– डॉ. हरेश्वर राय हमार सान ह हमार पहचान ह भोजपुरी, हमार मतारी ह हमार जान ह भोजपुरी। इहे ह खेत, इहे खरिहान ह इहे ह सोखा, इहे सिवान ह, हमार सुरुज ह हमार चान ह भोजपुरी। बचपन बुढ़ापा ह, इहे जवानी चूल्हा के आगि ह, अदहन के पानी, हमारपूरा पढ़ीं…

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– डॉ. कमल किशोर सिंह (1) पाला साल बीतते फेरु से पडे़ लागल जाड़ा. लागेला हमरा के मारी देलस पाला. मन घास पात अस मऊरा कठुआ जाला रूई आ धुईं से ना मन गरमाला. देखते ही बहरी देह बऱफ बन जाला. कहाँ जाई , का करीं, कुछो ना बुझाला .पूरा पढ़ीं…

– जयशंकर प्रसाद द्विवेदी ललछौंहा कवनों फोड़ा टीसत रहे कुलबुलात रहलें चोरी चुपके परजीवी कृमि चीरा लगते अंउजाइल बहरियाए लगलें । तीखर घामे दँवकल भीत जुड़ाले पेटे पेट अदहन अस भइल बात कबो ना सिराले मुँह से लार अस टपक जाले । पजरे क परतीत साँच ना होले मनई बहरूपियापूरा पढ़ीं…

लिटी-चोखा – डॉ. कमल किशोर सिंह आहार अनोखा लिटी चोखा का महिमा हम बखान करीं. ई ‘बर्बाकिउ बिचित्र बिहारी’ बेहतर लागे घर से बहरी, दुअरा-दालान, मेला-बाज़ार, कहंवो  कोना  में  छहरी. नहीं  चुहानी  चौका-बर्तन बस चाही गोइठा-लकड़ी. मरदो का मालूम मकुनी में मर-मसाला कवन परी. आलू, प्याज, टमाटर, बैगन बनेला चोखापूरा पढ़ीं…

– अशोक द्विवेदी ओढ़नी पियर, चुनरिया हरियर / फिरु सरेहि अगराइल जाये क बेरिया माघ हिलवलस, रितु बसन्त के आइल! फुरसत कहाँ कि बिगड़त रिश्ता, प्रेम पियाइ बचा ले सब, सबका पर दोस मढ़े अरु मीने-मेख निकाले सीखे लूर नया जियला के, उल्टे बा कोहनाइल !! क्रूर-समय का अँकवारी में,पूरा पढ़ीं…

(वसन्त पंचमी, 1ली फरवरी 2017, प मंगल कामना करत) – अशोक द्विवेदी कठुआइल उछाह लोगन के, मेहराइल कन -कन कवन गीत हम गाईं बसन्ती पियरी रँगे न मन !! हर मजहब के रंग निराला राजनीति के गरम मसाला खण्ड खण्ड पाखण्ड बसन्ती चटकल मन – दरपन !! गठबन्धन के होयपूरा पढ़ीं…

– नीमन सिंह बतइब हो हम का करीं….. कइसे करीं कइसे रहीं का खाई का पहिनी ? बतइब हो हम का करीं…. कहवां मूती कहवां हगीं केकरा संगे बात बिचारी बतइब हो हम का करीं….. केहू कहे हई करs केहू कहे हउ करs केहू कहे मउज करs बतइब हो हमपूरा पढ़ीं…

– जयशंकर प्रसाद द्विवेदी आजु निकहे बिखियाइल बानी माई बचवन पर नरियात नरियात लयिकवो मुरझा गईलें आँखिन के लोर थम्हात नइखे फेरु अझुराइल नोचब बकोटब खिलखिलात, हंसत, मुस्कियात केतना रंग , केतना रूप . झुंझलात, अकबकात कुछो अभियो थम्हल नइखे गुरमुसाइल बोल गइनी माई जहवाँ जात बा आपन लौछार देखापूरा पढ़ीं…

– जयशंकर प्रसाद द्विवेदी टीभी के परिचरिचा देखs अस लागे, गोंइठा घी सोखे। आन्हर कुकुर बतासे भूंके।। मिलत जुलत सभही गरियावत पगुरी करत सभे भरमावत पुतरी नचावत मुँह बिरावत एहनिन के अब मुँह के रोके। आन्हर कुकुर बतासे भूंके।। छऊँक लगावत खबर बनावत दिन में सई सई बार चलावत इतपूरा पढ़ीं…

– शिवानन्द मिश्र रामजी के प्यारा ह, कृष्ण के दुलारा ह, बाबा विसवामीतर के आंखी के तारा ह। बोले में खारा ह, तनीकी अवारा ह, गंगाजी के धारा के नीछछ किनारा ह। गौतमदुआरा ह, भोज के भंडारा ह, सोन्ह गमकेला जइसे दही में के बारा ह। हिन्द के सितारा ह,पूरा पढ़ीं…

– जयशंकर प्रसाद द्विवेदी कोइला से पटरी पचरल ले के शीशी घोटल सांझी खानि घरे मे माई ले रगड़ के मुंहो पोछल बा के इहवाँ जे दुलराइल नइखे । माई के झिड़की खातिर माटी मे सउनाइल खाड़ हँसे बाबूजी बबुआ बा भकुयाइल अब्बो ले भुलाइल नइखे । लुका छिपी आइसपूरा पढ़ीं…