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बतकुच्चन – ३९

December 20, 2011 OmPrakash Singh 3

कहल जाला कि तुलसीदास लिख गइल बानी कि “कूदे फाने तूड़े तान, वाके दुनिया राखे मान”. तुलसीदास का जमाना में लोकतंत्र त रहे ना बाकिर […]

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बतकुच्चन – ३८

December 12, 2011 OmPrakash Singh 3

पिछला दिने एगो सम्मानित पाठक के टिप्पणी आइल रहे कि भोजपुरी में श के इस्तेमाल ना होला. उहाँ के भोजपुरी के बढ़िया जानकार हईं आ […]

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बतकुच्चन – ३६

December 7, 2011 OmPrakash Singh 1

पिछला बेर बँड़ेरी के चरचा पर बात खतम भइल रहे. बँड़ेरी ओह लकड़ी के बीम के कहल जाला जवन कवनो छान्हि भा पलानी के बीच […]

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बतकुच्चन – ३५

November 30, 2011 OmPrakash Singh 1

बाँझ का जनिहें प्रसवती के पीड़ा ? बच्चा जने में होखे वाला दरद ओही औरत के समुझ में आ सकेला जे कबो खुद बच्चा जनले […]

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बतकुच्चन – ३४

November 30, 2011 OmPrakash Singh 3

आजु जब लिखे बइठल बानी त छठ व्रत के परसाद सामने आ खरना शब्द दिमाग में बा. खरना मतलब खरो ना, कवनो तिनको ना. अइसन […]

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बतकुच्चन – ३३

November 22, 2011 OmPrakash Singh 1

बोले वाला बोलता आ चुप रहे वाला चुप्पा कहाला. बाकिर चुप्पा अतना आसान ना होले. कई बेर त ऊ चुप्पा शैतान होला. ढेला मार के […]

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बतकुच्चन – ३२

November 7, 2011 OmPrakash Singh 0

एने कई दिन से अपना बिधुनाइल मन का चलते कुछ लिख ना पवले रहीं बाकिर काल्हु जब एक आदमी के धुनाइल देखनी त बतबनवा मन […]

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बतकुच्चन – ३

October 18, 2010 OmPrakash Singh 0

एगो चर्चा में शब्द आ गइल कि रउरा त नायक हईं. बस मन में बिजली जस चमक उठल कि नायक के होला, नायक का ह […]