दू दिन पहिले विमल जी के पत्रिका सँझवत के जानकारी आ सामग्री मिलल. एने कई एक महीना से हम थाकल महसूसत बानी जवना चलते अब अँजोरिया भा एकरा दोसरा साईटन पर नया सामग्री नइखीं दे पावत. थाकल मन एहू चलते बा कि भोजपुरी में लंगड़ी गईया के अलगे बथान केपूरा पढ़ीं…

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जे भोजपुरी में, भोजपुरी खातिर, बिना लोभ-लालच आ मान-प्रतिष्ठा के परवाह कइले बरिसन से चुपचाप रचनात्मक काम कर रहल बा आ कइले जा रहल बा, ओके नजरअन्दाज कइ के, एक-दूसरा के टँगरी खींचे वाला ई कथित भोजपुरी-हित चिंतक मठाधीशे लोग बा। हमरा त चिंता होला कि भोजपुरी के कबो अगर मान्यता मिल गइल आ ओकरा नाँव पर पढ़े-पढ़ावे भा पुरस्कार-सम्मान के इन्तजाम होइयो गइल त ओकरा बाद के स्थिति केतना बिद्रूप आ भयंकर होई? तब त एक दोसरा क कपार फोरे में ना हाथ लउकी, ना ढेला।

लोकरंजन आ सांस्कृतिक गीत-गवनई के बढ़ावा देबे खातिर पाती कला मंच आ भोजपुरी दिशाबोध के पत्रिका पाती का ओर से नयी दिल्ली के दीनदयाल मार्ग, आईटीओ, पर स्थित राजेन्द्र भवन ऑडिटोरियम में शनिचर 15 सितम्बर का दिने साँझ पाँच बजे से साढ़े आठ बजे ले एगो सांस्कृतिक आयोजन राखल गइलपूरा पढ़ीं…

दिल्ली के संसद मार्ग पर होई भोजपुरिया जुटान भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता आ आठवीं अनुसूची में शामिल करावे खातिर पूर्वांचल एकता मंच, भोजपुरी जन जागरण अभियान, अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन, अखिल भारतीय भोजपुरी लेखक संघ आ रंगश्री के संयुक्त तत्वावधान में 7अगस्त, 2018 दिन मंगलवार के विशाल धरना प्रदर्शनपूरा पढ़ीं…

“हँसी, ठिठोली, बोली आ बेवहार गजब बा, भोली सूरत, रहन-सहन, तेवहार गजब बा” भोजपुरी के मूर्धन्य कवि अउऱ गायक संगीत सुभाष जी के एह पंक्तियन का साथे कार्यक्रम के समहुत भइल आ एकरा साथे-साथ शशि अनाड़ी, अजय प्रकाश तिवारी, अउर विनोद गिरी के गावल गानो के श्रोता लोग के भरपूरपूरा पढ़ीं…

24 फरवरी के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, मैक्स मुलर मार्ग, नई दिल्ली में विश्व भोजपुरी सम्मेलन के राष्ट्रीय कार्यकारणी के बइठक आ अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर विचार गोष्ठी भइल. हिन्दी में भेजल एह बइठक के रपट के भोजपुरी अनुवाद नीचे दीहल जा रहल बा. भोजपुरी के संस्थन के अतना फुरसत नापूरा पढ़ीं…

– डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल बड़की बलिहार आ नदिया के पार आजुए रामेंद्र के फोन आइल रहल हा कि बड़की बलिहार गइल रहलीं हा. नाँव सुनते ‘नदिया के पार’ फिल्म के याद आ गइल. एह सुपरहिट फिल्म के कहानी ओही गाँव के हटे. लोग कहेला कि एकदम साँच. केशव प्रसादपूरा पढ़ीं…

– डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल बोले खातिर बोलल जब से नोकरी के शुरुआत भइल तबे से देखत आ रहल बानी. आजु तक एहमें कवनो कमी नइखे आइल, बढ़ंतिए भइल बा. जरूरत खातिर बोलेवाला कम मिलले. लोग बूझसु कि हमहूँ बोलींले, अइसने लोग ढेर लउकले. जब-जब जाएके परेला सेवाकालीन प्रशिक्षण शिविरपूरा पढ़ीं…

– जयशंकर प्रसाद द्विवेदी ललछौंहा कवनों फोड़ा टीसत रहे कुलबुलात रहलें चोरी चुपके परजीवी कृमि चीरा लगते अंउजाइल बहरियाए लगलें । तीखर घामे दँवकल भीत जुड़ाले पेटे पेट अदहन अस भइल बात कबो ना सिराले मुँह से लार अस टपक जाले । पजरे क परतीत साँच ना होले मनई बहरूपियापूरा पढ़ीं…

– डॉ प्रकाश उदय भइया हो, (पाती के संपादक) जतने मयगर तूँ भाई, संपादक तूँ ओतने कसाई। लिखे खातिर तहरा दिकदिकवला के मारे असकत से हमार मुहब्बत बेर-बेर बीचे में थउस जाला, बाकिर तवना खातिर तहरा मने ना कवनो मोह ना माया। के जाने कवन कुमुर्खी तहरा घेरले बा किपूरा पढ़ीं…

– डॉ अशोक द्विवेदी हम भोजपुरी धरती क सन्तान, ओकरे धूरि-माटी, हवा-बतास में अँखफोर भइनी। हमार बचपन आ किशोर वय ओकरे सानी-पानी आ सरेहि में गुजरल । भोजपुरी बोली-बानी से हमरा भाषा के संस्कार मिलल, हँसल-बोलल आ रोवल-गावल आइल। ऊ समझ आ दीठि मिलल, जवना से हम अपना गँवई लोकपूरा पढ़ीं…