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बतकुच्चन – १६

June 24, 2011 OmPrakash Singh 0

समय त हमेशा बदलत रहेला. ना बदलल त ऊ समय कइसे कहल जाई. बाकिर जब कवनो बदलाव अचके में भा तेजी से हो जाव त […]

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बतकुच्चन – १५

June 19, 2011 OmPrakash Singh 3

पुरनका जमाना में रनिवासन में रानी लोग के खटवास-पटवास धरे खातिर एगो अलगे कक्ष भा भवन रहत रहे जवना के कोप भवन कहाव आ जहाँ […]

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बतकुच्चन – १४

June 8, 2011 OmPrakash Singh 2

जमाना औचक चहुँप के भौचक करे के चल रहल बा त सोचनी आजु एही चक पर कुछ बकचक कइल जाव. चक कहल जाला जमीन के […]

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बतकुच्चन – १३

June 1, 2011 OmPrakash Singh 1

पहुँचा कहल जाला हाथ का हथेली के जोड़ वाली जगह, कलाई के भा मणिबन्ध के. आ पहूँची कहल जाला एगो खास तरह के गहना के […]

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बतकुच्चन – १२

May 24, 2011 OmPrakash Singh 0

तेरह तारीख के चुनाव परिणाम सुनत एगो बाति दिमाग में घूमे लागल. बंगाल में दीदी जीत गइली, तमिलनाडु में अम्मा. राजनीति में सत्ता के गलियारन […]

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बतकुच्चन – ११

May 16, 2011 OmPrakash Singh 0

पिछला हफ्ता गोबर पथार के बात निकलल रहे त अबकी खर पतवार दिमाग में आ गइल बा. खर पतवार का बारे में सोचते दिमाग में […]

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बतकुच्चन – १०

May 8, 2011 OmPrakash Singh 0

आजु पता ना काहे मन अँउजाइल बा. लागत बा कि कंठ में कुछ अटकल बा अँउजार जइसन. आ कंठ का भीतर कुछ अटकल होखे त […]

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बतकुच्चन – ९

May 1, 2011 OmPrakash Singh 1

मैंने कहा. हमने कहा. तुमने कहा, उसने कहा, राम ने कहा. अरे भाई का कहा आ काहे कहा ? आ आजु आप हिन्दी काहे छाँटे […]

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बतकुच्चन – ८

April 24, 2011 OmPrakash Singh 2

पिछला हफ्ता के तिकवत तिवई का बाद आजु सोचत बानी कि अकसर आ अकसरुआ के बाति कर लीं. अब अकसरुआ त उहे नू कहाई जे […]

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बतकुच्चन – ७

April 10, 2011 OmPrakash Singh 1

कुछ दिन पहिले एगो साहित्यकार बंधु के फोन आइल रहुवे. उहाँ के जानल चाहत रहीं कि तिवई के मतलब का होला. शब्द के अर्थ ओकरा […]

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बतकुच्चन – ६

March 6, 2011 OmPrakash Singh 0

सोचत बानी कि लोग कहत होखी कि ई अनेरे अतना बतकुच्चन कइले रहेला. जरुरे अनेरिया आदमी होखी जेकरा लगे दोसर कवनो काम नइखे. बाकिर का […]

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बतकुच्चन – ५

February 13, 2011 OmPrakash Singh 0

“करे केहू भरे केहू”. पुरान कहावत हऽ अब एकर टटका उदाहरण सामने आइल बा. घोटाला करे वालन के त पता ना का होई बाकिर आम […]