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Author: कार्यकारी सम्पादक

गजल

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आद्या शक्ति माई दुर्गा के आशीर्वाद सभके मिलो

भोजपुरिका परिवार का ओर से सभके नव वर्ष आ चइती नवरात्र के शुभारंभ (३१.३.२०१४) का अवसर पर बहुत बहुत...

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फाग गीत २

-डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल फागुन के आसे होखे लहलह बिरवाई. डर ना लागी बाबा के नवकी बकुली से अङना दमकी बबुनी के नन्हकी टिकुली से कनिया पेन्हि बिअहुती कउआ के उचराई. बुढ़वो जोबन राग अलापी ली अङड़ाई चशमो के ऊपर भउजी काजर लगवाई बुनिया जइसन रसगर हो जाई मरिचाई. छउकी आम बने खातिर अकुलात टिकोरा दुलहिन मारी आँखि बोलाई बलम इकोरा जिनिगी नेह भरल नदिया में रोज...

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फाग गीत १

-डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल लागेला रस में बोथाइल परनवा ढरकावे घइली पिरितिया के फाग रे. धरती लुटावेली अँजुरी से सोनवा बरिसावे अमिरित गगनवा से चनवा इठलाले पाके जवानी अँजोरिया गावेला पात पात प्रीत के बिहाग रे. पियरी पहिरि झूमे सरसो बधरिया पछुआ उड़ा देले सुधि के चदरिया पिऊ पिऊ पिहकेला पागल पपिहरा कुहुकेले कोइलिया पंचम के राग रे. मधुआ चुआवेले मातल मोजरिया भरमेला सब केहू छबि का बजरिया भींजेले रंग आ अबीर से चुनरिया गोरिया बुतावेलिन हियरा के आग...

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फगुआ के सांस्कृतिक रंग में सेंधमारी

-डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल फगुआ कहीं भा होली, ई बसंतोत्सव हउवे. बसंत जब चढ़ जाला त उतरेला कहाँ ? एहीसे त होली के रंगोत्सव के रूप में मनावल जाला. प्रकृतियो हमनी के साथ देले. नु ठंढा नु गर्मी, का मनभावन मौसम होला ! रंगन के महफिल में शिष्टता आउर सौहार्द्र के सुगंध होला आ पारंपरिक मर्यादा में उत्साह के विकास होला. होली में शृंगार के पराकाष्ठा भी लउकेला, खासकरके कबीरा आ जोगीरा के रूप में बाकिर तबहुँओ ओकरा कथन भंगिमा भा गायन शैली में उत्तेजना खातिर कवनो जगह ना होखे आ नाहीं काम(Sex) के विकृत रूप के सम्माने मिलेला. लोक साहित्य आ संगीत में अपना एह सीमा में रति भाव ओइसहीं स्वीकार कइल गइल बा जइसे बियाह ओगैरह मांगलिक अवसरन पर मेहरारू लोगन के गाली के गवाई. होली गायन के शुरुआत भगवान शंकर भा कृष्ण के रस, रंग आ संगीत में डूबल भजन से होखेले. ईहे हमनी के परंपरा ह आ एही चलन में हमनी के मस्ती परवान चढ़े लागेले. चौपाल सजे लागेला, डंफ आउर ढोल के थाप के सङही झाल आ झाँझ के झनकार बाताबरन के एगो खास किस्म के मोहक रूप देबे लागेले. बाकिर, आजु मौसम बदल गइल बा. चौपालन पर से सामूहिक गायन के अधिकार टूटे लागल बा. म्यूजिक कंपनी आ नया-नया आडियो-वीडियो माध्यम होली के एह सांस्कृतिक रंग में सेंध लगा देले बाड़न स. खुलापन के नाम पर एगो कल्पित कुरूप शृंगार हाबी होखे लागल बा....

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रामायन शैली के असाधारण ब्यास गायत्री ठाकुर अब नइखन

भोजपुरी संगीत के एगो बहुत बड़ पुरोधा चलि गइल, बिसवास नइखे होत बाकिर ई साँच बा. रामायन शैली के अपना समय के सबसे बड़ आ स्थापित गायक ब्यास गायत्री ठाकुर अब नइखन. ठाकुरजी खाली गायके ना रहीं बलुक आसु गीतकारो रहीं. रामायन,महाभारत आ पुरानन के कहानी त रउँवा जहें से पूछि लीं,जिभिए प रही,किताब देखला के जरूरत ना परी.जइसे उहाँका साधि लेले होखीं. उहाँ का गइला से खाली संगीते के ना बलुक साहित्य आ संस्कृतियो के एगो कोना अधूरा रहि गइल. शैली लोकगीत के, बाकिर सामग्री भारतीय संस्कृति के. आजु कतने लोग अश्लीलता का खिलाफ झंडा लेके चल रहल बा आ मीडिया में बनल रहे खातिर ओकरा के एगो नीमन मुद्दा बना लेले बा, बाकिर गायत्री ठाकुर जी अंत तक अपना संस्कृति के रक्षा खातिर उतजोग करत रहि गइलीं आ भोजपुरी संगीत के प्रचार-प्रसार का सङही ओकर सुरक्षो करत रहलीं. केहू जब ठाकुरजी के परिचय दिहल चाही त मुहाबरा बनि गइल उहाँ के एगो सबसे पुरान आ सबसे प्रसिद्ध भजन के जिक्र जरूर करी आ तब अपने आप उहाँ के स्मरन हो आई- गावेले दास गइतिरी, खींच के तीन गो चिचिरी करुनानिधान रउँआ,जगत के दाता हईं. के बा समान रउँआ,जगत के दाता हईं. गायकी से उहाँ के कतना लगाव रहे, अतने से जानल जा सकता कि फेफड़ा के आपरेशन भइला का बादो जब उहाँ पर संगीत के रंग चढ़ि जाई त केहू के रोकले रुकेवाला ना रहीं.बिहार के बक्सर...

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महाशिवरात्रि के अवसर पर

शिवभक्ति गीत – रामरक्षा मिश्र विमल सुनींले जे भोला बाबा हईं बड़ा दानी हमरो प किरिपा करीं तब हम जानीं. जानियो के भसमासुर के बरदान दिहलीं अपना बचाव खातिर भागल फिरलीं दानी में ना बाटे केहू शिवजी के सानी. बिष से तबाह भइल पूरा संसार जब पी गइलीं कइलीं ना आपन बिचार तब परहित के कतना सुनाईं कहानी ? अन्हरो के आँखि देलीं कोढ़िन के काया भक्त अउर दीन दुखियन पर दाया महिमा महान हम केतना बखानी ? विमल के रहिया में गहरे अन्हरिया किरिपा के फेरितीं कबहुँओ नजरिया रउरे बचावे के बा आजु मोर...

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धनि बा बुढ़ौती के अइसन सिंगार

– रामरक्षा मिश्र विमल घर फूटेला अउरी लूटे जवार पीटेली माई कपार दुरगति के कवनो ना पार. अइसन पतोह एक आङन उतरलीं अपने ही हाथ पंख आपन कतरलीं भाइन का बीच डालि दिहलसि दरार. भरि गाँव बाजल बा ईजति के ढोल नौ माह गिनती के कवनो ना मोल हमके देखावेलन दोसर दुआर. कवनो तकलीफ बने सुख के भँड़ार जो लइका फइका के सुख हो अपार ढहि जाला मउवति के भय के अरार. चकरी का बीचे दरात बा परान केनियो गइला पर ना बाची अब जान धनि बा बुढ़ौती के अइसन...

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