डॉ. हरेश्वर राय सियासी छेनी से कालिमा तरासल बिया I चांदनी हमरा घर से निकासल बिया II भोर के आँख आदित डूबल बा धुंध में I साँझ बेवा के मांग जस उदासल बिया II सुरसरी के बेदना बढ़ल बा सौ गुना I नीर क्षीर खाति माछरि भुखासल बिया II कोंपलनपूरा पढ़ीं…

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