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Author: कार्यकारी सम्पादक

किताबि आ पत्रिका के परिचय – 9

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नीक-जबून-5   

डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल के डायरी रसियाव खाईं आ टन-टन काम करत रहीं आजु स्टाफ रूम में अपना गीत के एगो लाइन गुनगुनात रहीं- “ननदी का बोलिया में बने रसियाव रे. सरगो से नीमन बाटे सइँया के गाँव रे.“ साहा सर के जिग्यासा पर चर्चा शुरू हो गइल कि “रसियाव का हटे.” खीर के पुरान रूप कहिके ओकराके गइल-बीतल बतावल जात रहे. हमरा ई जमल ना. पहिले के बात आ परंपरा सभ आउटडेटेड कइसे हो जाई भाई ? चाउर में गुर डालिके सिंझावल जात रहे, ओमें दूध ना डलाइ. एकरे के रसियाव कहल जात रहे. सभसे बड़ आपत्तिजनक बात रहे ओह घरी दूध का अभाव के. अब ई कइसे मानि लिहल जाव ? आजु भलहीं गाँवो में दूध मिलल कठिन हो गइल बा, बाकिर पहिले त स्थिति उल्टा रहे. पहिले दूध-दही के कहाँ कमी रहे ? हम आपन पक्ष रखलीं आ कहलीं कि छठि में त खीर ना रसियावे के महातम हटे. अब त मिसिर जी बमकि गइले. ई कइसे रउँआ कहि सकींले ? गोस्वामीजी ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में रमल रहन. बन्न कइके ऊहो रस लेबे लगलन. हम कहलीं कि भाईजी हमार बचपन गाँवे में गुजरल बा. खरना में हम कबो खीर नइखीं देखले. हमनी किहाँ त रसियावे बनत रहे. जब बाहर–भीतर निकले-पइसे लगलीं त खिरियो (खीर भी) मिले लागल. हमरा त बुझाता कि लोग देखादेखी आ लोकापवाद से बाँचे खातिर खीर चला दिहले नाहीं त परंपरा रसियावे के बा....

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किताबि आ पत्रिका के परिचय – 8

मातृभाषाई अस्मिता बोध “मातृभाषाई अस्मिता बोध” डॉ. जयकांत सिंह के भोजपुरी मातृभाषा चिंतन पर एगो प्रबंधात्मक पुस्तक बिया, जवना के प्रकाशन सन् 2016 में राजर्षि प्रकाशन, मुजफ्फरपुर – 842001 (बिहार) से भइल बा. एकर कीमत 51 रुपया बाटे.   ई किताब तीन भाग में बिया। 1.भूमिका 2.मातृभाषा शिक्षा के औचित्य 3.मातृभाषाई अस्मिता बोध   लेखक मानऽता कि “हमरो मातृभाषा भोजपुरी महान भारतवर्ष का तद्भव संस्कृति के परिचायक अति प्राचीन लोक बेवहार के भाषा ह, जेकरा पाले लोक-शिष्ट साहित्य के अकूत भंडार बा. हमहूँ अपना मातृभाषा के उत्थान-पहचान खातिर संघर्ष करत रहींले आ हर भोजपुरीभाषी अथवा प्रेमी जन के भीतर उहे भाव-लगाव पैदा करे के उतजोग में लागल रहींले. ओही भाव-मनोभाव के शब्दाभिव्यक्ति बिया ई पुस्तक मातृभाषाई अस्मिताबोध.” (“मातृभाषाई अस्मिता बोध” से)   आशा ना बिश्वास कइल जा सकऽता कि एकराके पाठक वर्ग आ खास करके शोधार्थी समुदाय जरूर पसन्न करी. – डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल...

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नीक-जबून- 4

डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल के डायरी   चले दीं, प्रयोग बहे दीं धार काल्हु “ये दिल माँगे मोर” पर बहस होत रहे. हम कहलीं कि भाई ‘मोर’ का जगहा ‘और’ कहलो पर त कुछ बिगड़ी ना. फेर काहें एकर ओकालत करतारे लोग. हर भाषा में लिखे-पढ़ेवाला लोग विदेशी शब्दन का मोड़ पर कुछ देर रुकिके सोचेले, काहेंकि धड़ल्ले से एकर प्रयोग कइला के मतलब बा व्यंग-बौछार के शुरुआत के नेवता. इहाँ का इंगलैंड में पैदा भइल रहीं….जी, एंग्लो इंडियन हईं…. इहाँ का लेखन पर उत्तर आधुनिकतावाद के असर बा….. एह तरह के जुमलन का अलावा कुछ ना मिली त एगो बिदेशी मीडिया के दिहल अपमानजनक शब्द ‘हिंगलिश’ त जरूरे सुने के मिल जाई. हमरा सबसे खराब हिंगलिश लागेला, जवनाके चार भाग में एक भाग हिंदी(हिं) आ तीन भाग अंग्रेजी (ग्लिस) बा. कहनाम (ध्वनी) सीधा बा कि एह भाषा के आधारभूत संरचना माने रीढ़ के हड्डी अंग्रेजी बिया आउर बाकी सभ हिंदी. एह सोच के चलावेवाला आ सँकारेवाला- दूनो लोगन के बहादुरी आ स्वाभिमान के जतना बड़ाई कइल जाव, कमे कहाई. ए घटिया शब्द के वकालत करेवालन के ई काहें ना बुझाला कि खुद अंग्रेजिए में 20 प्रतिशत शब्द ओकर बा आ शेष 80 प्रतिशत विश्व के अउर भषन के. तब ओकरा के कहल जाई ‘इंविश्व’? कवनो अइसन भाषा नइखे, जवना में बिदेशी शब्दन के प्रयोग सँकारल नइखे गइल. हमनी किहाँ लमटेन, रेल, अस्पताल, गिलास, बर्तन, कुर्सी, कफन, गबन, टेबुल,...

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राष्ट्र प्रेम के एगो गीत

मान  बढ़ाईं  जा माटी के    रामरक्षा मिश्र विमल दुअरा अंगना कहिया छिटकी मधुर किरिनिया भोर के कहिया  पन्ना  पलटल जाई  भारत माँ के  लोर के ?   तमिल तेलगू बङला हिन्दी सब  ह  भारत  के  भाषा अपना जगह  सभे  कंचन बा  एको  ना  बाटे  काँसा हिन्दू  मुस्लिम  सिक्ख  ईसाई  भारत  सबके जोर के ।   दाँतकटउवल रोटी  में  कइसे  ई  जहर  घोराइ गइल धरम नाम पर मार काट बुधिया बा कहाँ बिलाइ गइल आग लगावल  के  ई  सगरो  बूतल अहड़ा  खोर के ?   तूरल फारल मारल काटल  कब ले  बन्न  कइल जाई जाति धरम पर अलगा बिलिगी कहवाँ ले होखल जाई महल बनेला  खाँड़ा  सोगहग  ईंटा  ईंटा  जोरि  के ।   आईं  हमनीं सभ बइठीं  सुख दुख आपन बतियाईं जा घरफोरवा बा  के  हमनी के  ओकर पता  लगाईं जा मान  बढ़ाईं  जा माटी के  भेद भाव  सभ  छोड़ि के...

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‘गोवर्धन पूजा’ आ ‘गोधन’ के बधाई आ शुभकामना

भोजपुरिका का ओर से रउँआ सभ के ‘गोवर्धन पूजा’ आ ‘गोधन’ के बधाई आ बहुत-बहुत शुभकामना. (गोधन के फोटो jagran.com से साभार)    ...

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नीक-जबून- 3

डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल के डायरी दीया-दियरी के दिन बहुरल तीन-चार दिन पहिले कपड़ा-ओपड़ा कीने खातिर निकलल रहीं जा. प्लेटफॉर्म प चढ़ते जवन लउकल, ओसे त चका गइलीं हम. जहाँ एक दिन पहिलहूँ खोजला पर पिछला जनम के दिया-दियरी मिलेले आ ऊहो जइसन-तइसन, ओहिजा रेलवे स्टेशन पर कई गो दियरी, रूई के बाती आ माचिस एक साथ पैक कइके मिल रहल बा आ ऊहो जगह-जगह पर. धन्य बाड़े भारतीय, भावना में बहिहें त सभ पीछा आ वैचारिकता में त पुछहीं के नइखे, दुनिया लोहा मानेले. नीक लागल. आतंकवाद केहूके भावे ना. चीन का उल्टा चलला के ई नतीजा ह कि बाजार के रुख बदलि गइल. अब बाजारो के सोचेके परी कि “जनविरोधी आ राष्ट्रविरोधी काम कइलऽ कि गइलऽ.” अब ना चाहीं केहूके चाक-चीक, दिये-दियरी से हमनी के काम चलि जाई. चलीं, अनासे एगो बड़हन काम हो गइल. कोंहार अपना शिल्पकला के कोसत-कोसत छोड़ेके स्थिति में आ गइल रहले हा. जइसहीं दीया-दियरी के दिन बहुरल कि उनुकरो मन हरियरा गइल आ अब त चानिये चानी बा. साँच कहीं त बरियार आदिमी ना होखे. समय होखेला. समये घाव देला आ ऊहे भरबो करेला. दिवाली के परब नगिचाइल बा बाकिर मन में ऊ उत्साह नइखे. मन नइखे होत कि टीवी के समाचार देखल जाव. एगो डर समाइले रहता. सीमा पर भा कश्मीर से कवनो दुखदायी खबर जनि आओ. अइसना में जब केहूँ पाकिस्तानियन के तरफदारी करेला भा असहिष्णुता के बात करेला त...

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नीक-जबून-2

            डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल के डायरी जरूरी बा भोजपुरी के स्वाभिमान से जोड़ल       ओइसे त बहुत पहिले से संविधान का आठवी अनुसूची में भोजपुरी के डलवावे के माङ भोजपुरिया करत बाड़न बाकिर एने दु-एक बरिस से त जइसे बाढ़ि आ गइल बा. बहुत लोग एकर श्रेय लिहल चाहता. साइत एही कारन सोशलो साइट पर कई गो दल जागरन ना त धरना अभियान जारी रखले बाड़न. हम सभके लाइक क दिहींले, काहेंकि एमें फायदा ढेर लउकेला. नयो पीढ़ी अब कूदे लागल बिया एमें. बड़-बड़ शहरो में अब लइका लजात नइखन सऽ झंडा उठावे में. जय भोजपुरी. एकरे त जरूरत बा आजु. साँच पूछीं त हम तरसि जाईंले कई बेरि भोजपुरी बोले खातिर. अहिंदी प्रदेश में बड़ा हिचकेले लोग भोजपुरी बोले में. भोजपुरी बोलत-बोलत हिंदी बोले लागेला लोग आ ना त कबो-कबो साँय-साँय बोले लागेलन. साइत डेराला लोग कि केहू गँवार जनि कहि देउ. बाकिर हमरा त एकरो से बरियार कारन बुझाला भोजपुरिया लोगन के परम उदारता आ अपना के महान लोगन का लिस्ट में जोड़वावे के सनक. दोसरा के चीज के नीमन आ अपना चीज के बाउर बतवला से आदिमी निष्पक्ष हो जाला नू ! असली बात त ई बा कि उदारता आ मूर्खता में ढेर अंतर ना होखे, खाली चेतना का कमी भा होखला से रूप बदल जाला. आपन पहिचान बदले के कोशिश से हीन ग्रंथि ना घटी भाई. अपना पहिचान के सुघर,...

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प्रीत के गीत हरदम सुनाइले हम

– लव कान्त सिंह बा अन्हरिया कबो त अंजोरिया कबो जिनगी में घाम बा त बदरिया कबो प्रेम रोकला से रुकी ना दुनिया से अब होला गोर से भी छोट चदरिया कबो उजर धब-धब बा कपड़ा बहुत लोग के दिल के पहचान हो जाला करिया कबो मिले आजा तू बंधन सब तुड़ के जईसे नदी से मिलेले दरिया कबो प्रीत के गीत हरदम सुनाइले हम दिल के खोलs तुहूँ केंवरिया कबो दिल में राखब राधा बनाके तोहे तुहूँ मानs “लव” के संवरिया...

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