिन्दू एह् बात के हर छन इयाद रखेला कि परमात्मा सर्वशक्तिमान , सर्वव्याप्त बाटे … ऊ एतना असमर्थ नइखे कि आपन मकसद पूरा करे खातिर ओकरा के बेर-बेर साढ़े तीन हाथ के तलवारधारी , रैफलधारी ,बमधारी भा धरमग्रंथधारी क्रूर-तंगखयाल-जाहिल इनसानन् के सहारा लेबे के पड़े !

( एह् लेख के उद्देश्य — प्रत्यक्ष भा परोक्ष रूप से — कवनो धार्मिक समुदाय,भा व्यक्ति के आस्था के अपमान कइल नइखे.)

लेखक संपर्क –

  • कुँवर सिंह इन्टर कॉलेज, बलिया

(भोजपुरी दिशा-बोध के पत्रिका पाती से साभार)

By Editor

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