जन्म: 01 जुलाई 1936, बलिया जिला के बलिहार गाँव में। श्रीमती बबुना देवी आ श्री घनश्याम मिश्र क एकलौता पुत्र । शिक्षा: प्राथमिक शिक्षा गाँव में, माध्यमिक गोरखपुर में आ उच्च शिक्षा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी में । ‘‘नवजागरण के सन्दर्भ में हिन्दी पत्रकारिता का अनुशीलन’’ विषय पर शोध आपूरा पढ़ीं…

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– अशोक द्विवेदी लोकभाषा भोजपुरी में अभिव्यक्ति के पुरनका रूप, अउर भाषा सब नियर भले वाचिक (कहे-सुने वाला) रहे बाकिर जब ए भाषा में लिखे-पढ़े का साथ साहित्यो रचाये लागल तब एह भाषा के साहित्य पढ़े वालन क संख्या ओह हिसाब से ना बढ़ल, जवना हिसाब से एकर बोले-बतियावे वालनपूरा पढ़ीं…

– डॉ अशोक द्विवेदी हम भोजपुरी धरती क सन्तान, ओकरे धूरि-माटी, हवा-बतास में अँखफोर भइनी। हमार बचपन आ किशोर वय ओकरे सानी-पानी आ सरेहि में गुजरल । भोजपुरी बोली-बानी से हमरा भाषा के संस्कार मिलल, हँसल-बोलल आ रोवल-गावल आइल। ऊ समझ आ दीठि मिलल, जवना से हम अपना गँवई लोकपूरा पढ़ीं…

[et_pb_section bb_built=”1″ admin_label=”section”][et_pb_row admin_label=”row”][et_pb_column type=”2_3″][et_pb_text admin_label=”Text” background_layout=”light” text_orientation=”left” use_border_color=”off” border_color=”#ffffff” border_style=”solid”] – अशोक द्विवेदी कोइला में हीरा हेराइल कुफुत में जिनिगिया ओराइल बलमु तोहें कुछ ना बुझाइल !! असरा के ढेंढ़ी तनिक ना गोटाइल बनउर से सपनन क फूल बिधुनाइल करजा क सूद गढ़ुआइल बलमु तोहें कुछ ना बुझाइल !!पूरा पढ़ीं…

– अशोक द्विवेदी 【 एक 】 रसे – रसे महुआ फुलाइल हो रामा उनुका से कहि दs ! रस देखि भँवरा लोभाइल हो रामा उनुका से कहि द s ! पुलुई चढ़ल फिरु उतरल फगुनवा कुहुँकि कुहुँकि ररे बेकल मनवाँ सपनो में चैन न आइल हो रामा उनुका से कहिपूरा पढ़ीं…

– डॉ अशोक द्विवेदी कविता के बारे में साहित्य शास्त्र के आचार्य लोगन के कहनाम बा कि कविता शब्द-अर्थ के आपुसी तनाव, संगति आ सुघराई से भरल अभिव्यक्ति हऽ। कवि अपना संवेदना आ अनुभव के अपना कल्पना-शक्ति से भाषा का जरिये कविता के रूप देला। कवनो भाषा आ ओकरा काव्य-रूपनपूरा पढ़ीं…

– अशोक द्विवेदी ओढ़नी पियर, चुनरिया हरियर / फिरु सरेहि अगराइल जाये क बेरिया माघ हिलवलस, रितु बसन्त के आइल! फुरसत कहाँ कि बिगड़त रिश्ता, प्रेम पियाइ बचा ले सब, सबका पर दोस मढ़े अरु मीने-मेख निकाले सीखे लूर नया जियला के, उल्टे बा कोहनाइल !! क्रूर-समय का अँकवारी में,पूरा पढ़ीं…

(वसन्त पंचमी, 1ली फरवरी 2017, प मंगल कामना करत) – अशोक द्विवेदी कठुआइल उछाह लोगन के, मेहराइल कन -कन कवन गीत हम गाईं बसन्ती पियरी रँगे न मन !! हर मजहब के रंग निराला राजनीति के गरम मसाला खण्ड खण्ड पाखण्ड बसन्ती चटकल मन – दरपन !! गठबन्धन के होयपूरा पढ़ीं…

(भोजपुरी गीत) – डा. अशोक द्विवेदी भीरि पड़ी केतनो, न कबों सिहरइहें.. रोज-रोज काका टहल ओरियइहें! भोरहीं से संझा ले, हाड़ गली बहरी जरसी छेदहिया लड़ेले सितलहरी लागे जमराजो से, तनिक ना डेरइहें! रोज-रोज काका टहल ओरियइहें! गोरखुल गोड़वा क,रोज-रोज टभकी दुख से दुखाइ सुख, एने-ओने भटकी निनियों में अकर-बकर,पूरा पढ़ीं…

(ललित-व्यंग) – डा0 अशोक द्विवेदी आदमी आखिर आदमी हs — अपना मूल सोभाव आ प्रवृत्तियन से जुड़ल-बन्हाइल। मोह-ममता के लस्का आ कुछ कुछ आदत से लचार। ओकर परम ललसा ई हवे कि ऊ तरक्की करो आ सुख से रहो ! ई सुखवो गजब क चीझु ह s। एकरा खातिर लोगपूरा पढ़ीं…

– अशोक द्विवेदी ना जुड़वावे नीर जुड़-छँहियो में, बहुत उमस लागे. चैन लगे बेचैन, देश में बरिसत रस नीरस लागे! बुधि, बल, बेंवत, चाकर… पद, सुख, सुविधा, धन, पदवी के लाज, लजाले खुदे देखि निरलज्ज करम हमनी के बुढ़वा भइल ‘सुराज’ नया बदलावो जस के तस लागे चैन लगे बेचैन,पूरा पढ़ीं…