समाज, संस्कृति आउर सभ्यतन के बनावे आ जोगावे में महिला लोगन के योगदान हमेसा से रहल बा. बात भाषा के होखे भा संस्कृति के, महिला लोग एकरा हमेसा से भरले-पूरले बा. महिला लोगन के योगदान हर भाषा, सभ्यता आउर संस्कृति में रहल बा. महिला लोगन के एही योगदान के बटोरेपूरा पढ़ीं…

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डॉ अशोक द्विवेदी एगो जमाना रहे कि ‘पाती’ (चिट्ठी) शुभ-अशुभ, सुख-दुख का सनेस के सबसे बड़ माध्यम रहे। बैरन, पोस्टकार्ड, अन्तर्देशी आ लिफाफा में लोग नेह-छोह, प्रेम-विरह, चिन्ता-फिकिर, दशा-दिशा आ परिस्थिति-परिवेश पर अपना हिरदया के उद्गार लिखि के भेजे । कबो-कबो त ‘पाती’ जेतना लिखनिहार का लोर से ना भींजे,पूरा पढ़ीं…

रामरक्षा मिश्र विमल भोजपुरी दू डेग आगे त हिंदी दू डेग पाछे हिंदी के कुछ तथाकथित विद्वान एह घरी भोजपुरी पर आपन-आपन ब्रह्मास्त्र चलावे में लागल बा लोग. ऊहन लोग में ई डर समा गइल बा कि भोजपुरी के जहाँ संविधान का आठवीं सूची में जगह मिलल कि हिंदी सतनासपूरा पढ़ीं…

नई दिल्ली में साहित्य अकादेमी का सभागार रवीन्द्र भवन में भोजपुरी के मशहूर लिखनिहार डॉ अशोक द्विवेदी के लिखल आलोचना के किताब के विमोचन पुरनिया लिखनिहार आ साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष रह चुकल आचार्य विश्वनाथ तिवारी जी का हाथे कइल गइल. एह मौका पर भइल बतकही में मशहूर कथाकारनी डॉपूरा पढ़ीं…

भोजपुरी के मशहूर आ प्रतिष्ठित लिखनिहार डॉ अशोक द्विवेदी जी के लिखल किताब “भोजपुरी रचना आ आलोचना” के विमोचन 29 अक्टूबर 2019, मंगल का दिने दिल्ली में साहित्य अकादेमी के सभागार में होखे जा रहल बा. फिरोजशाह मार्ग पर बनल रवीन्द्र भवन के एह सभागार के तीसरा माला पर मौजूदपूरा पढ़ीं…

दू दिन पहिले विमल जी के पत्रिका सँझवत के जानकारी आ सामग्री मिलल. एने कई एक महीना से हम थाकल महसूसत बानी जवना चलते अब अँजोरिया भा एकरा दोसरा साईटन पर नया सामग्री नइखीं दे पावत. थाकल मन एहू चलते बा कि भोजपुरी में लंगड़ी गईया के अलगे बथान केपूरा पढ़ीं…

दिनेश पाण्डेय उहाँ का सँगहीं रहनीं। बइठार रहे त चलीं सउदा-सुलुफ का सँगे कुछ मटरगस्तियो हो जाई, एक पंथ दुइ काज। तय भइल जे किराना बाजार मुँहें चलल जाई, फेरू सब्जीहाट होते हुए लवटि आवल जाई। अब दु अदिमी सँगे चले आ चुप रहे भा एगो बोलते जाय आ दोसरकापूरा पढ़ीं…

डॉ. हरेश्वर राय सियासी छेनी से कालिमा तरासल बिया I चांदनी हमरा घर से निकासल बिया II भोर के आँख आदित डूबल बा धुंध में I साँझ बेवा के मांग जस उदासल बिया II सुरसरी के बेदना बढ़ल बा सौ गुना I नीर क्षीर खाति माछरि भुखासल बिया II कोंपलनपूरा पढ़ीं…

– ऋचा चलऽ, फेरु सपनन के फेंड़ लगाईं जा ! मउरल-दनात अमराई से अलगा सड़की का गुलमुहरन का नीचे लुकवा दीं जा कूल्हि पुरान योजना हरियर सुतरी अस लटकत सहजन का झोंप में बान्हि आईं जा आपन चाह-चिन्ता जवन होई, तवन होई आवऽ रेंगनी का काँटन से लथरल जथारथ मेंपूरा पढ़ीं…

– आनन्द संधिदूत जब आँगन का बीच में डँड़वार आ खेत का बीच में सड़क निकललि त खेत क बगड़ी आँगन का गउरइया किहें आके कहलसि कि लऽ ए बहिनी तोहके त आराम हो गइल एक बखरी से दू बखरी हो गइल दूनो ओर दाना-दूनी, जूठ-कांठ गिरी आ तोहार बालपूरा पढ़ीं…

आनन्द संधिदूत एही दीयर में बा हमरो खेत क एगो छोट-मोट टुकड़ा जवन हम देखले नइखीं। ओही खेत क गोजई-रहिला जब हमरा आँगन में गिरे त हमार माई ओइसहीं खुस हो जाय जइसे कवनो लइका खेलवना पाके अगरा जाला ऊ कुछ झारे कुछ झूरे कुछ कूटे कुछ पीसे कुछ अँगऊपूरा पढ़ीं…