डॉ अशोक द्विवेदी ‘कबीर कूता राम का/मुतिया मेरा नाउँ। गले राम की जेंवड़ी/जित खैंचे, तित जाउँ।।’ कबीर उत्तर भारत के अइसन फक्कड़ मौला सन्त रहलन, जे अपना सहज लोकचर्या आ ठेठ बोली-भाषा के कारन सबसे अलग पहिचान बनवलन। उनका कविता में ‘अनुभूत सत्य’ का प्रेम पगल भक्ति के अलावा अगरपूरा पढ़ीं…

Advertisements

गंगा प्रसाद ‘अरुण’ जा हो निझाइल जवानी! एह भरल बसंत के भोरहरिया में इयादो आवे के रहले त रामेटहल काका आ कपार पर चकरघिन्नी खात उनकर कहटर पुरान! असल में अभी निनिआइले रहीं कि सुतले-सुतले सुरता पर चढ़ गइले भोजपुरी के अमर गायक खलील जी अपना पूरा लय-सुर में भोलानाथपूरा पढ़ीं…

जे भोजपुरी में, भोजपुरी खातिर, बिना लोभ-लालच आ मान-प्रतिष्ठा के परवाह कइले बरिसन से चुपचाप रचनात्मक काम कर रहल बा आ कइले जा रहल बा, ओके नजरअन्दाज कइ के, एक-दूसरा के टँगरी खींचे वाला ई कथित भोजपुरी-हित चिंतक मठाधीशे लोग बा। हमरा त चिंता होला कि भोजपुरी के कबो अगर मान्यता मिल गइल आ ओकरा नाँव पर पढ़े-पढ़ावे भा पुरस्कार-सम्मान के इन्तजाम होइयो गइल त ओकरा बाद के स्थिति केतना बिद्रूप आ भयंकर होई? तब त एक दोसरा क कपार फोरे में ना हाथ लउकी, ना ढेला।

– अशोक द्विवेदी लोकभाषा भोजपुरी में अभिव्यक्ति के पुरनका रूप, अउर भाषा सब नियर भले वाचिक (कहे-सुने वाला) रहे बाकिर जब ए भाषा में लिखे-पढ़े का साथ साहित्यो रचाये लागल तब एह भाषा के साहित्य पढ़े वालन क संख्या ओह हिसाब से ना बढ़ल, जवना हिसाब से एकर बोले-बतियावे वालनपूरा पढ़ीं…

– भगवती प्रसाद द्विवेदी भोजपुरी आन्दोलन के संगठनात्मक अगुवाई आ सिरिजना के अभूतपूर्व ऊँचाई देबेवाला शख्सियत के नाँव ह – आचार्य पाण्डेय कपिल। एक ओर ‘फुलसुंघी’ जइसन जियतार – यादगार उपन्यास के कामयाबी, उहँवें गीत, ग़ज़ल, दोहा के दुनिया में मील के पाथर गढ़ेवाला व्यक्तित्व। सन् 1970 से ग़ज़ल-लेखन मेंपूरा पढ़ीं…

– आचार्य विद्यानिवास मिश्र भोजपुरी में लिखे के मन बहुते बनवलीं त एकाध कविता लिखलीं, एसे अधिक ना लिखि पवलीं। कान सोचीलें त लागेला जे का लिखीं, लिखले में कुछ रखलो बा! आ फेरो कइसे लिखीं? मन से न लिखल जाला! आ मन-मानिक होखो चाहे ना होखो-हेरइले रहेला, बेमन सेपूरा पढ़ीं…

– डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल साइते केहू भोजपुरिहा होई जे “अंगुरी में डँसले बिया नगिनिया रे, ए ननदी सैंया के जगा द.” आ “सासु मोरा मारे रामा बाँस के छिउँकिया, ए ननदिया मोरी रे सुसुकत पनिया के जाय.” जइसन पुरबी के लोकप्रिय धुनन से परिचित ना होई. ‘पुरबी’ धुन केपूरा पढ़ीं…

– डॉ अशोक द्विवेदी कविता के बारे में साहित्य शास्त्र के आचार्य लोगन के कहनाम बा कि कविता शब्द-अर्थ के आपुसी तनाव, संगति आ सुघराई से भरल अभिव्यक्ति हऽ। कवि अपना संवेदना आ अनुभव के अपना कल्पना-शक्ति से भाषा का जरिये कविता के रूप देला। कवनो भाषा आ ओकरा काव्य-रूपनपूरा पढ़ीं…

– भगवती प्रसाद द्विवेदी आजु जब खेती-किसानी में जीव-जाँगर आ जिनिगी खपावेवाला गरीब किसान खुदकुशी करे खातिर अलचार हो जात बाड़न, त एह निठुर समय में एगो अइसन ऋषि रचनाकार के बरबस इयाद आवत बा, जे ताजिनिगी गाँव के तंगहाल मजूर-किसान के जरत-बरत मुद्दन के अपना सम्पूर्ण रचनाशीलता के मार्फतपूरा पढ़ीं…

– डॉ ब्रजभूषण मिश्र भाषा सब अइसन भोजपुरी साहित्य में बेसी कविते लिखल जा रहल बा. दोसर-दोसर विधा में लिखे वाला लोग में शायदे केहू अइसन होई, जे कविता ना लिखत होई. एही से कविता के जरिये भोजपुरी में साहित्य लेखन के दशा-दिशा, प्रवृति-प्रकृति के जानल-समझल जा सकत बा. साहित्यपूरा पढ़ीं…

– डॉ अशोक द्विवेदी लोकभाषा में रचल साहित्य का भाव भूमि से जुड़े आ ओकरा संवेदन-स्थिति में पहुँचे खातिर,लोके का मनोभूमि पर उतरे के परेला। लोक कविताई के सौन्दर्यशास्त्र समझे खातिर लोकजीवन के संस्कृति, लोकदृष्टि ओकरा अनुभव-सिद्ध मान्यता आ संवेदन-ज्ञान के समझल जरूरी बा। अक्सरहा एघरी,कुछ लोग भोजपुरी साहित्य आपूरा पढ़ीं…